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पशुपालन (Animal Husbandry)राज्य कृषि समाचार (State News)

बिदा होती बिरादरी: मुर्गियों की नस्ल: कड़कनाथ

लेखक: डॉ ( प्रो)संदीप नानावटी , विभागाध्यक्ष एवं प्राध्यापक, पशु उत्पादन एवं प्रबंध विभाग, पशु चिकित्सा महाविद्यालय , महू

31 अक्टूबर 2026, भोपाल: बिदा होती बिरादरी: मुर्गियों की नस्ल: कड़कनाथ – निश्चित रूप से यह अचरज वाली बात हो सकती है कि दुनिया भर में मुर्गियों की जितनी भी आधुनिक नस्ले आज मौजूद है वह भारत उसके आसपास के देशों के जंगलों में पाए जाने वाली जंगली मुर्गियों से ही विकसित हुई है ।मुर्गियों की देशज नस्ले आमतौर पर भूमिहीन या आदिवासी कृषक ही पालते हैं ।यह पक्षी न केवल उनकी आजीविका का पर्याय है ,अपितु, उनके पोषण, आय एवं उनके निवेश का सुरक्षित साधन भी है।यद्यपि, यह तल्ख सच है कि मुर्गियों की उत्पादन क्षमता (अंडा वह मांस दोनों )कोई बहुत अच्छी नहीं है और यही कारण है कि इसे कुछ बेहतर कर पाने की चाहत के कारण वैज्ञानिक और शासकीय अमले ने कई प्रजनन नीतियां लागू की जो बुनियादी तौर पर नस्ल संकरण पर आधारित थी ।नस्ल संकरण की बयार इस कदर बही कि क्या दुधारू पशु और क्या मुर्गियां, इनकी नस्लों की शुद्धता को सहेज रख पाना संदेहास्पद हो गया। नतीजतन, मुर्गियों की कुछ नस्लों का अस्तित्व या तो खत्म हो गया या खत्म होने की कगार पर है ।

इन विलुप्त होती प्रजातियों में मुर्गियों की एक नस्ल है- कड़कनाथ ,पश्चिम मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के आदिवासियों द्वारा पाली जाने वाली यह मुर्गियां अपने आप में ढेर सारी खूबियां समेटे है। आदिवासियों में इन मुर्गियों की लोकप्रियता का आलम यह है मुर्गियों की इतनी विदेशी नस्ल होने के बाजूद (जो उत्पादक भी है और किफायती भी ),अभी तक यहां के स्थानीय बाशिंदे कड़कनाथ मुर्गियों के मोह को छोड़ नहीं पाए हैं ।शादी ब्याह हो या मौत मरण, उनके हर रीति रिवाज में कड़कनाथ व ताड़ी (स्थानीय द्रव पदार्थ जो वृक्षों से निकाला जाता है) बड़ी शिद्दत से शामिल होते हैं । कड़कनाथ के शरीर का काला रंग, काला रक्त, काले पंख,एवं काला मांस इनकी परंपराओं और जीवन शैली में इस तरह रच बस गए हैं , कि जान पड़ता है ,मानो उनके बिना यहां का जीवन संभव ही नहीं।

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विगत एक दशाब्दी में मुर्गी पालन उद्योग में एक जबरदस्त क्रांति का सूत्रपात हुआ है और विदेशी नस्ल के मुर्गियों के भरमार सी हो गई है। इनकी अविश्वसनीय गुणवत्ता के कारण देशज नस्ल की मुर्गियों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया और इन्हें हरदम दोयम दर्जे का समझ गया । जाहिर है,इनके कारण भी स्पष्ट थे- क्षीण उत्पादन क्षमता, धीमी शारीरिक वृद्धि एवं मुनाफे का गड़बड़ गणित । इसके अलावा सुलभता से उपलब्ध न होना और समाज के आदिवासियों और निम्न वर्ग में इस पक्षी के जुड़ाव के कारणों ने भी इसकी आवश्यकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। बहरहाल, कड़कनाथ की संख्या कम तो थी ही, हाइब्रिड मुर्गियों के उद्भव में विकास से यह संख्या और भी सिमटती चली गई।

