पद्मश्री “दादा लाड” की तकनीक से कपास की उपज तीन गुना, आय में 40 फीसदी तक इजाफा
28 सितंबर 2026, मालसोना (जिंतूर): पद्मश्री “दादा लाड” की तकनीक से कपास की उपज तीन गुना, आय में 40 फीसदी तक इजाफा – महाराष्ट्र के परभणी जिले के जिंतूर तालुका स्थित मालसोना गांव के किसान श्रीरंग देवबा लाड को इलाके में लोग प्यार से “दादा लाड” कहते हैं। उन्होंने कपास की खेती में जो तकनीक विकसित की, उसने न सिर्फ उनकी बल्कि आसपास के कई किसानों की उपज बदल दी। इसी नवाचार के लिए भारत सरकार ने जनवरी 2026 में उन्हें पद्म श्री सम्मान से नवाजा।
दादा लाड ने कपास के पौधों की अनुत्पादक शाखाओं की चयनात्मक छंटाई (सिलेक्टिव प्रूनिंग) की एक विधि विकसित की, जिसे अब “दादा लाड कपास तकनीक” के नाम से जाना जाता है। इस तरीके से पौधे में पोषक तत्वों का वितरण बेहतर होता है और पौधा अपनी ऊर्जा बेकार शाखाओं पर खर्च करने के बजाय फल (कपास के गोलों) पर केंद्रित करता है।
तीन गुना तक बढ़ी उपज
इस तकनीक को अपनाने वाले किसानों की कपास उपज में लगभग तीन गुना यानी 300 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि आय में 40 प्रतिशत से अधिक का इजाफा हुआ है। दादा लाड की इस उपलब्धि को वसंतराव नाईक मराठवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय ने भी मान्यता दी और उन्हें मानद डी.एससी. की उपाधि से सम्मानित किया। स्थानीय स्तर पर उन्हें “कृषि ऋषि” की उपाधि भी दी गई है।
पद्म श्री सम्मान मिलने के बाद दादा लाड की तकनीक की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हुई, और कई किसान संगठनों तथा कृषि विश्वविद्यालयों ने इसे अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल करना शुरू किया है। बिना किसी बड़ी पूंजी या नई मशीनरी के, सिर्फ छंटाई की सही विधि अपनाकर उपज बढ़ाने का यह तरीका छोटे और सीमांत कपास किसानों के लिए खासतौर पर उपयोगी माना जा रहा है।
मराठवाड़ा क्षेत्र लंबे समय से कम और अनियमित बारिश, बढ़ती लागत और कपास की अस्थिर कीमतों के लिए जाना जाता रहा है। ऐसे माहौल में दादा लाड ने सालों की मेहनत और अपने ही खेत में लगातार प्रयोग करके यह साबित किया कि पौधे की बनावट और शाखाओं के प्रबंधन में मामूली बदलाव से भी बड़ा फर्क डाला जा सकता है। उनका मानना है कि किसान को सिर्फ बाहरी संसाधनों पर निर्भर रहने के बजाय पौधे की प्राकृतिक बनावट को समझकर खेती करनी चाहिए।
गांव-गांव पहुंच रही है तकनीक
पद्म श्री सम्मान के बाद दादा लाड खुद कई जिलों में जाकर किसानों को अपनी छंटाई विधि का प्रत्यक्ष प्रदर्शन देकर सिखा रहे हैं। वसंतराव नाईक मराठवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने भी उनकी तकनीक का अध्ययन कर इसे अपने प्रक्षेत्र प्रदर्शनों (फील्ड डेमो) में शामिल किया है, ताकि इसका वैज्ञानिक सत्यापन आम किसानों तक पहुंच सके। स्थानीय कृषि अधिकारियों के अनुसार, अब आसपास के कई गांवों के किसान खुद दादा लाड के खेत पर जाकर तकनीक सीख रहे हैं।
देश के बड़े हिस्से में कपास किसान लागत बढ़ने और कीमतों में उतार-चढ़ाव की मार झेलते रहे हैं। दादा लाड की तकनीक दिखाती है कि बिना भारी निवेश के, सिर्फ खेती के तरीके में सुधार करके भी उपज और आय दोनों बढ़ाई जा सकती है। कपास बीज, उर्वरक और कीटनाशक कारोबार से जुड़े लोगों के लिए भी यह संकेत है कि आने वाले समय में प्रूनिंग जैसी कम लागत वाली तकनीकों की मांग और जागरूकता बढ़ सकती है।
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