थनैला रोग को न करें नजर अंदाज
लेखक: डॉ. राहुल चौरसिया1,डॉ. सोनू कुमार यादव2,डॉ. निर्भय भावसार3, 1सहायक प्राध्यापक, पशु चिकित्सा औषधि विभाग आर.आर. कॉलेज ऑफ वेटरिनरी एंड एनिमल साइंस, देवली,टोंक, 2सहायक प्राध्यापक, पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग, एस.एम. कॉलेज ऑफ वेटरनरी साइंस एंड एनिमल रिसर्च, मथुरा, 3एम.वी. एससी. –प्रसार शिक्षा विभाग, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली
23 सितंबर 2026, भोपाल: थनैला रोग को न करें नजर अंदाज – दूध देने वाले पशु किसानों की आय का महत्वपूर्ण आधार हैं। पशु स्वस्थ रहेगा तो ही अच्छा और गुणवत्तापूर्ण दूध प्राप्त किया जा सकता है। पशुओं में होने वाला थनैला रोग (Mastitis) दूध उत्पादन को प्रभावित करने वाली प्रमुख समस्याओं में से एक है। समय पर पहचान और उचित उपचार न मिलने पर यह रोग पशु की दूध देने की क्षमता को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है और किसान को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए पशुपालकों के लिए इस रोग की पहचान, बचाव और उपचार की जानकारी होना बहुत जरूरी है।
थनैला रोग क्या है?
थनैला रोग पशु के थन में होने वाला संक्रमण और सूजन है, जो मुख्य रूप से गाय और भैंस में पाया जाता है। यह रोग विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं के संक्रमण से हो सकता है। गंदा फर्श, गोबर-मूत्र, अस्वच्छ हाथ और दूध निकालने के बर्तन, थन में चोट तथा दूध निकालने की गलत विधि इसके जोखिम को बढ़ा सकती है। थनैला मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है—क्लिनिकल (प्रकट) और सब-क्लिनिकल (गुप्त) थनैला। क्लिनिकल थनैला में थन और दूध में बदलाव स्पष्ट दिखाई देते हैं, जबकि सब-क्लिनिकल थनैला में बाहर से थन सामान्य दिखाई दे सकता है और रोग का पता आसानी से नहीं चलता।
क्लिनिकल थनैला की पहचान– क्लिनिकल थनैला में प्रभावित थन में सूजन, गर्माहट, कठोरता और दर्द दिखाई दे सकता है। दूध की मात्रा कम हो सकती है तथा दूध में थक्के, फटे हुए पदार्थ, मवाद या खून दिखाई दे सकता है। दूध का रंग भी बदल सकता है। गंभीर स्थिति में पशु को बुखार, भूख कम लगना और कमजोरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर पशु चिकित्सक से तुरंत संपर्क करना चाहिए।
सब-क्लिनिकल थनैला अधिक छिपा हुआ होता है। इसमें पशु सामान्य रूप से खाना-पीना और व्यवहार करता है तथा थन भी सामान्य दिखाई दे सकता है, लेकिन धीरे-धीरे दूध उत्पादन और गुणवत्ता प्रभावित होने लगती है। यदि बिना किसी स्पष्ट कारण के पशु का दूध लगातार कम हो रहा है, तो गुप्त थनैला की संभावना को ध्यान में रखना चाहिए। इसकी पहचान के लिए आवश्यकता पड़ने पर दूध की प्रयोगशाला जांच कराई जा सकती है।
बचाव ही सबसे अच्छा उपाय– थनैला रोग से बचाव के लिए पशुशाला को हमेशा साफ और सूखा रखना चाहिए तथा गोबर और मूत्र को नियमित रूप से साफ करना चाहिए। दूध निकालने वाले व्यक्ति के हाथ साफ होने चाहिए और थन को साफ पानी से धोकर अच्छी तरह सुखाने के बाद ही दूध निकालना चाहिए। प्रत्येक पशु के लिए अलग और साफ कपड़े या तौलिये का प्रयोग करना बेहतर है। दूध निकालने के बर्तनों को प्रत्येक उपयोग के बाद अच्छी तरह साफ करना चाहिए और दूध निकालने की स्वच्छ एवं सही विधि अपनानी चाहिए।
