रबी की रौनक सही बीज और उर्वरक

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प्रकृति की विचित्र मेहरबानी से इस वर्ष नवम्बर के शुरूआती सप्ताह तक पानी बरसता रहा इससे रबी फसलों की बुआई के लिये, भूमि की तैयारी के लिये अच्छा अवसर मिल गया, जहां तक अच्छे उत्पादन का प्रश्न है।

यदि भूमि की तैयारी अच्छी तरह से हो जाये तो बुआई अंकुरण और स्वस्थ पौधों के मिलने का अनुमान लगाया जा सकता है। हमारे प्रदेश का लगभग 60 प्रतिशत भाग ऐसा है जहां पर रबी की बुआई वर्षा आधारित होती है और इसी हिस्सों को यदि नमी मिल गई हो तो वहां की औसत उपज बढ़ाना आसान हो जाता है।

गेहूं का अधिकांश क्षेत्र सिंचित है

जहां तक गेहूं का प्रश्न है अधिकांश क्षेत्र सिंचित होता है और सिंचाई के लिये जल के विभिन्न श्रोत होते हैं। सर्वाधिक सिंचाई कमांड क्षेत्र में उपलब्ध रहती है, रबी की दूसरी फसल चना है जिसकी बुआई के लिए भूमि चयन, भूमि की तैयारी से लेकर रखरखाव तक में आमतौर पर उतनी चिंता नहीं की जाती है जितनी गेहूं की, की जाती है चना के साथ-साथ अन्य दलहनी फसलें जैसे मसूर, मटर आदि फसलें भी ऐसी हैं जिनका यदि उचित रखरखाव किया जाये तो उत्पादकता बढ़ाई जाना कोई असंभव बात नहीं है।

दलहनी फसलें प्रोटीन की प्रमुख श्रोत होती हैं जिसकी आवश्यकता आज आम आदमी को बहुत है। आमतौर पर रबी दलहनी फसलों में उर्वरक उपयोग बहुत कम होता है और जहां होता है वहां भी असंतुलित होता है जबकि इन फसलों में फास्फोरस तथा पोटाश का उपयोग नत्रजन की तुलना में कम होता है। चूंकि दलहनी फसलें वायुमंडल से नत्रजन एकत्रित करने की क्षमता रखती हैं इस कारण अन्य आवश्यक उर्वरकों की पूर्ति करके अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

इसके अलावा राईजोबियम कल्चर तथा पीएसबी का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए ताकि अच्छा अंकुरण अधिक नाईट्रोजन तथा भूमि में उपलब्ध फास्फेट का अधिक से अधिक उपयोग किया जा सके। ऐसा करके दलहनी विशेषकर चने की उत्पादकता सरलता से बढ़ाई जा सकती है। उल्लेखनीय है कि देश की जनसंख्या 2020 तक 135 करोड़ तक पहुंच सकती है।

जिसके लिये 295 टन दालों की आवश्यकता पड़ सकती है जो वर्तमान के उत्पादन से लगभग दोगुना है। मांग की पूर्ति के लिये विवश शासन को बाहर से दलहन का आयात करना होगा जिसका भार आम लोगों की आर्थिक संतुलन को भी बिगाड़ सकता है। पिछले दिनों बढ़े दलहन के दाम की मार आज तक लोगों को याद है। इस कारण हमें हर संभव प्रयास करके दलहनों की उत्पादकता बढ़ाने के लिये कम लागत की तकनीकी का अंगीकरण शत-प्रतिशत करना ही होगा।

रबी फसलों का राजा गेहूं

रबी का राजा गेहूं का रखरखाव  प्राय: हर जगह किया जाता है। क्योंकि उसके उत्पादन की समस्या वर्तमान में उपलब्ध एक दर्जन से अधिक विकसित किस्मों के कारण सुलझ गई है। पुरानी जातियों जैसे डब्ल्यू एच-147 या लोक-1 जिन्हें आज भी कुछ क्षेत्र पकड़े हुए हैं। निश्चित ही लक्षित उत्पादन से दूर रहेंगे। कंडुआ तथा गेरूआ इन दोनों जातियों से हानि की संभावनाओं से कोई इंकार नहीं कर सकता है। दूसरी बात दो या कहीं-कहीं तीन गुना बीज दर डालकर अधिक उत्पादन की कल्पना करता किसान आज भी  है।

अधिक पौध संख्या से उत्पादन के आंकड़ों को पाना संभव नहीं है जरूरी तो यह है कि एक इकाई क्षेत्र में पर्याप्त पौधों की जो सिफारिश के आधार पर बीज दर से प्राप्त की जा सकती है। खाद, बीज का मिश्रण कदापि नहीं किया जाये। राई-सरसों, अलसी की बुआई गहराई पर ना हो तथा सभी फसलों  पर क्रांतिक अवस्था में ही सिंचाई की जाये और खर्च की तकनीकी अपनाकर रबी फसलों से लक्षित उत्पादन लेकर स्वयं की, प्रदेश की, देश की प्रगति प्रशस्त की जाये।

www.krishakjagat.org

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