कम लागत में लगायें मसूर

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भूमि का चुनाव एवं तैयारी  – मसूर सभी प्रकार की भूमि में उगार्ई जा सकती है। किन्तु दोमट और भारी भूमि इसके लिये अधिक उपयुक्त है। भूमि का पी.एच. मान 6.5 से 7.0 के बीच होना चाहये तथा जल निकास का अच्छा प्रबंध होना चाहये। खाली खेतों में 3-4 जुताई कर खेत अच्छी तरह तैयार करें एवं खरीफ  के खेत खाली होने के बाद 2-3 जुताई  कर पाटा चलायें जिससे नमी संचित हो सके। खरपतवार होने पर उन्हें निकाल दें ।
जलवायु – इसकी वानस्पतिक वृद्धि के लिये ठंडी जलवायु तथा पकते समय गर्म वातावरण की आवश्यकता होती है। 20 से 30 डिग्री से तापक्रम में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।
बीज एवं बीजोपचार – मसूर की समय से बुआई के लिये 16-24 किलो बीज प्रति एकड़ में लगता है। देर से बुआई करने पर बीज की मात्रा बढ़ा दें। बीज को प्रारंभिक अवस्था में फफूंद जनित रोगों से बचाने के लिये बुआई के पूर्व थायरम/कार्बेन्डाजिम 2:1 की 3 ग्राम मात्रा से प्रति किलो बीज उपचारित करें। इसके बाद राइयजोबियम तथा पी.एस.बी. कल्चर प्रत्येक की 5 ग्राम मात्रा से प्रति किलो बीज उपचारित करें ।
बुआई का समय एवं तरीका – अक्टूबर के मध्य बुआई के लिए उपयुक्त समय है । बुआर्ई में देरी होना उपज में कमी लाती है। 15 नवम्बर तक का समय मसूर फसल की बुआई देरी की अवस्था में की जा सकती है। मसूर की कतार से कतार की दूरी 25-30 से.मी. एवं 5-7 से.मी. गहरा बोना चाहिए।
खाद एवं उर्वरक – खेत तैयार करते समय गोबर खाद या कम्पोस्ट े 2-2.5 टन प्रति एकड़ डालें। मसूर की फसल ज्यादातर असिंचित क्षेत्रों में ली जाती है। जिसमें 6-8 किलो नत्रजन 16-20 किलो स्फुर तथा 6-8 किलो गंधक प्रति एकड़  के मान से दें। सिंचित अवस्था में 10 किलो नत्रजन और 20 किलो फास्फोरस प्रति एकड़ के हिसाब से देना चाहिए । अच्छी पैदावार के लिए 6-8 किलो गंधक देना उपयुक्त है। भूमि में पोटाश की कमी हो तो 8-10 कि.ग्रा. पोटाश प्रति एकड़ देना चाहिये।
सिंचाई- सामान्यत: मसूर असिंचित क्षेत्रों में ली जाती है। परन्तु सिंचाई उपलब्ध होने पर पलेवा देकर बुवाई करना चाहिये। इससे अंकुरण अच्छा होता है। सामान्यत: बाद में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। सिंचाई उपलब्ध होने पर फूल आने के पूर्व हल्की सिंचाई करना चाहिये। इससे भरपूर पैदावार ली जा सकती है।
खरपतवार प्रबंधन – मसूर की फसल में 50 दिनों तक खरपतवारों को नियंत्रित रखना चाहिये। खेत में नींदा उगने पर हेन्ड हो या डोरा चलाना चाहिये, इससे खरपतवार नियंत्रण होगा तथा वायुसंचार के लिये गुड़ाई भी हो जाती है। रसायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिये बुुवाई पूर्व फ्लूक्लोरोलिन 300 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ 250 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।
कटाई-गहाई एवं भंडारण –  फसल को पूर्ण रूप से पक जाने पर उसकी कटार्ई करें एवं कटार्ई पश्चात गहाई कर बीजों            को सुखाकर बोरों या बण्डों में 0.05 मेलोथियॉन का घोल छिड़ककर सूखने पर भण्डारण करें ।

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