फसल की खेती (Crop Cultivation)

अमरूद, आलू और प्याज में लगने वाले रोग और उसकी रोकथाम के उपाय

26 नवम्बर 2020, इंदौर। अमरूद, आलू और प्याज में लगने वाले रोग और उसकी रोकथाम के उपायकिसानों को सही मार्गदर्शन देने हेतु कृषि विभाग के साथ ही उद्यानिकी विभाग भी सक्रिय है , ताकि किसानों का लागत खर्च कम हो और उत्पादन अधिक मिले l इसी क्रम में उद्यानिकी विभाग द्वारा जिले में किसानों की अमरूद, आलू और प्याज की फसल में लगने वाले रोग और उसके निदान के उपाय बताए हैं l

अमरूद के रोग एवं उनकी रोकथाम :

सूखा या उखटा रोग :- यह अमरूद फल वृक्षों का सबसे विनाशकारी रोग हैं। रोग के लक्षण दो प्रकार से दिखाई पड़ते हैं। पहला- आंशिक मुरझान, जिसमें पौधे की एक या मुख्य शाखाएं रोग ग्रसित होती है तथा अन्य शाखाएं स्वस्थ दिखाई पड़ती है। पौधों की पत्तियां पीली पड़ कर झड़ने लगती है। रोगग्रस्त शाखाओं पर कच्चे फल छोटे व भरे सख्त हो जाते हैं। दूसरी- अवस्था में रोग का प्रकोप पूरे पेड़ पर होता है। रोग जुलाई से अक्टूबर माह में उग्र रूप धारण कर लेता है। पौधे की ऊपरी शाखाओं से पत्तियां पीली पड़कर मुड़ने लगती है और अन्त में पत्तियां रंगहीन हो जाती है। पौधा नई फूटान नहीं कर पाता एवं अन्त में मर जाता है।

निदान – इस रोग के नियंत्रण हेतु रोगग्रस्त शाखाओं को काटकर नष्ट कर दें। साथ ही ज्यादा सघन बागों में उचित कटाई-छटाई करें। पूर्णतया रोगग्रसित पौधों को उखाड़कर नष्ट कर दें। पेड़ के तने के चारों ओर मिट्टी चढ़ाएं व दोपहर में सिंचाई न करें, थांले बड़े फैलाकर बनाएं । आंशिक रूप से ग्रसित पेड़ों में थालों से सिंचाई की जगह पाइपलाइन या ड्रिप सिंचाई पद्धति को अपनाते हुए, जल निकास की उचित व्यवस्था भी बगीचों में करें। रोग ग्रसित पौधों को बचाने के लिए थालों में कार्बन्डाजिम फफूंदीनाशक दवा को दो ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर डालें साथ ही कार्बन्डाजिम या टोपसिनएम फूंटनाशक एक ग्राम प्रति लीटर पानी में धोलकर छिड़काव पौधों पर भी करें। नीम की खली (चार कि.ग्रा. प्रति पौधा) और जिप्सम (दो किलोग्राम प्रति पौधा) से भूमि उपचार करना भी इस रोग में लाभप्रद पाया गया है।

अमरुद का ‘सरकोस्पोरा पत्ती धब्बा’ रोग:- पतियों पर भूरे पीले रंग के अनियमित आकार के धब्बे का बनना व प्रभावित पुराने पत्तियों का पीला होकर झड़ जाना। पत्तियों की निचली सतह पर भूरे अनियमित आकार के धब्बे तथा ऊपरी सतह पर पीले रंग के दाग दिखाई देते हैं। पुरानी पत्तियों बहुत अधिक प्रभावित होकर अंत में झाड़ जाती है। इसके प्रबंधन हेतु प्रभावित पौधों पर मेंकोजेब (0.2 प्रतिशत) का एक माह के अंतराल पर छिड़काव करें।

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आलू के रोग एवं उनकी रोकथाम :

