आकांक्षी जिला कार्यक्रम: विकसित भारत 2047 की दिशा में डेटा-संचालित, जलवायु-सहिष्णु एवं समावेशी विकास का राष्ट्रीय मॉडल
लेखक: डॉ. विनोद कुमार साहू, डॉ. मनीष कुमार गोयल, डॉ. रुचि शर्मा, संपर्क – vksahu@iiti.ac.in, DST-सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, इंदौर, मध्य प्रदेश
04 अगस्त 2026, भोपाल: आकांक्षी जिला कार्यक्रम: विकसित भारत 2047 की दिशा में डेटा-संचालित, जलवायु-सहिष्णु एवं समावेशी विकास का राष्ट्रीय मॉडल – भारत का “आकांक्षी जिला कार्यक्रम” (Aspirational Districts Programme – ADP) क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने की दिशा में एक अभिनव, संस्थागत एवं दूरदर्शी प्रयास है। वर्ष 2047 तक “विकसित भारत” के निर्माण और सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals – SDGs) की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक हो गया है कि इस कार्यक्रम को केवल बुनियादी अवसंरचना के विकास तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे डेटा-संचालित सुशासन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI), भौगोलिक सूचना प्रणाली (Geographic Information System GIS), रिमोट सेंसिंग तथा जलवायु-सहिष्णु रणनीतियों के साथ पूर्णतः एकीकृत किया जाए। यह आलेख विशेष रूप से मध्य प्रदेश के संदर्भ में मैदानी सर्वेक्षण, प्रत्यक्ष अवलोकन एवं सामुदायिक संवाद से प्राप्त निष्कर्षों सहित – भविष्य के जिला-आधारित विकास का एक समग्र एवं व्यावहारिक खाका प्रस्तुत करता है।
1. भूमिका: संतुलित विकास और विकसित भारत 2047
भारत अपनी विशाल भौगोलिक एवं जनसांख्यिकीय विविधता के कारण लंबे समय से क्षेत्रीय विकास असमानताओं का सामना करता रहा है। कुछ राज्य और जिले आर्थिक विकास के मानकों पर तीव्र गति से आगे बढ़े हैं, जबकि अन्य ऐतिहासिक, भौगोलिक अथवा सामाजिक कारणों से पीछे रह गए हैं। यह असमानता न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय सुरक्षा एवं पर्यावरणीय संतुलन की दृष्टि से भी चिंता का विषय रही है।किसी भी राष्ट्र का समग्र विकास उसकी सबसे कमजोर कड़ी की मजबूती पर निर्भर करता है। “विकसित भारत 2047” का विज़न तभी साकार हो सकता है जब देश का हर जिला विकास की मुख्यधारा में शामिल हो। इसी दृष्टिकोण के अनुरूप सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) का स्थानीयकरण (Localization) अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि राष्ट्रीय नीतियाँ तभी सफल होती हैं जब उनका क्रियान्वयन ज़मीनी अर्थात् जिला और ग्राम पंचायत स्तर पर सुनिश्चित हो। “सबका साथ, सबका विकास” के मूल मंत्र को चरितार्थ करने के लिए जिला-आधारित विकास मॉडल अब एक वैकल्पिक नहीं, बल्कि अपरिहार्य आवश्यकता बन चुका है, जो सूक्ष्म-स्तरीय नियोजन (Micro-Level Planning) को व्यावहारिक रूप से संभव बनाता है।
2. आकांक्षी जिला कार्यक्रम (ADP) का विकास एवं कार्यप्रणाली
जनवरी 2018 में भारत सरकार द्वारा प्रारंभ किया गया आकांक्षी जिला कार्यक्रम, क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इसका मूल उद्देश्य देश के 112 सबसे कम विकसित जिलों को तीव्र गति से एवं प्रभावी ढंग से रूपांतरित करना है। कार्यक्रम का दार्शनिक आधार तीन “सी” (3 C’s) पर टिका है अभिसरण (Convergence), अर्थात् केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं का समन्वित क्रियान्वयन; सहयोग (Collaboration), अर्थात् नागरिकों एवं प्रशासनिक अधिकारियों के बीच सक्रिय भागीदारी; तथा प्रतिस्पर्धा (Competition), अर्थात् जिलों के बीच स्वस्थ एवं प्रेरक होड़।
