पशु चिकित्सक की नौकरी छोड़ी, अब जीवामृत से उगा रहे हैं रसायन मुक्त फसल, सालाना कमा रहे लाखों
28 अक्टूबर 2026, सतारा: पशु चिकित्सक की नौकरी छोड़ी, अब जीवामृत से उगा रहे हैं रसायन मुक्त फसल, सालाना कमा रहे लाखों – महाराष्ट्र के सतारा जिले में गोंदावले के पास मानकरवाड़ी गांव के बाबूराव शिवाजी गेंड ने पशु चिकित्सक की नौकरी छोड़कर खेती को अपना पेशा बनाया। आज वे पूरी तरह रसायन मुक्त तरीके से खेती कर रहे हैं और गांव के दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन गए हैं।
बाबूराव ने अपनी ढाई एकड़ जमीन पर प्राकृतिक खेती का तरीका अपनाया है। वे किसी भी रासायनिक खाद या कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं करते। इसके बदले वे देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से बना जीवामृत इस्तेमाल करते हैं, जो मिट्टी को पोषक तत्व देता है और सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाता है।
जीवामृत और ड्रिप सिंचाई से बदली खेती
खेत में वे प्राकृतिक मल्चिंग का भी इस्तेमाल करते हैं, जिससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और खरपतवार कम होते हैं। सिंचाई के लिए ड्रिप पद्धति अपनाई गई है, जिससे पानी की काफी बचत होती है। बाबूराव का दावा है कि इस तरीके में पानी की खपत अन्य सिंचाई तरीकों के मुकाबले पांचवें हिस्से से भी कम रह जाती है।
वे गुड़ भी रासायनिक रहित तरीके से तैयार करते हैं और अपने खेत में देसी गायों को बढ़ावा देते हैं, जो जीवामृत तैयार करने के लिए जरूरी हैं। इस पूरे मॉडल से उन्हें खेत से सालाना करीब 3 से 4 लाख रुपए की आमदनी हो जाती है, और यह भी बिना किसी रासायनिक खर्च के।
एक सीजन में उनकी एक एकड़ प्याज की फसल दिल्ली की मंडी में 5,000 रुपए प्रति क्विंटल के भाव पर बिकी, जिससे उन्हें करीब 2.5 लाख रुपए की कमाई हुई। यह उदाहरण बताता है कि बिना रसायन के भी अच्छी कीमत मिल सकती है, बशर्ते गुणवत्ता बेहतर हो।
दूसरे किसानों के लिए बने प्रेरणा
बाबूराव के खेत पर आसपास के गांवों से किसान देखने आते हैं। वे अक्सर उन्हें दिखाते हैं कि बिना रसायन के भी फसल कैसी स्वस्थ दिख सकती है। उनका कहना है कि यही असली सेहत है, जो मिट्टी और पौधे दोनों में झलकती है।
उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती सिर्फ देखकर या वीडियो से नहीं सीखी जा सकती, इसे खुद करके ही सीखा जा सकता है। जब उन्होंने पहली बार गांव में यह तरीका अपनाने का प्रस्ताव रखा था, तो कई किसानों ने कहा था कि रसायन के बिना मुनाफा नहीं होगा।
आज वही गांव वाले उनके खेत को उदाहरण के तौर पर दिखाते हैं। बाबूराव का कहना है कि शुरुआत में धैर्य रखना जरूरी है, क्योंकि मिट्टी को रासायनिक असर से मुक्त होने में थोड़ा समय लगता है, लेकिन एक बार संतुलन बन जाने के बाद उपज और गुणवत्ता दोनों बेहतर हो जाती हैं।
जीवामृत तैयार करने के लिए देसी गाय का गोबर और गोमूत्र, गुड़, बेसन और थोड़ी मिट्टी को पानी में मिलाकर कुछ दिन तक किण्वित किया जाता है। इससे बना घोल खेत में सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति धीरे-धीरे बढ़ती है। बाबूराव का मानना है कि यही वजह है कि उनकी जमीन पर अब रासायनिक खाद की जरूरत नहीं पड़ती।
इसी वजह से वे अपने खेत में देसी गायों को पालने पर खास जोर देते हैं, क्योंकि बिना देसी गाय के गोबर-गोमूत्र के जीवामृत बनाना मुमकिन नहीं है। खेती के साथ-साथ पशुपालन का यह मेल उनकी पूरी व्यवस्था की रीढ़ बन गया है।
शुरुआती दौर में रासायनिक खेती से प्राकृतिक खेती की तरफ जाना आसान नहीं था, क्योंकि कुछ सीजन तक उपज में कमी आने की आशंका रहती है। बाबूराव ने इसे धीरे-धीरे, एक-एक टुकड़ा जमीन पर आजमाते हुए अपनाया, ताकि पूरा नुकसान न हो। आज उनका अनुभव आसपास के युवा किसानों के लिए भी मार्गदर्शन का काम कर रहा है, जो रासायनिक खेती की बढ़ती लागत से परेशान हैं और कम खर्च में टिकाऊ विकल्प तलाश रहे हैं।
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