अगेती झुलसा रोग :- इस रोग के लक्षण फसल बोने के तीन-चार हफ्ते बाद पौधों की निचली पत्तियों पर छोटे-छोटे, दूर दूर बिखरे हुए कोणिया आकार के चकतों या धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं, ये धब्बे तेजी से बढ़ते हैं और ऊपरी पत्तियों पर भी बन जाते हैं। आकार में बढ़ने के साथ-साथ इन धब्बों का रंग भी बदल जाता है और बाद में ये काले रंग के हो जाते हैं। रोग का असर आलू के कंदों पर भी पड़ता हैं। नतीजतन कंट आकार में छोटे रह जाते हैं। उपचार- आलू की खुदाई के बाद खेत में छूटे रोगी पौधों के कचरे को इकट्ठा कर के जला देना चाहिए यह एक भूमिजनित रोग है। फसल में बीमारी का प्रकोप दिखाई देने पर यूरिया फीसदी व मैंकोजेब (75 फीसदी) 0.2 फीसदी का छिड़काव प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए।

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पिछेती झुलसा रोग :- यह रोग मैदानी तथा पहाड़ी दोनों इलाकों में आलू की पत्तियों, शाखाओं व कंदों पर हमला करता है जब वातावरण में नमी व रोशनी कम होती है lपत्तियों की निचली सतहों पर सफेद रंग के गोले बन जाते हैं, जो बाद में भूरे व काले हो जाते हैं। पत्तियों के बीमार होने से आलू के कंटों का आकार छोटा हो जाता है और उत्पादन में कमी आ जाती है। आलू की फसल में कवकनाशी जैसे मैंकोजेब 175 फीसदी) का 0.2 फीसदी या क्लोरोथलोनील 0.2 फीसदी या मेटालेविसल 0.25 फिसदी या प्रपोनेब 70 फीसदी या डाइथेनजेड 78, डाइथेनएम् 45 0.2 फीसदी के चार से पांच छिड़काव प्रति हेक्टेयर की दर से करने चाहिए।

आलू की पत्ती मुड़ने वाला रोग (पोटेटोलीफरोल) :- यह एक वायरल बीमारी है, जो वायरस के द्वारा फैलती है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए रोगरहित बीज बोना चाहिए तथा इस वायरस के वाहक एफिड की रोकथाम दैहिक कीटनाशक यथा फास्फोमिडान का 0.04 प्रतिशत घोल मिथाइलऑक्सीडिमीटान अथवा डाइमिथोएट प्रतिशत घोल बनाकर 1-2 छिड़काव दिसम्बर, जनवरी में करना चाहिए।

प्याज के रोग एवं उनकी रोकथाम:

थ्रिप्स :- ये कीट पत्तियों का रस चूसते हैं, जिसके कारण पत्तियों पर चमकीली चांदी जैसी धारियां या भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। ये बहुत छोटे पीले या सफेद रंग के कीट होते हैं, जो मुख्य रूप से पत्तियों के आधार या पत्तियों के मध्य में घूमते हैं। इसके नियंत्रण हेतु नीम तेल आधारित कीटनाशियों का छिड़काव करें या इमिडाक्लोप्रिड कीटनाशी 17.8 एस.एल. दवा की मात्रा 25 मिलीमीटर हे. 500-600 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

माइट :- इस कीट के प्रकोप के कारण पत्तियों पर धब्बों का निर्माण हो जाता हैं और पौधे बौने रह जाते हैं। इसके नियंत्रण हेतु 0.05 डाइमेथोएट दवा का छिड़काव करें।

बैंगनी धब्बा (परपल ब्लॉच) :- यह एक फफूंदीजनित रोग हैं। इस रोग का प्रकोप दो परिस्थितियों में अधिक होता हैं। पहला- अधिक वर्षा के कारण दूसरा पौधों को अधिक समीप रोपने से पत्तियों पर बैंगनी रंग के धब्बे बन जाते हैं। परिणामस्वरूप पोधों की बढ़वार एवं विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । इसके लक्षण दिखाई देने पर मेनकोजेब 2.5 ग्रा./ती. पानी) का दस दिन के अन्तराल से छिड़काव करें। इन फफूटनाशी दवाओं में चिपकने वाले पदार्थ जैसे सुनो विट, ट्राइटोन या साधारण गोंद अवश्य मिला दें, जिससे घोल पत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण हेतु चिपका सकें।

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