जिलों का चयन समग्र गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं बुनियादी अवसंरचना की कमी जैसे मानकों के आधार पर किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत जिलों का मूल्यांकन पाँच प्रमुख विषय-क्षेत्रों में कुल 49 संकेतकों (Key Performance Indicators – KPIs) के आधार पर किया जाता है, जिनका भारांक इस प्रकार निर्धारित है स्वास्थ्य एवं पोषण (30 प्रतिशत), शिक्षा (30 प्रतिशत), कृषि एवं जल संसाधन (20 प्रतिशत), वित्तीय समावेशन एवं कौशल विकास (10 प्रतिशत), तथा बुनियादी अवसंरचना (10 प्रतिशत)। नीति आयोग द्वारा प्रतिमाह “चैंपियंस ऑफ चेंज” डैशबोर्ड के माध्यम से डेल्टा रैंकिंग (Delta Ranking) जारी की जाती है, जो जिलों की वास्तविक प्रगति को रियल-टाइम डेटा के आधार पर मापती है। इस पूरी व्यवस्था में नीति आयोग कार्यक्रम के “एंकर” (केंद्रीय समन्वयक) की भूमिका निभाता है, जबकि संबंधित केंद्रीय मंत्रालय एवं राज्य सरकारें इसके प्रत्यक्ष क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी हैं।
3. भारत के सभी आकांक्षी जिलों का राष्ट्रीय महत्व
आकांक्षी जिले केवल प्रशासनिक अथवा भौगोलिक इकाइयाँ मात्र नहीं हैं; वे भारत के भविष्य के विकास के “ग्रोथ इंजन” हैं। इन जिलों का रणनीतिक एवं सामाजिक-आर्थिक महत्व बहुआयामी है।
अधिकांश आकांक्षी जिलों में अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) एवं अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) की जनसंख्या का अनुपात राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इनका समग्र विकास एक सच्चे समावेशी भारत की पूर्वशर्त है। ये जिले प्रायः कृषि-प्रधान हैं, किंतु सिंचाई सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं; साथ ही इनमें अपार खनिज एवं वन संपदा निहित है, जिसका संवहनीय (Sustainable) दोहन राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को नई गति दे सकता है।
कई आकांक्षी जिले वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism – LWE) से प्रभावित क्षेत्रों में स्थित हैं। विकास की कमी ही उग्रवाद के मूल कारणों में से एक है; अतः इन क्षेत्रों में विकास प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ विषय है। इसी प्रकार, सीमावर्ती एवं पर्वतीय जिलों में बुनियादी अवसंरचना का विकास सामरिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में सूखा-प्रवण क्षेत्रों में जल संसाधन प्रबंधन एवं आजीविका सुरक्षा भविष्य के राष्ट्रीय संकटों को टालने के लिए अनिवार्य बन चुकी है।
4. जिला स्तर के डेटा का महत्व (Data-Driven Governance)