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गौरतलब है कि भारत में लगभग 85 करोड़ की संख्या में मुर्गियां होंगी जिनमें से मुश्किल से 10% देसी नस्ल की मुर्गियां है अभी मुर्गियों की लगभग 20 भारतीय नस्ल हैं यद्यपि अभी भी बैकयार्ड प्रणाली घर के पिछवाड़े मुर्गी पालन का आकर्षण भूमिहीन कृषकों में कायम है और आदिवासी अंचल के कमोबेश हर झोपड़ी के पीछे देसी नस्ल की पक्षियों को पाला जाता है जो दाने के नाम पर कीड़े मकोड़े या किचन का वेस्ट पदार्थ चुगते हुए मिलेंगे। इन्हें न तो संतुलित आहार, न हीं भवन व्यवस्था मुहैया होती है, टीकाकरण और इलाज की तो बात ही दूर है।

कड़कनाथ या कालामांसी, यह नाम मांस का रंग काला होने की वजह से दिया गया। साधारणतया, ये मुर्गियां, पूर्णतः काली या सुनहरे काले रंगों में मिलती है । आमतौर पर यह पक्षी तीन स्वरूपों में मिलता है- संपूर्ण काला, पेंसिल के रंग का या सुनहरी काला ।संपूर्ण काली मुर्गियों के वयस्क पक्षी पूरी तरह काले होते हैं। सुनहरे काले वर्ण के पक्षी बुनियादी तौर पर काले होते हैं पर उनके सिर पर और गर्दन पर सुनहरे पंख होते हैं। इन तीनों प्रकारों में त्वचा,चोंच और पैर के पंजे गहरे,मटमैले रंग के होते हैं। कड़कनाथ मुर्गियों में अधिकतर आंतरिक अंग गहरे काले रंग के होते हैं ,चूंकि इनमें शरीर में काले रंग के मेलेनिन नाम के पिगमेंट का जमाव होता है। कड़कनाथ मुर्गियों के अंडों का वजन औसतन 41 ग्राम होता है और 29 सप्ताह की आयु में मादा मुर्गियां अंडे देना लशुरू करती हैं। साल भर में यह मात्र 33 अंडे ही दे पाती हैं। याने इस उत्पादन पर इन्हें व्यावसायिक रूप से पालना ही दुष्कर है।

कड़कनाथ यानी कड़क:

जैसा कि ,नाम से ही जाहिर है कि इस नस्ल के पक्षी किसी भी वातावरण में पाल जा सकते हैं ना गर्मियों में इनको बेचैनी होती है, ना ही सर्दी में निमोनिया की शिकायत। झाबुआ के ग्रामीण अंचलों में, जहां वृष्टि कम होती है ,वहां गर्मी के तीखे तेवर भी इनका कुछ बिगाड़ नहीं पाते। इस तापक्रम पर अन्य संकर विदेशी नस्लों का जीवित रह पाना मुश्किल होता है। कड़कनाथ की तासीर इतनी कड़क होती है कि इन्हें निवास हेतु किसी तरह के दड़बों की जरूरत नहीं होती। घर के पीछे खुले आंगन में जहां ड्रेनेज या रसोई के वर्ज्य पदार्थ बाहर बहते हैं, उन्हें ही आहार बनाकर यह मुर्गियां पल- बढ़ जाती है ।जाहिर है, इनकी आवास व्यवस्था पर फूटी कौड़ी भी खर्च करने की दरकार नहीं होती।

हालांकि एक फायदा यह भी है कि इन्हें किसी विशेष आहार की आवश्यकता नहीं होती जो भी किचन वेस्ट मटेरियल कीड़े मकोड़े, अनाज के फेके गए दाने मिल जाए तो येअपना जीवन निर्वाह कर लेती है। मांस उत्पादन की क्षमता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जहां करीब 5- 6 सप्ताह में विदेशी मुर्गियों के ब्रायलर 1 किलो वजन तक बढ़त ले लेते हैं, इन्हें यह वजन पाने में साल भर लग जाता है। शोधों के परिणामों से स्पष्ट है कि इनका वजन 1 किलो करने में 458.68 ग्राम अच्छे दाने की जरूरत होती है ।