दूध निकालने के बाद उचित टीट डिपिंग करना भी थनैला की रोकथाम में महत्वपूर्ण है, क्योंकि दूध निकालने के तुरंत बाद थन के छिद्रों से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। संक्रमित पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए और उसका दूध सबसे अंत में निकालना चाहिए। थन में चोट या घाव दिखाई देने पर उसका समय पर उपचार करवाना चाहिए।
उपचार में न करें लापरवाही– थनैला होने पर पशुपालक को स्वयं से दवा देने के बजाय पशु चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। रोग की गंभीरता और संक्रमण के प्रकार के अनुसार पशु चिकित्सक आवश्यक उपचार, जैसे उपयुक्त एंटीबायोटिक, दर्द एवं सूजन कम करने वाली दवाएं या इंट्रामैमरी उपचार निर्धारित कर सकते हैं। दवा की मात्रा और उपचार की अवधि पशु की स्थिति के अनुसार तय की जानी चाहिए।
दूध की सुरक्षा भी है जरूरी— थनैला रोग के उपचार में उपयोग की गई दवाओं के बाद कुछ समय तक पशु के दूध का मानव उपयोग नहीं करना चाहिए। इसे दूध-त्याग अवधि कहा जाता है, जिसका पालन पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार करना आवश्यक है। उपचार के दौरान प्राप्त दूध को अन्य दूध में मिलाकर बिक्री के लिए नहीं भेजना चाहिए। यदि दूध में खून दिखाई दे, थन में अधिक सूजन हो या पशु को तेज बुखार आए, तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें। बिना सलाह के थन में कोई दवा, तेल या घरेलू पदार्थ न डालें और एंटीबायोटिक का प्रयोग भी स्वयं से न करें।
रोज करें थन की जांच– पशुपालक को प्रतिदिन दूध निकालते समय पशु के थन और दूध पर ध्यान देना चाहिए। थन में सूजन, गर्माहट, कठोरता या दर्द, दूध में थक्के, मवाद या खून, दूध के रंग या गंध में बदलाव तथा दूध की मात्रा में अचानक कमी जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से गुप्त थनैला में बाहरी लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए दूध उत्पादन में लगातार कमी होने पर समय-समय पर पशु चिकित्सक की सलाह से जांच करवाना उपयोगी है।
निष्कर्ष
थनैला रोग पशु के स्वास्थ्य के साथ-साथ दूध उत्पादन और किसान की आमदनी को भी प्रभावित करता है। इसकी रोकथाम के लिए पशुशाला की स्वच्छता, साफ हाथों से दूध निकालना, थन की उचित सफाई, दूध निकालने के बाद टीट डिपिंग और नियमित जांच जैसी सावधानियां अपनाना आवश्यक है। गुप्त थनैला को समय पर पहचानना भी बहुत महत्वपूर्ण है। रोग के लक्षण दिखाई देने पर स्वयं दवा देने के बजाय पशु चिकित्सक की सलाह से उपचार कराना चाहिए। साफ-सफाई, समय पर पहचान और सही उपचार अपनाकर थनैला से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
संदर्भ
Merck Veterinary Manual. (2025). Health and Production Management Programs for Dairy Cattle. Merck & Co., Inc.
Merck Veterinary Manual. (2025). Mastitis in Cattle. Merck & Co., Inc.
Merck Veterinary Manual. (2024). Overview of Mastitis in Large Animals. Merck & Co., Inc.
Food and Agriculture Organization (FAO). Milking, Milk Production Hygiene and Udder Health. FAO.
Food and Agriculture Organization (FAO). Small-Scale Dairy Farming Manual: How Can You Prevent Mastitis? FAO.
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