भविष्य का प्रशासन अनुमानों पर नहीं, बल्कि ठोस साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए। डेटा-संचालित सुशासन (Data-Driven Governance) आकांक्षी जिलों के लिए एक निर्णायक “गेम-चेंजर” सिद्ध हो सकता है। सटीक एवं हाइपर-लोकल डेटा के माध्यम से नीतियाँ वास्तविक ज़मीनी आवश्यकताओं के अनुरूप बनाई जा सकती हैं इसी को साक्ष्य-आधारित नीति (Evidence-Based Policy) कहा जाता है। ब्लॉक एवं पंचायत स्तर के डेटा से यह सुनिश्चित होता है कि संसाधन ठीक वहीं आवंटित हों जहाँ उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है अर्थात् लक्षित हस्तक्षेप (Targeted Intervention) संभव होता है।
रियल-टाइम मॉनिटरिंग (Real-Time Monitoring) योजनाओं की प्रगति पर निगरानी रखने, धन के रिसाव (Leakage) को रोकने तथा प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने में सहायक है। साथ ही, ऐतिहासिक एवं वर्तमान डेटा के विश्लेषण से कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निर्णय-प्रणालियाँ महामारी, सूखा अथवा फसल-विफलता जैसी भविष्य की चुनौतियों की पूर्व-चेतावनी देने में सक्षम हैं, जिससे प्रशासन प्रतिक्रियात्मक (Reactive) के बजाय सक्रिय (Proactive) बन सकता है।
5. मध्य प्रदेश पर विशेष फोकस: एक केस स्टडी
मध्य प्रदेश, भारत का “हृदय प्रदेश”, आकांक्षी जिला कार्यक्रम की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण-स्थल है। राज्य के आठ जिले बड़वानी, छतरपुर, दमोह, गुना, खंडवा, राजगढ़, सिंगरौली एवं विदिशा इस कार्यक्रम का हिस्सा हैं।
मध्य प्रदेश को एक पृथक जिला-आधारित विकास मॉडल की आवश्यकता क्यों है, इसे समझने के लिए निम्नलिखित पाँच आयाम महत्वपूर्ण हैं। पहला, राज्य में देश की सबसे बड़ी जनजातीय आबादी (गोंड, भील, बैगा आदि) निवास करती है, और आकांक्षी जिलों में इनके समग्र विकास शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कुपोषण-मुक्ति के बिना राष्ट्रीय लक्ष्य अधूरे रह जाएँगे। दूसरा, मालवा के पठार से लेकर विंध्य एवं सतपुड़ा के वनों तक फैली भौगोलिक एवं कृषि-विविधता के कारण राज्य की कृषि वर्षा पर अत्यधिक निर्भर है। तीसरा, बुंदेलखंड एवं बघेलखंड जैसे क्षेत्रों में गंभीर जल संकट व्याप्त है, जिसके समाधान हेतु जिला-स्तरीय सूक्ष्म-जलग्रहण प्रबंधन (Micro-Watershed Management) अत्यंत आवश्यक है। चौथा, राज्य के विशाल वन क्षेत्र कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं, परंतु वनाग्नि एवं अवैध कटाई का खतरा निरंतर बना रहता है। और पाँचवाँ, मध्य प्रदेश तेज़ी से बढ़ते तापमान, अनियमित मानसून एवं सूखे के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, जिसका सीधा दुष्प्रभाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
मध्य प्रदेश के 8 आकांक्षी जिलों की सांख्यिकीय प्रोफाइल
नीचे दी गई तालिका जनगणना 2011 एवं नीति आयोग की आधार-रैंकिंग (अप्रैल 2019, कुल 112 जिलों में से) पर आधारित संदर्भ-आँकड़े प्रस्तुत करती है, जो किसी भी जिला-स्तरीय हस्तक्षेप-योजना के लिए न्यूनतम आवश्यक पृष्ठभूमि प्रदान करती है
| क्र. | जिला | क्षेत्रफल (वर्ग किमी) | जनसंख्या (2011) | जनसंख्या घनत्व (प्रति वर्ग किमी) | साक्षरता दर | लिंगानुपात (प्रति 1000 पुरुष) | आधार-रैंकिंग (2019) |
| 1 | बड़वानी | 5,427 | 13,85,881 | 255 | 49.08% | 982 | 77 |
| 2 | छतरपुर | 8,687 | 17,62,375 | 203 | 64.90% | 884 | 99 |
| 3 | दमोह | 7,306 | 12,64,219 | 173 | 70.92% | 913 | 48 |
| 4 | गुना | 6,390 | 12,41,519 | 194 | 65.10% | 910 | 106 |
