टीचिंग छोड़ी, पॉलीहाउस में सब्जी-स्ट्रॉबेरी उगाकर सालाना 12 लाख कमा रहे अलवर के किसान
28 अक्टूबर 2026, अलवर: टीचिंग छोड़ी, पॉलीहाउस में सब्जी-स्ट्रॉबेरी उगाकर सालाना 12 लाख कमा रहे अलवर के किसान – राजस्थान के अलवर जिले के गूजूकी गांव के किशन मुकेरिया ने निजी स्कूल में करीब चार साल पढ़ाने के बाद शिक्षक की नौकरी छोड़ दी और खेती को अपना मुख्य पेशा बना लिया। आज वे संरक्षित खेती यानी पॉलीहाउस तकनीक से सब्जियां और फल उगाकर अच्छी कमाई कर रहे हैं।
किशन ने उद्यानिकी विभाग की मदद से अपनी एक एकड़ जमीन पर पॉलीहाउस और शेडनेट हाउस बनवाया। इसमें वे खीरा, टमाटर, शिमला मिर्च और स्ट्रॉबेरी जैसी फसलें उगा रहे हैं। संरक्षित ढांचे में उगाई गई इन फसलों को बाहरी मौसम की मार से बचाया जा सकता है, जिससे उत्पादन ज्यादा और गुणवत्ता बेहतर रहती है।
सोलर पंप और बायोगैस से भी फायदा
खेत में सिंचाई के लिए किशन ने सोलर पंप लगाया है, जिससे बिजली का खर्च घट गया है। पानी बचाने के लिए उन्होंने अपने खेत में एक फार्म पॉन्ड भी बनाया है, जो बारिश के पानी को इकट्ठा कर सिंचाई के लिए इस्तेमाल करने में मदद करता है।
इसके साथ ही उन्होंने एक गोबर गैस संयंत्र भी लगाया है, जिससे रोजाना करीब 6 घन मीटर गैस मिलती है। इससे उनके घर में अब LPG गैस सिलेंडर की जरूरत खत्म हो गई है। बचे हुए गोबर गैस के अवशेष का इस्तेमाल वे खेत में जैविक खाद के तौर पर करते हैं।
इस पूरे मॉडल से किशन को अपनी एक एकड़ पॉलीहाउस खेती से सालाना करीब 12 लाख रुपए की कमाई हो रही है। यह आमदनी परंपरागत खेती के मुकाबले कई गुना ज्यादा है, जो मुख्य रूप से संरक्षित खेती और जल-ऊर्जा बचत वाली तकनीकों के मेल से संभव हुई।
किशन के इस प्रयास को उद्यानिकी विभाग की तरफ से जिला स्तर पर नवाचार पुरस्कार भी मिला है। विभाग का मानना है कि इस तरह के मॉडल दूसरे युवा किसानों को भी परंपरागत खेती से हटकर नई तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
गूजूकी गांव में संरक्षित खेती का चलन अब बढ़ रहा है और आसपास के कई किसान भी पॉलीहाउस व शेडनेट हाउस की तरफ रुख कर रहे हैं। जिले के उद्यानिकी अधिकारियों का कहना है कि सरकारी अनुदान और सही तकनीकी मार्गदर्शन मिलने पर कम जमीन में भी किसान अच्छी आमदनी कमा सकते हैं।
खुले खेत से अलग है पॉलीहाउस खेती
आम खेती में फसल पूरी तरह मौसम पर निर्भर रहती है, जबकि पॉलीहाउस में तापमान, नमी और रोशनी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। इससे बेमौसम बारिश, तेज गर्मी या कीट-रोग का असर कम हो जाता है, और फसल की गुणवत्ता भी एक जैसी बनी रहती है। यही वजह है कि पॉलीहाउस में उगाई गई सब्जियां मंडी में बेहतर दाम पर बिकती हैं।
किशन के मुताबिक पॉलीहाउस खेती में शुरुआती निर्माण लागत जरूर ज्यादा आती है, लेकिन उद्यानिकी विभाग से मिलने वाला अनुदान इस बोझ को काफी कम कर देता है। एक बार ढांचा तैयार हो जाने के बाद, सही देखभाल से कई सीजन तक लगातार फसल ली जा सकती है, जिससे लागत धीरे-धीरे वसूल हो जाती है।
सोलर पंप और बायोगैस जैसी तकनीकों को जोड़ने से उनकी खेती की कुल लागत और भी कम हुई है, क्योंकि बिजली और घरेलू ईंधन दोनों पर होने वाला खर्च घटा है। किशन का कहना है कि यह मॉडल सिर्फ कमाई का जरिया नहीं है, बल्कि कम संसाधनों में ज्यादा टिकाऊ तरीके से खेती करने का एक उदाहरण भी है।
किशन की कहानी इस बात का उदाहरण है कि पढ़े-लिखे युवा भी अगर सही योजना और तकनीक के साथ खेती में उतरें, तो यह एक लाभदायक और सम्मानजनक पेशा बन सकता है। जिले के कई युवा अब उनसे मिलने और पॉलीहाउस तकनीक की बारीकियां समझने के लिए आ रहे हैं, जिससे गूजूकी गांव में संरक्षित खेती का यह मॉडल आगे और फैलने की उम्मीद है।
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