जैसा कि विदेशी नस्ल के मुर्गी पालन में यह आवश्यक है कि एक किसान को मुर्गी पालन के वैज्ञानिक पहलुओं और तकनीक की जानकारी हो, जैसे, दवाइयां के नाम, दानों में मिलने वाले अवयवों की जानकारी, प्रबंधन के तरीके एवं सामायिक टीकाकरण,। लेकिन इसके विपरीत, कड़कनाथ को पालने के लिए किसी विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती और यही कारण है झाबुआ जैसे गहन आदिवासी इलाकों में , कड़कनाथ मुर्गियों का अस्तित्व अक्षुण्ण है।
यह स्थापित तथ्य हैं कि इनके मांस में लोह तत्व ज्यादा होता है ।इसी वजह से इनका रंग काला होता है एनीमिया या रक्ताल्पता के रोगियों में इनका सेवन बेहद लाभप्रद होता है। माना तो यह भी जाता है कि इसके मांस के सेवन से यौन शक्ति में इजाफा होता है ।इनका काला मांस इतना बेहद सुस्वादु होता है कि एक बार इनका स्वाद जो जिह्वा पर सवार हुआ, फिर दूसरे किस्म का मांस पसंद ही नहीं आता यहां के पास हिंदू की वनवासियों की यह मान्यता है कि कड़कनाथ मुर्गियों का मांस कई रोगों की चिकित्सा का कार्य करता है। इनके मांस में एक अच्छे किस्म का पौष्टिक प्रोटीन होता है ।

कड़कनाथ को बचाने की कवायद :

सर्वेक्षण के दौरान यह बात स्पष्ट हुई है कि कड़कनाथ पक्षियों की संख्या में तेजी से कमी हो रही है और यह नस्ल लुप्त होने की कगार पर है ।यह आवश्यकता महसूस की जा रही है कि यदि इनको संजोने हेतु न केवल संगठित व्यावसायिक पोल्ट्री फार्म की स्थापना हो ,अपितु, किसानों के घर पर भी इनको सहेजने हेतु उन्नत तकनीक का समावेश किया जाए।ई वस्तुतः, अधिकांश कृषक पांच से 30 मुर्गियो से ज्यादा नहीं रखते । ज़रूरत इस बात की है कि इस घर या पिछवाड़े ( बैकयार्ड पॉल्ट्री फार्मिंग) से निकालकर,इसे व्यावसायिक मुर्गी फार्म में तब्दील किया जाए। यद्यपि ,ऐसा करने में लाभ हानि का गणित जरूर गड़बड़ाएगा, क्योंकि कम उत्पादकता, धीमी बढ़त और क्षीण अंडा उत्पादन क्षमता के कारण , कड़कनाथ की व्यावसायिक सफलता संदिग्ध हैं किंतु यदि वैज्ञानिक प्रयासों के जरिए पक्षी की मूल स्वरूप ,यथा देह यष्टि और रंग को बिना छेड़े ,यदि अंडे और मांस उत्पादन में वृद्धि की जा सके , साथ ही, उचित चयन, प्रबंधन, टीकाकरण और उपयुक्त पोषण के माध्यम से इनका पालन किया जाए तो इस नस्ल को लाभदायक बनाया जा सकता है।

ऐसे ही प्रयास, नानाजी देशमुख पशुचिकित्सा वि वि,जबलपुर स्थित वेटरनरी कॉलेज में हुए हैं ,जहां कड़कनाथ को अधिक परिष्कृत कर “कृष्णा जे” नामक नस्ल विकसित की गई है, जो दिखने में बिल्कुल कड़कना जैसी है पर उत्पादन में, कड़कनाथ से बेहद आगे है। हालांकि अभी कड़कनाथ के पक्षी झाबुआ के शासकीय मुर्गी प्रक्षेत्र में उपलब्ध हो जाते हैं पर मुश्किल से। यदि इसके संवर्धन के लिए मन से प्रयास नहीं करें किए गए तो यह नस्ल भी अन्य प्रजातियों की तरह किसी पिंजरे की शान बनकर रह जाएगा।

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