| 5 | खंडवा (पूर्व निमाड़) | 8,307 | 13,10,061 | 158 | 67.53% | 944 | 96 |
| 6 | राजगढ़ | 6,143* | 15,45,814* | 249* | 61.21% | 956 | 28 |
| 7 | सिंगरौली | 5,672 | 11,78,273 | 208 | 62.36% | 916 | 23 |
| 8 | विदिशा | 7,371 | 14,58,875 | 198 | 59–71%** | 896 | 31 |
इस से तीन महत्वपूर्ण अवलोकन उभरते हैं। पहला, साक्षरता के मामले में बड़वानी (49.08%) राज्य के औसत से सर्वाधिक पीछे है, जो इसकी उच्च जनजातीय आबादी एवं दुर्गम भौगोलिक संरचना से जुड़ा हुआ है। दूसरा, छतरपुर व गुना में लिंगानुपात (क्रमशः 884 व 910) राज्य के औसत (931) से नीचे है, जो लिंग-आधारित सामाजिक हस्तक्षेप की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित करता है। तीसरा, वित्तीय समावेशन सूचकांक (2022) के अनुसार बड़वानी, खंडवा एवं सिंगरौली “निम्न वित्तीय समावेशन” श्रेणी में वर्गीकृत हैं, जो डिजिटल बैंकिंग एवं प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) की पहुँच बढ़ाने की तात्कालिकता दर्शाता है। साथ ही, आधार-रैंकिंग में सिंगरौली, राजगढ़ व विदिशा की अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति यह संकेत नहीं देती कि इन जिलों में सुधार की गुंजाइश समाप्त हो गई है, बल्कि यह निरंतर निगरानी बनाए रखने की आवश्यकता दर्शाती है।
मध्य प्रदेश के आकांक्षी जिलों में डेटा-संचालित एवं स्थानीयकृत योजनाएँ राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की क्षमता रखती हैं, बशर्ते इनका क्रियान्वयन उपर्युक्त सांख्यिकीय वास्तविकताओं के अनुरूप भिन्नीकृत (Differentiated) ढंग से किया जाए।
6. मैदानी सर्वेक्षण, प्रत्यक्ष अवलोकन एवं सामुदायिक संवाद से प्राप्त प्रमुख निष्कर्ष
मध्य प्रदेश के आकांक्षी जिलों एवं आकांक्षी विकासखंडों में किए गए विस्तृत मैदानी सर्वेक्षण, प्रत्यक्ष अवलोकन तथा किसानों, ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों, महिला स्व-सहायता समूहों, शिक्षकों, आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, युवाओं एवं स्थानीय नागरिकों के साथ आयोजित सामूहिक चर्चाओं (Focused Group Discussions – FGD) से यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि इन क्षेत्रों की अधिकांश जनसंख्या आज भी ग्रामीण एवं कृषि-आधारित जीवनशैली पर निर्भर है। यद्यपि पिछले वर्षों में विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से आधारभूत विकास में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, फिर भी शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि वित्त, सामाजिक सुरक्षा एवं गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाओं तक समान पहुँच अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
मैदानी अध्ययन से पहचानी गई प्रमुख चिंताएँ एवं लक्षित कार्यान्वयन प्राथमिकताए
| क्र. | अध्ययन क्षेत्र | मैदानी अध्ययन से प्रमुख चिंता | लक्षित कार्यान्वयन |
| 1 | शिक्षा एवं कौशल विकास | गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षकों, डिजिटल संसाधनों एवं कौशल प्रशिक्षण की कमी। | मिशन शिक्षा उत्कृष्टता एवं डिजिटल कौशल विकास |
| 2 | स्वास्थ्य एवं पोषण | विशेषज्ञ चिकित्सकों, नर्सों, स्वास्थ्य सुविधाओं एवं पोषण सेवाओं की कमी। | सुदृढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य एवं टेलीमेडिसिन मिशन |
