पश्चिम बंगाल में धान की फसल पर तना बेधक और खैरा रोग का खतरा, IMD ने दी सलाह
28 सितंबर 2026, कोलकाता: पश्चिम बंगाल में धान की फसल पर तना बेधक और खैरा रोग का खतरा, IMD ने दी सलाह – राज्य के दक्षिण दिनाजपुर और मालदा जिलों में धान की फसल पर पीले तना बेधक कीट का हमला देखा जा रहा है, जबकि पश्चिम मिदनापुर और झाड़ग्राम जिलों में खरीफ धान में तना बेधक के साथ-साथ खैरा रोग (जिंक की कमी से पत्तियों का पीला पड़ना) की समस्या सामने आई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), कोलकाता ने अपने ताजा एग्रोमेट एडवाइजरी सर्विस (एएएस) बुलेटिन में किसानों को तुरंत उपाय अपनाने की सलाह दी है। यह बुलेटिन 25 सितंबर 2026 को जारी किया गया।
पीले तना बेधक के हमले से पौधों में “डेड हार्ट” (बीच का हिस्सा सूखकर मर जाना) और बालियां बनने के बाद “व्हाइट ईयर” (सफेद, दानों से खाली बाली) जैसे लक्षण दिखते हैं। समय रहते पहचान न होने पर उपज में भारी नुकसान हो सकता है।
दवा और मात्रा की पूरी जानकारी
जैविक उपाय के तौर पर बुलेटिन में नीमास्त्र के इस्तेमाल की सलाह दी गई है। इसे 5 लीटर गोमूत्र, 5 किलोग्राम नीम की पत्तियों और 2 किलोग्राम ताजा गोबर से तैयार किया जाता है, और छिड़काव के समय 10 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर इस्तेमाल करना चाहिए।
रासायनिक नियंत्रण के लिए फिप्रोनिल 5% एससी या कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड 4% ग्रेन्यूल्स का इस्तेमाल किया जा सकता है। पश्चिम मिदनापुर और झाड़ग्राम जिलों के लिए बुलेटिन में कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड 4जी की मात्रा 3.5 किलोग्राम प्रति बीघा निर्दिष्ट की गई है। खैरा रोग की रोकथाम के लिए चेलेटेड जिंक को 0.5 से 1.0 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि तना बेधक की पहचान खेत में नियमित निगरानी से ही जल्दी हो सकती है, इसलिए किसानों को हर हफ्ते खेत का मुआयना करना चाहिए और लक्षण दिखते ही तुरंत छिड़काव करना चाहिए।
बुलेटिन में यह भी सुझाव दिया गया है कि खेत में पानी का प्रबंधन सही रखा जाए, क्योंकि लगातार जलभराव से तना बेधक और खैरा रोग दोनों की समस्या और बढ़ सकती है। खेतों की मेड़ों और आसपास की झाड़ियों की सफाई रखने से भी कीट के फैलाव को कुछ हद तक रोका जा सकता है, क्योंकि इन जगहों पर कीट के अंडे और लार्वा छिपे रह सकते हैं।
छिड़काव के समय बरतें ये सावधानियां
विशेषज्ञों की सलाह है कि रासायनिक दवा का छिड़काव सुबह या शाम के ठंडे समय में करना चाहिए, ताकि दवा जल्दी न सूखे और असरदार तरीके से कीट पर लगे। छिड़काव के दौरान हाथों और चेहरे को ढककर रखना चाहिए, और दवा घोलते समय बताई गई मात्रा का ही सख्ती से पालन करना चाहिए, क्योंकि जरूरत से ज्यादा मात्रा फसल और मिट्टी दोनों के लिए नुकसानदेह हो सकती है। जिन खेतों में लक्षण अभी हल्के हैं, वहां पहले जैविक विकल्प जैसे नीमास्त्र आजमाने की सलाह दी गई है, और रासायनिक दवा का इस्तेमाल तभी करने को कहा गया है जब प्रकोप ज्यादा बढ़ जाए।
धान इस समय बालियां बनने की महत्वपूर्ण अवस्था में है, और इस दौर में तना बेधक या खैरा रोग का असर सीधे उपज और गुणवत्ता पर पड़ता है। सही दवा और सही मात्रा समय पर इस्तेमाल न करने पर किसानों को बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है, इसलिए IMD जैसी सरकारी एजेंसी की ताजा एडवाइजरी का पालन करना उनके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
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