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पशुपालन (Animal Husbandry)राज्य कृषि समाचार (State News)

OPU-IVF तकनीक से जन्मा उत्तराखंड की बद्री नस्ल का पहला बछड़ा

20 सितंबर 2026, पंतनगर (उत्तराखंड): OPU-IVF तकनीक से जन्मा उत्तराखंड की बद्री नस्ल का पहला बछड़ा – भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (ICAR-NDRI), करनाल और जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के वैज्ञानिकों ने मिलकर उत्तराखंड की स्वदेशी बद्री गाय नस्ल का पहला बछड़ा ओपीयू-आईवीएफ (Ovum Pick-Up and In-Vitro Fertilisation) तकनीक से तैयार करने में सफलता पाई है। 11 सितंबर 2026 को जन्मी यह मादा बछड़ी पहाड़ी क्षेत्र की इस दुर्लभ नस्ल के संरक्षण और नस्ल-सुधार कार्यक्रमों के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

यह जानकारी समाचार एजेंसी एएनआई और अन्य मीडिया रिपोर्टों में सामने आई है, जिसमें बताया गया कि यह प्रयोग भारत में स्वदेशी पहाड़ी गोवंश पर इस तरह की तकनीक के इस्तेमाल के शुरुआती उदाहरणों में से एक है।

कैसे तैयार हुआ यह बछड़ा

वैज्ञानिकों ने एक बद्री दानदाता गाय से अंडाणु (oocyte) निकालकर, बद्री सांड के वीर्य से प्रयोगशाला में निषेचन (in-vitro fertilisation) कराया। इसके बाद तैयार भ्रूण को एक साहीवाल गाय के गर्भ में सरोगेट के तौर पर प्रत्यारोपित किया गया, जिससे स्वस्थ मादा बछड़ी का जन्म हुआ।

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यह शोध परियोजना 2023 में तत्कालीन कुलपति डॉ. एमएस चौहान की पहल पर शुरू हुई थी। इसमें उत्तराखंड बायोटेक्नोलॉजी काउंसिल, हल्द्वानी की ओर से वित्तीय सहयोग मिला। एक अन्य सरोगेट गाय से अगले पांच से सात दिनों के भीतर दूसरे बछड़े के जन्म की भी उम्मीद जताई गई है।

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गर्भ में पल रहे इन भ्रूणों की निगरानी के लिए वैज्ञानिकों की टीम ने कई महीनों तक नियमित जांच और देखभाल की, ताकि सरोगेट गायों में गर्भधारण सफल रहे। संस्थान का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया प्रयोगशाला स्तर पर बेहद सावधानी से नियंत्रित परिस्थितियों में की गई।

पहाड़ी नस्ल के लिए क्यों जरूरी है यह तकनीक

बद्री गाय उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में सदियों से पाली जाने वाली एक छोटे आकार की, कम इनपुट में टिकने वाली और ऊंचाई-ढलान वाली परिस्थितियों के अनुकूल स्वदेशी नस्ल है। यह नस्ल कम चारे और कठिन मौसम में भी दूध देती रहती है, लेकिन बीते वर्षों में ज्यादा दूध देने वाली संकर और विदेशी नस्लों के प्रसार से इसकी शुद्ध आबादी लगातार घटती गई है।

ICAR-NDRI के निदेशक डॉ. धीर सिंह के हवाले से बताया गया कि ओपीयू-आईवीएफ जैसी तकनीकें बेहतर मादा गोवंश को तेजी से बढ़ाने में मदद कर सकती हैं, जिससे बद्री जैसी स्वदेशी नस्लों के संरक्षण और नस्ल-सुधार कार्यक्रमों की नींव मजबूत होती है।

इस तकनीक में एक ही उन्नत मादा गाय से कई अंडाणु निकालकर अलग-अलग सरोगेट गायों में भ्रूण प्रत्यारोपित किए जा सकते हैं, जिससे परंपरागत प्रजनन के मुकाबले कहीं तेज गति से बेहतर नस्ल के पशु तैयार होते हैं। सामान्य तरीके से एक गाय साल में एक ही बछड़े को जन्म दे पाती है, जबकि इस तकनीक से एक उन्नत मादा के जीन कई सरोगेट गायों के जरिए एक साथ आगे बढ़ाए जा सकते हैं।

देश में अब तक गिर, साहीवाल और थारपारकर जैसी कुछ प्रमुख स्वदेशी नस्लों पर इस तरह के प्रजनन प्रयोग होते रहे हैं, लेकिन पहाड़ी क्षेत्र की बद्री जैसी छोटी और कम चर्चित नस्ल पर यह तकनीक अपनाना अपने आप में एक नई शुरुआत मानी जा रही है।

यह कोई सीधी किसान-आय बढ़ाने वाली योजना नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक पशुधन संरक्षण तकनीक है। लेकिन उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में बद्री गाय जैसी स्वदेशी नस्लें कम चारे-पानी में टिकाऊ दूध उत्पादन देती हैं, इसलिए इनका संरक्षण छोटे और सीमांत पहाड़ी किसानों की आजीविका से सीधे जुड़ा है।

आने वाले वर्षों में अगर यह तकनीक व्यापक स्तर पर अपनाई जाती है, तो पशुपालन और डेयरी इनपुट कारोबार (सीमेन, भ्रूण-स्थानांतरण सेवाएं, पशु स्वास्थ्य उत्पाद) के लिए भी नए अवसर बन सकते हैं, खासकर पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में जहां संकर नस्लों का रखरखाव मुश्किल होता है।

पशु वैज्ञानिकों का मानना है कि स्वदेशी नस्लों के संरक्षण से न सिर्फ जैव-विविधता बचती है, बल्कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन और नई बीमारियों से निपटने के लिए भी ये नस्लें एक अहम आनुवंशिक भंडार साबित हो सकती हैं। पंतनगर विश्वविद्यालय जैसे संस्थान आने वाले समय में इस तकनीक को और किसानों तक पहुंचाने की दिशा में काम कर सकते हैं, जिससे पहाड़ी डेयरी किसानों को सीधे तौर पर बेहतर नस्ल के बछड़े मिलने का रास्ता खुल सकता है।

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