| 3 | बुनियादी अवसंरचना एवं डिजिटल संपर्क | सड़क, पेयजल, बिजली, इंटरनेट एवं सार्वजनिक सेवाओं तक सीमित पहुँच। | समेकित ग्रामीण अवसंरचना एवं डिजिटल कनेक्टिविटी मिशन |
| 4 | GIS, भू-स्थानिक डेटा एवं डिजिटल सुशासन | ग्राम एवं ब्लॉक स्तर पर भू-स्थानिक एवं विभागीय आँकड़ों का सीमित उपयोग। | एकीकृत जिला GIS एवं निर्णय सहायता प्रणाली |
| 5 | कृषि, जल एवं जलवायु-स्मार्ट प्रबंधन | किसानों को मौसम, मिट्टी, जल एवं फसल संबंधी समयबद्ध जानकारी का अभाव। | जलवायु-स्मार्ट डिजिटल कृषि प्रणाली |
| 6 | जलवायु जोखिम एवं आपदा प्रबंधन | सूखा, हीटवेव, आकाशीय बिजली एवं बाढ़ जैसी आपदाओं के प्रति सीमित तैयारी। | जिला बहु-आपदा पूर्व चेतावनी एवं लचीलापन प्रणाली |
| 7 | जल सुरक्षा एवं प्राकृतिक संसाधन | भूजल दोहन, जल-स्रोतों का क्षरण एवं जल उपलब्धता में असमानता। | समेकित जल सुरक्षा एवं जलग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम |
| 8 | जैव विविधता एवं सामुदायिक संरक्षण | प्राकृतिक आवासों पर बढ़ता दबाव एवं स्थानीय पारंपरिक ज्ञान का सीमित उपयोग। | जिला जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन कार्यक्रम |
| 9 | कृषि वित्त, आजीविका एवं सामाजिक सुरक्षा | कृषि ऋण, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा एवं वित्तीय समावेशन तक असमान पहुँच। | कृषि वित्त, आजीविका एवं सामाजिक सुरक्षा मिशन |
| 10 | मानव विकास एवं संस्थागत सुदृढ़ता | शिक्षा, स्वास्थ्य, शासन एवं सामुदायिक भागीदारी में क्षेत्रीय असमानताएँ। | मानव विकास एवं सुशासन मिशन |
7. शोधकर्ता का नीतिगत दृष्टिकोण (Author’s Policy Perspective)
शोधकर्ता डॉ. विनोद कुमार साहू के प्रत्यक्ष मैदानी अनुभवों, किसानों के साथ व्यापक संवाद, स्थानीय प्रशासनिक प्रतिनिधियों से चर्चा तथा ग्रामीण समुदायों के सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण के आधार पर यह स्पष्ट रूप से रेखांकित होता है कि मध्य प्रदेश के आकांक्षी जिलों एवं आकांक्षी विकासखंडों के समग्र विकास की वास्तविक शुरुआत तीन मूलभूत स्तंभों से होनी चाहिए।
पहला स्तंभ शिक्षा है, क्योंकि शिक्षित समाज ही आधुनिक कृषि, डिजिटल तकनीक, वैज्ञानिक सोच एवं जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन को प्रभावी रूप से अपनाने में सक्षम होगा। दूसरा स्तंभ स्वास्थ्य है, क्योंकि स्वस्थ नागरिक ही उत्पादक अर्थव्यवस्था, सामाजिक विकास एवं मानव पूँजी निर्माण की आधारशिला हैं। तीसरा स्तंभ सुरक्षा एवं आपदा-लचीलापन है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में प्रत्येक नागरिक को प्राकृतिक आपदाओं, आकाशीय बिजली, हीटवेव तथा अन्य पर्यावरणीय जोखिमों से सुरक्षित रखना सतत विकास की अनिवार्य पूर्वशर्त है। इन तीनों क्षेत्रों में मिशन-मोड में निवेश किए बिना ग्रामीण भारत को जलवायु-सहिष्णु, आत्मनिर्भर एवं विकसित बनाना संभव नहीं होगा।
सभी आकांक्षी जिलों के लिए नवीन नीति सुझाव
| क्र. | नीति क्षेत्र | प्रमुख हस्तक्षेप | अपेक्षित परिणाम |
| 1 | डेटा एवं डिजिटल सुशासन | राष्ट्रीय आकांक्षी जिला डेटा मंच | साक्ष्य-आधारित योजना एवं निर्णय |
| 2 | GIS एवं भू-स्थानिक प्रबंधन | जिला एवं ग्राम GIS प्रणाली | संसाधनों का वैज्ञानिक नियोजन |
| 3 | शिक्षा | मिशन शिक्षा एवं डिजिटल अधिगम | गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं कौशल विकास |
| 4 | स्वास्थ्य | टेलीमेडिसिन एवं डिजिटल स्वास्थ्य मिशन | सुलभ एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ |
| 5 | कृषि | जलवायु-स्मार्ट डिजिटल कृषि मिशन | उत्पादकता एवं कृषि लचीलापन |
| 6 | जलवायु एवं आपदा प्रबंधन | बहु-आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली | जोखिम न्यूनीकरण एवं त्वरित प्रतिक्रिया |
| 7 | जल एवं प्राकृतिक संसाधन | समेकित जल सुरक्षा एवं संसाधन प्रबंधन | सतत जल एवं संसाधन संरक्षण |
| 8 | जैव विविधता एवं पर्यावरण | जिला जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी मिशन | पारिस्थितिकी संरक्षण एवं पुनर्स्थापन |
| 9 | पंचायत एवं स्थानीय शासन | पंचायत निर्णय सहायता प्रणाली | डेटा-संचालित स्थानीय शासन |
| 10 | क्षमता निर्माण एवं वित्तीय समावेशन | कृषि ऋण एवं क्षमता निर्माण मिशन | संस्थागत दक्षता एवं किसान सशक्तिकरण |
निष्कर्ष
भारत का समावेशी एवं सतत विकास उसके आकांक्षी जिलों की प्रगति पर निर्भर करता है। आकांक्षी जिला कार्यक्रम ने अभिसरण, सहयोग एवं प्रतिस्पर्धा के माध्यम से जिला-आधारित विकास की सुदृढ़ आधारशिला स्थापित की है। तथापि, विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु इस कार्यक्रम को डेटा-संचालित, प्रौद्योगिकी-सक्षम एवं जलवायु-सहिष्णु विकास मॉडल के रूप में उन्नत करना आवश्यक है।
मध्य प्रदेश के आकांक्षी जिलों में किए गए मैदानी अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुदृढ़ स्वास्थ्य सेवाएँ, आधारभूत अवसंरचना, कृषि वित्त, सुरक्षित आजीविका, प्रभावी स्थानीय शासन तथा जलवायु अनुकूलन क्षमता ग्रामीण विकास की प्रमुख प्राथमिकताएँ हैं। अतः भविष्य की विकास रणनीतियों में भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS), रिमोट सेंसिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सुशासन, जलवायु अनुकूलन तथा सामुदायिक सहभागिता का समेकित उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
इस अध्ययन के आधार पर “आकांक्षी जिला कार्यक्रम 2.0” प्रारम्भ करने की अनुशंसा की जाती है, जिसमें वर्तमान प्रदर्शन संकेतकों के साथ जलवायु लचीलापन सूचकांक, जैव विविधता सूचकांक, डिजिटल सुशासन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निर्णय सहायता प्रणाली, जल सुरक्षा, डिजिटल कृषि, शिक्षा एवं स्वास्थ्य गुणवत्ता सूचकांक तथा जिला सतत विकास सूचकांक जैसे नवीन आयामों को सम्मिलित किया जाए।
यदि आकांक्षी जिलों में शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसंरचना, कृषि, जलवायु लचीलापन एवं डेटा-संचालित सुशासन पर आधारित मिशन-उन्मुख हस्तक्षेपों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाता है, तो यही जिले विकसित भारत 2047 के सबसे सशक्त, समावेशी, आत्मनिर्भर एवं सतत विकास मॉडल के रूप में स्थापित होंगे। वस्तुतः विकसित भारत की वास्तविक शक्ति उसके सशक्त जिलों, सक्षम संस्थानों तथा सुदृढ़ स्थानीय समुदायों में निहित है।
आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture

