सरसों की फसल में मरगोजा का प्रकोप, पैदावार घटने से परेशान किसान, जानें नियंत्रण का तरीका
28 अक्टूबर 2026, फतेहाबाद, (हरियाणा) : सरसों की फसल में मरगोजा का प्रकोप, पैदावार घटने से परेशान किसान, जानें नियंत्रण का तरीका – हरियाणा के फतेहाबाद जिले में सरसों की फसल लगाने वाले किसानों के सामने इस समय एक नई मुसीबत खड़ी हो गई है। खेतों में मरगोजा नाम के परजीवी पौधे का प्रकोप बढ़ रहा है, जिससे सरसों की पैदावार पर बुरा असर पड़ने की आशंका है।
कृषि विज्ञान केंद्र हिसार के कृषि विशेषज्ञ डॉ. ओमप्रकाश के मुताबिक, मरगोजा एक ऐसा परजीवी पौधा है जो सरसों की जड़ों से चिपककर उसका पोषण चूस लेता है। इससे सरसों का पौधा कमजोर हो जाता है और दाने ठीक से नहीं भर पाते, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान होता है।
कैसे पहचानें और कब करें छिड़काव
शुरुआत में मरगोजा का असर ऊपर से दिखाई नहीं देता, क्योंकि यह जमीन के नीचे सरसों की जड़ों पर पलता है। जब तक पौधा ऊपर दिखने लगता है, तब तक जड़ों को नुकसान हो चुका होता है। इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर खेत की जांच और सही समय पर दवा का छिड़काव बहुत जरूरी है।
डॉ. ओमप्रकाश के मुताबिक इसके नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट 41 प्रतिशत एसएल का इस्तेमाल किया जा सकता है। बिजाई के 25 से 30 दिन बाद पहला छिड़काव करना चाहिए, जिसमें 25 मिलीलीटर दवा को 150 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ इस्तेमाल करना है। इसके बाद बिजाई के करीब 50 दिन बाद दूसरा छिड़काव किया जा सकता है, जिसमें दवा की मात्रा बढ़ाकर 50 मिलीलीटर प्रति एकड़ (150 लीटर पानी में घोलकर) कर दी जाती है।
छिड़काव में बरतें ये सावधानियां
विशेषज्ञों ने साफ किया है कि छिड़काव फ्लैट फैन नोजल या नेपसैक स्प्रेयर से ही करना चाहिए, ताकि दवा पूरे खेत में बराबर मात्रा में पहुंचे। छिड़काव के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए, वरना दवा का असर कम हो जाता है।
एक अहम सावधानी यह भी बताई गई है कि ओस की स्थिति में छिड़काव नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे दवा पत्तियों पर ठीक से नहीं टिकती। इसके अलावा तय मात्रा से ज्यादा दवा का इस्तेमाल करने पर सरसों की फसल को भी नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है।
लंबे समय के समाधान के लिए विशेषज्ञों ने किसानों को फसल चक्र बदलने की सलाह दी है, यानी एक ही खेत में हर साल सरसों न बोकर बीच-बीच में कोई दूसरी फसल भी लगाई जाए। इससे मरगोजा जैसे परजीवी पौधों का जमीन में जमा होना कम होता है और आगे के सीजन में नुकसान भी घटता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक मरगोजा का बीज जमीन में सालों तक जिंदा रह सकता है और सही मौसम मिलने पर अंकुरित हो जाता है। इसी वजह से जिन खेतों में सरसों लगातार कई सीजन से बोई जा रही है, वहां इसका प्रकोप साल-दर-साल बढ़ने का खतरा रहता है। फतेहाबाद जैसे इलाकों में जहां सरसों एक प्रमुख रबी फसल है, यह समस्या किसानों की आमदनी पर सीधा असर डाल सकती है।
शुरुआती दिनों में पौधा छोटा होता है और सरसों की पत्तियों के बीच पहचानना मुश्किल हो सकता है, इसलिए विशेषज्ञ बार-बार खेत में घूमकर जांच करने की सलाह देते हैं। जिस खेत में एक बार भी भारी प्रकोप देखा गया हो, वहां अगले सीजन में पहले से ही सतर्क रहना फायदेमंद रहता है।
किसानों को सलाह दी गई है कि वे दवा का इस्तेमाल करने से पहले अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग के अधिकारी से एक बार सलाह जरूर लें, क्योंकि मिट्टी और मौसम की स्थिति के हिसाब से उपचार में थोड़ा बदलाव हो सकता है। समय पर सही छिड़काव और फसल चक्र का पालन, दोनों साथ अपनाने से ही इस समस्या पर स्थायी नियंत्रण संभव है।
आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture


