भारतीय कृषि में सुधार क्यों अटके हुए हैं? आखिर रास्ता रोक कौन रहा है?
लेखक: प्रवेश शर्मा, अध्यक्ष, स्टीयरिंग कमेटी, नेशनल एसोसिएशन ऑफ फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन्स (NAFPO)
07 अगस्त 2026, नई दिल्ली: भारतीय कृषि में सुधार क्यों अटके हुए हैं? आखिर रास्ता रोक कौन रहा है? –
मुख्य बातें
- 1991 के बाद हर क्षेत्र बदला, लेकिन कृषि सुधार अधूरे रह गए।
- भूमि, श्रम और पूंजी से जुड़े पुराने कानून आज भी विकास में बाधा हैं।
- किरायेदार किसान आज भी कानूनी पहचान से वंचित हैं।
- सस्ती खाद्य नीति की कीमत अक्सर किसानों की आय चुकाती है।
- स्थायी सुधारों के बिना भारत वैश्विक कृषि प्रतिस्पर्धा में पीछे रह सकता है।
तीन दशक बाद भी कृषि सुधार क्यों अधूरे हैं?
1991 के आर्थिक सुधारों के बाद उद्योग, व्यापार, वित्त और सेवा क्षेत्रों में व्यापक बदलाव हुए, लेकिन कृषि क्षेत्र आज भी लगभग उसी नीति ढांचे के अंतर्गत संचालित हो रहा है जो उदारीकरण से पहले अस्तित्व में था। समय-समय पर कृषि मंडियों में सुधार, सब्सिडी वितरण प्रणाली में बदलाव और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) जैसी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) योजनाएं लागू की गईं, किंतु कृषि व्यवस्था की मूलभूत समस्याओं को दूर करने वाले व्यापक सुधार अब तक नहीं हो सके।
वर्ष 2020 में केंद्र सरकार ने कृषि विपणन और अनुबंध खेती (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग) से जुड़े तीन कृषि कानून लागू किए थे, लेकिन उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ राज्यों में हुए किसान आंदोलनों के बाद इन्हें वापस लेना पड़ा। इससे स्पष्ट हो गया कि कृषि सुधारों पर राजनीतिक सहमति अभी भी बहुत कमजोर है।
कृषि सुधारों पर राजनीतिक सहमति क्यों नहीं बन पाई?
पिछले 35 वर्षों में केंद्र और राज्यों में अनेक राजनीतिक दलों की सरकारें आईं, लेकिन किसी ने भी कृषि सुधारों के मूल प्रश्नों को गंभीरता से नहीं छुआ। इसका कारण केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि भारतीय कृषि की जटिल राजनीतिक अर्थव्यवस्था है।
भूमि, श्रम और पूंजी जैसे कृषि के आधारभूत संसाधनों के बाजार आज भी पुराने ढांचे में काम कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में सुधारों का अभाव ही कृषि परिवर्तन की सबसे बड़ी बाधा बन गया है।
भूमि सुधार अधूरे, किरायेदार किसान अब भी असुरक्षित
स्वतंत्रता के बाद जमींदारी और पुरानी काश्तकारी व्यवस्थाओं को समाप्त करना एक ऐतिहासिक कदम था, लेकिन इसके बाद भूमि सुधार लगभग ठहर गए। आज भी बड़ी संख्या में किसान किराये पर जमीन लेकर खेती करते हैं, लेकिन अधिकांश के पास वैधानिक मान्यता नहीं है।
ऐसे किसानों को बैंक ऋण, फसल बीमा, सरकारी योजनाओं और अन्य संस्थागत सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाता। भूमि पर कानूनी अधिकार न होने से वे भूमि सुधार या आधुनिक तकनीकों में निवेश करने से भी बचते हैं, जिससे कृषि उत्पादकता प्रभावित होती है।
भूमि राज्य सूची का विषय होने के बावजूद केरल, जम्मू-कश्मीर और सीमित रूप से पश्चिम बंगाल को छोड़कर अधिकांश राज्यों में प्रभावी भूमि पट्टा (लीज) कानून विकसित नहीं हो सके। इसका बड़ा कारण यह है कि बड़े भू-स्वामी स्थानीय राजनीति पर प्रभाव रखते हैं और किरायेदारों के पक्ष में सुधारों का विरोध करते हैं।
मशीनीकरण पर झिझक, खेती की उत्पादकता पर असर
भारतीय कृषि नीति ने बेहतर बीज, सिंचाई और उर्वरकों को तो बढ़ावा दिया, लेकिन व्यापक कृषि मशीनीकरण को लेकर हमेशा संकोच दिखाई दिया। यह आशंका जताई जाती रही कि मशीनों से ग्रामीण रोजगार प्रभावित होगा।
वास्तविकता इसके विपरीत है। आज अधिकांश राज्यों में बुवाई और कटाई जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के दौरान कृषि श्रमिकों की कमी महसूस की जा रही है।
मशीनीकरण के सीमित विस्तार के कारण भारत की कृषि उत्पादकता चीन सहित अनेक देशों से पीछे है। छोटे किसानों के पास मशीनें खरीदने की क्षमता नहीं है और अधिकांश क्षेत्रों में कस्टम हायरिंग सेंटर जैसी साझा मशीन सेवाएं भी पर्याप्त नहीं हैं।
सस्ता कर्ज नहीं, साहूकारों पर निर्भर किसान
हालांकि सरकार संस्थागत कृषि ऋण बढ़ाने की बात करती है, लेकिन छोटे और सीमांत किसानों का बड़ा हिस्सा आज भी साहूकारों, बड़े भू-स्वामियों और मंडी व्यापारियों से महंगा ऋण लेने को मजबूर है।
मंडी व्यापारी अक्सर कम ब्याज पर बैंक ऋण प्राप्त कर किसानों को अधिक ब्याज पर पैसा उधार देते हैं। इससे किसानों की लागत बढ़ती है और वे कर्ज के चक्र से बाहर नहीं निकल पाते।
परंपरागत ग्रामीण पूंजी व्यवस्था प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता की बजाय वर्तमान व्यवस्था को बनाए रखने में अधिक रुचि रखती है। सहकारी संस्थाओं, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और सूक्ष्म वित्त संस्थाओं को मजबूत करने के अनेक प्रयास राजनीतिक हस्तक्षेप, ऋण माफी की संस्कृति और अत्यधिक नियमन के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके।
सस्ती खाद्य नीति का बोझ किसान क्यों उठाए?
भारत में खाद्य महंगाई राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील विषय है। इसलिए सरकारें अक्सर उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए निर्यात प्रतिबंध, स्टॉक सीमा और आयात में छूट जैसे कदम उठाती हैं।इन निर्णयों से अल्पकाल में उपभोक्ताओं को लाभ अवश्य मिलता है, लेकिन किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण दलहन और खाद्य तेल हैं। किसानों को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन जैसे ही कीमतें बढ़ती हैं, सस्ते आयात खोल दिए जाते हैं। परिणामस्वरूप अगले सीजन में किसानों को कम कीमत मिलती है और उनका निवेश प्रभावित होता है।इस प्रकार मूल्य स्थिरता का पूरा भार किसानों पर डाल दिया जाता है, जबकि उपभोक्ता कम कीमत का लाभ उठाते हैं।
राजनीतिक जोखिम ने सुधारों को रोक रखा है
भूमि, श्रम, पूंजी और मूल्य नीति की मौजूदा व्यवस्था अनेक प्रभावशाली हित समूहों को लाभ पहुंचाती है। इसलिए कोई भी सरकार ऐसे सुधार लागू करने से हिचकती है जिनका राजनीतिक विरोध हो सकता है।
कृषि सुधारों के लाभ धीरे-धीरे सामने आते हैं, जबकि उनका राजनीतिक विरोध तुरंत दिखाई देता है। यही कारण है कि सुधारों की चर्चा तो होती है, लेकिन निर्णय के समय राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर पड़ जाती है।
चीन से क्या सीख सकता है भारत?
चीन ने कृषि परिवर्तन की शुरुआत भूमि उपयोग सुधार, किसानों को आसान ऋण और व्यापक मशीनीकरण से की। इन कदमों से उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ी, जिससे आगे के सुधारों के लिए सामाजिक और राजनीतिक समर्थन भी मिला।भारत को भी कृषि सुधारों की शुरुआत इन्हीं बुनियादी क्षेत्रों से करनी होगी।
भारत के लिए सुधारों की प्राथमिकताएं
सबसे पहले भूमि पट्टा (लीज) व्यवस्था को कानूनी मान्यता देकर किरायेदार किसानों को अधिकार और सुरक्षा प्रदान करनी होगी।
इसके साथ ही संस्थागत ऋण का दायरा बढ़ाना, साझा कृषि मशीन सेवाओं का विस्तार करना तथा व्यापार एवं मूल्य नीति को स्थिर और पूर्वानुमान योग्य बनाना आवश्यक है ताकि किसान अचानक होने वाले सरकारी निर्णयों से प्रभावित न हों।
जब तक किसान को केवल सस्ता भोजन उपलब्ध कराने का साधन माना जाएगा…
भारतीय कृषि के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बल्कि किसानों को सम्मानजनक और लाभकारी आय सुनिश्चित करने की है।
जब तक नीति-निर्माण में किसान को केवल शहरी उपभोक्ताओं के लिए सस्ता भोजन उपलब्ध कराने का माध्यम माना जाता रहेगा, तब तक वास्तविक कृषि सुधार संभव नहीं होंगे।
आज वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और आपूर्ति श्रृंखला जैसी नई चुनौतियां सामने हैं। ऐसे समय में कृषि सुधार केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि भारत की सामरिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन चुके हैं।
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