सूखे जैसी स्थिति में सोयाबीन की कैसे करें देखभाल? कृषि विभाग ने जारी की पूरी गाइडलाइन
29 जुलाई 2026, भोपाल: सूखे जैसी स्थिति में सोयाबीन की कैसे करें देखभाल? कृषि विभाग ने जारी की पूरी गाइडलाइन – मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में वर्षा की अनियमितता और कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति को देखते हुए कृषि विभाग ने सोयाबीन उत्पादक किसानों के लिए महत्वपूर्ण सलाह जारी की है। विभाग ने कहा है कि यदि लंबे समय तक बारिश नहीं होती है तो किसान समय रहते वैज्ञानिक तरीके अपनाकर फसल को सूखे, रोगों एवं खरपतवारों से होने वाले नुकसान से बचा सकते हैं।
नमी संरक्षण के लिए अपनाएं ये उपाय
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सूखे की स्थिति में किसान सोयाबीन की फसल में डोरा या कुल्पा चलाकर निंदाई-गुड़ाई करें, जिससे मिट्टी में नमी का संरक्षण हो सके। 15 से 25 दिन की फसल में प्रति हेक्टेयर लगभग 5 टन फसल अवशेष बिछाकर मल्चिंग करने से भी मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है। खेत में दरारें पड़ने से पहले स्प्रिंकलर, टपक सिंचाई अथवा उपलब्ध परंपरागत सिंचाई साधनों से हल्की सिंचाई करना लाभदायक रहेगा।
फसल की बढ़वार के लिए करें पर्णीय छिड़काव
फसल की बेहतर वृद्धि के लिए 20 से 25 दिन की अवस्था में 750 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी की दर से थायोयूरिया का घोल बनाकर पर्णीय छिड़काव करने की सलाह दी गई है। यदि सूखे के दौरान सोयाबीन की ऊपरी पत्तियां लौह तत्व की कमी के कारण पीली पड़ने लगें तो वर्षा होने पर यह समस्या सामान्य हो सकती है। अधिक गंभीर स्थिति में किसान 1 प्रतिशत फेरस सल्फेट एवं 0.2 प्रतिशत चुने का घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें। वहीं, यदि अधिक वर्षा की स्थिति बनती है तो खेत में जलभराव से बचाने के लिए जल निकासी की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करें।
कॉलर रॉट और जड़ सड़न रोग से रहें सतर्क
रोग प्रबंधन के संबंध में कृषि विभाग ने बताया कि वर्तमान में कई क्षेत्रों में कॉलर रॉट (गरदानी सड़न) एवं रायजोक्टोनिया जड़ सड़न रोग का प्रकोप देखा जा रहा है। इसके नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत दवा की 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फसल पर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
पीला मोजेक और कीटों के नियंत्रण के उपाय
यदि सोयाबीन में पीला मोजेक अथवा सोयाबीन मोजेक रोग के लक्षण दिखाई दें तो प्रारंभिक अवस्था में ही संक्रमित पौधों को खेत से उखाड़कर नष्ट कर दें। साथ ही रोग फैलाने वाले सफेद मक्खी एवं एफिड की रोकथाम के लिए थायोमेथोक्सम प्लस लैम्ब्डा सायहेलोथ्रिन (125 मिली प्रति हेक्टेयर), अथवा बीटासायफ्लुथ्रिन + इमिडाक्लोप्रिड (300 मिली प्रति हेक्टेयर), अथवा एसिटेमीप्रिड 25 प्रतिशत + बायफेंथ्रिन 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी (250 ग्राम प्रति हेक्टेयर) का छिड़काव करें। इन दवाओं के उपयोग से तना मक्खी का भी प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है।
खरपतवार नियंत्रण भी है जरूरी
खरपतवार प्रबंधन के लिए किसानों को सलाह दी गई है कि वे समय पर हाथ से निंदाई, डोरा या कुल्पा का उपयोग करें अथवा सोयाबीन के लिए अनुशंसित खरपतवारनाशकों का पर्याप्त पानी के साथ छिड़काव करें। खड़ी फसल में खरपतवारनाशकों के प्रभावी उपयोग के लिए फ्लड जेट या फ्लैट फैन नोजल का उपयोग करना अधिक लाभकारी रहेगा।
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे समय-समय पर अपनी फसल का निरीक्षण करते रहें तथा आवश्यकता पड़ने पर कृषि विभाग के अधिकारियों एवं कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क कर वैज्ञानिक सलाह के अनुसार ही कृषि कार्य करें, ताकि विपरीत मौसम की परिस्थितियों में भी सोयाबीन की बेहतर पैदावार सुनिश्चित की जा सके।
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