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राज्य कृषि समाचार (State News)

कटक में धान की फसल पर मंडराया नेक ब्लास्ट और भूरा फुदका का खतरा, जानें कौन सी दवा होगी असरदार

28 अक्टूबर 2026, कटक (ओडिशा) : कटक में धान की फसल पर मंडराया नेक ब्लास्ट और भूरा फुदका का खतरा, जानें कौन सी दवा होगी असरदार – ओडिशा के कटक जिले में धान की फसल पर इस समय कई तरह के कीट और रोगों का खतरा मंडरा रहा है। जिला कृषि मौसम इकाई (एग्रोमेट यूनिट), कृषि विज्ञान केंद्र कटक की हाल की सलाह में किसानों को पैनिकल बनने से फूल आने की अवस्था में खास सावधानी बरतने को कहा गया है।

सलाह में बताया गया है कि इस समय धान की फसल में मुख्य रूप से नेक ब्लास्ट रोग, भूरा फुदका (ब्राउन प्लांट हॉपर यानी BPH), गंधी बग और शीथ ब्लाइट रोग की समस्या सामने आ रही है। ये सभी समस्याएं अगर समय पर नियंत्रित न की जाएं, तो उपज पर बड़ा असर डाल सकती हैं।

किस समस्या के लिए कौन सी दवा

नेक ब्लास्ट रोग के नियंत्रण के लिए टेबुकोनाजोल 50 प्रतिशत और ट्राइफ्लोक्सिस्ट्रोबिन 25 प्रतिशत के मिश्रण का 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करने की सलाह दी गई है। इसके विकल्प के तौर पर कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यूपी का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर इस्तेमाल किया जा सकता है।

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भूरे फुदके के लिए पाइमेट्रोजिन 50 प्रतिशत डब्ल्यूजी का 120 ग्राम प्रति एकड़, या ब्यूप्रोफेजिन 25 प्रतिशत एससी का 330 मिलीलीटर प्रति एकड़, या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल का 50 मिलीलीटर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव किया जा सकता है। गंधी बग के लिए इथोफेनप्रॉक्स 10 प्रतिशत ईसी का 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से इस्तेमाल करने को कहा गया है।

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शीथ ब्लाइट रोग में कार्बेन्डाजिम का 2 ग्राम प्रति लीटर, या प्रोपिकोनाजोल का 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव कारगर बताया गया है।

सलाह में फुट रॉट यानी तना सड़न रोग का भी जिक्र है, जो खासतौर पर घनी बोई गई या देर से रोपी गई धान में ज्यादा दिखता है। इसके लिए मैंकोजेब या कार्बेन्डाजिम का घोल पौधे के आधार में डालने की सलाह दी गई है, ताकि संक्रमण आगे न फैले। इसके अलावा हरा सींग वाला सुंडी नाम का कीट भी कुछ इलाकों में देखा जा रहा है, जिसके लिए प्रोफेनोफॉस 50 प्रतिशत ईसी का 2 मिलीलीटर प्रति लीटर, या इंडोक्साकार्ब 15.8 प्रतिशत ईसी का 0.4 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव किया जा सकता है।

पानी प्रबंधन पर भी जोर

कृषि वैज्ञानिकों ने सिर्फ दवा छिड़कने की सलाह ही नहीं दी, बल्कि पानी प्रबंधन पर भी खास जोर दिया है। पैनिकल बनने से फूल आने तक की अवस्था में खेत में 5 से 10 सेंटीमीटर पानी बनाए रखना चाहिए, लेकिन जरूरत से ज्यादा पानी निकाल देना चाहिए।

भूरे फुदके के प्रकोप को रोकने के लिए वैकल्पिक गीला-सूखा सिंचाई तरीका अपनाने की सलाह दी गई है। इसके साथ ही हर 8 से 10 कतारों के बाद एक खाली जगह छोड़ने को कहा गया है, ताकि फसल में धूप और हवा ठीक से पहुंच सके, जिससे कीटों का प्रकोप कम होता है।

दवा का छिड़काव करने से पहले खेत से पानी निकाल देना चाहिए, ताकि छिड़काव सही तरीके से असर कर सके। वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि किसान किसी भी दवा का इस्तेमाल करने से पहले पैकेट पर दी गई मात्रा और अपने इलाके के कृषि अधिकारी की सलाह जरूर जांच लें, क्योंकि अलग-अलग किस्म और मिट्टी में असर बदल सकता है।

कटक जिले में इस समय धान की फसल पैनिकल बनने से लेकर फूल आने की संवेदनशील अवस्था में है, इसलिए एक साथ कई कीट-रोगों का खतरा बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि खेत का नियमित निरीक्षण करना सबसे जरूरी कदम है, ताकि समस्या शुरुआती अवस्था में ही पकड़ में आ जाए।

किसी एक दवा का जरूरत से ज्यादा या बार-बार इस्तेमाल करने से कीटों में उस दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने का खतरा रहता है। इसी वजह से सलाह में एक से ज्यादा विकल्प दिए गए हैं, ताकि किसान बारी-बारी से दवा बदल सकें। इससे न सिर्फ कीट नियंत्रण बेहतर होता है, बल्कि लंबे समय में खेती की लागत भी नियंत्रण में रहती है।

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