भिंडी फसल मैं लगने वाले कीट एवं इनकी रोकथाम

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भिंडी को बचायें कीटों से

विश्व में सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में भारत प्रमुख स्थान रखता है। भारतीय कृषि का एक चौथाई भाग औद्योगिक फसलों के अंतर्गत आता है जिसमें सब्जियों का एक अहम स्थान है। भिंडी भारत वर्ष की प्रमुख फसल है जिसकी खेती विभिन्न क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जाती है। अपने उच्च पोषण मान के कारण भिंडी का सेवन सभी आयुवर्ग के लोगों के लिए लाभदायक है। इसमें मैग्निशियम, पोटेशियम, विटामिन ए, बी, तथा कार्बोहाइड्रेट की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। चूंकि यह उपभोक्ताओं में अत्यंत लोकप्रिय है अत: इसका बाजार मूल्य अच्छा मिलता है। जिससे किसानों को फायदा होता है तथा उनको इसकी खेती के लिए प्रोत्साहन मिलता है। लेकिन भिंडी की फसल में अनेक प्रकार के कीटों का प्रकोप होता है जो उपज का एक बड़ा हिस्सा नष्ट कर देते हैं अत: प्रस्तुत लेख में किसान भाइयों के लिए इन फसलों में लगने वाले कीटों और रोकथाम के बारे में जानकारी दी गई है जिसका लाभ उठाकर वे इन समस्याओं के प्रबंधन की उचित तकनीक अपना सकते हैं।

भिन्डी मैं लगने वाले कीट एवं इनका प्रबंधन

 

सफेद मक्खी :-

ये सूक्ष्म आकार के कीट होते हैं तथा इन कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों ही निचली सतह से रस चूसकर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। जिससे पौधे की वृद्धि कम होती है व उपज में कमी आ जाती है। ये पीत शिरा मोजैक (पीलिया) रोग भी फैलाते हैं।

प्रबंधन:- 
  • भिंडी को कपास के पास ना लगाएं।
  • खरपतवार जैसे कि कंधी बूटी अगर आस पास उगी हुई हो तो उसे उखाड़ दें।
  • बीज का उपचार 5 ग्राम इमीडाक्लोप्रिड 70 डब्लयू. एस. या 5.7 ग्राम क्रूजर 35 एफ.एस. लेकर प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचार करें। बीज का उपचार करने से पहले बीज को 6 से 12 घंटे तक पानी में भिगोएं। भीगे हुए बीज को     आधे से एक घंटे तक छाया में सुखायें और ऊपर लिखी हुई दवाई डालकर अच्छी तरह से बीज में मिला लें।
  • अगर बीज का उपचार ना किया गया हो तो एक्टारा 25 डब्ल्यू. जी. कीटनाशक दवा की मात्रा 40 ग्राम लें। इसे 150-200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ की दर से छिड़कें। जरुरत हो तो छिड़काव 20 दिन के अंतराल पर फिर से करें।

 

हरा तेला :-

ये कीट हरे पीले रंग के होते हैं। इसके शिशु व प्रौढ़ पत्तों की निचली सतह पर रहकर रस चूसते हैं। इनका प्रकोप मई से सितम्बर मास तक होता है। रस चूसने की वजह से पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और किनारों के ऊपर की ओर मुड़ कर कप का आकार बना लेती हैं। अगर इस कीट का प्रकोप अधिक हो जाए तो पत्तियां जल जाती हैं और मुरझा कर सूख जाती हैं।

प्रबंधन :- 
  • फसल को तेले से बचाने के लिए बीज का उपचार करें। बीज उपचार के लिए इमीडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यू. एस. 5 ग्राम या क्रूजर 35 एफ. एस. 5-7 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से लें।
  • उपचार से पहले बीज को 6 से 12 घंटे तक पानी में भिगोयें। अब इस भीगे हुए बीज को आधे से लेकर 1 घंटे तक छाया में सुखायें, जब यह सूख जाएं तो बताई गई दवाई डालकर इसे अच्छे से मिला दें।
  • भिण्डी की खड़ी फसल में हरे तेले की रोकथाम के लिए एक्टारा 25 डब्ल्यू . जी. की. 40 ग्राम मात्रा को 150-200 लीटर पानी में मिलाकर घोल बनाएं और फिर इस घोल को प्रति एकड़ की दर से छिड़कें। 
  • भिण्डी में जब फल लग जाएं और वह खाने के लिए उगाई गई हों तो 300-500 मि.ली. मैलाथियान 50 ई.सी. को 200-300 लीटर पानी में मिलाकर एक घोल बनाएं और इसे 15 दिन के अंतराल पर प्रति एकड़ की दर से छिड़कें।

 

अष्टपदी:-

यह माईट पौधों की पत्तियों की निचली सतह पर भारी संख्या में कालोनी बनाकर रहते हंै। इसके शिशु व प्रौढ़ पत्तों की निचली सतह से रस चूसते हैं। ग्रसित हुए पत्तों पर छोटे-छोटे सफेद रंग के धब्बे बन जाते हैं। यह माइट पत्तियों पर जाला बना देती है। अधिक प्रकोप होने पर संपूर्ण पौधा सूख कर नष्ट हो जाता है।

प्रबंधन:- 
  • लाल माईट के प्रबंधन के लिए प्रेम्पट 20 ई. सी. नामक कीटनाशक दवाई का प्रयोग करें। इसका 300 मि.ली. प्रति एकड़ के हिसाब से दो छिड़काव 10 दिन के अंतर पर करें।



चित्तीदार तना व फलबेधक सूण्डी :-

इस कीट का प्रकोप जून से अक्टूबर तक अधिक होता है। यह सूण्डी बेलन के आकार की होती है। इसके शरीर पर हल्के पीले संतरी, भूरे रंग के धब्बे होते हैं। आरम्भिक अवस्था में ये सूंडियां कोपलों में छेद करके अन्दर पनपती रहती है जिसकी वजह से कोपलें मुरझा जाती हैं और सूख जाती हैं बाद में ये सूंडियां कलियों और फलों फूलों, को नुकसान करती हैं। ये फल में छेद बनाकर अंदर घुसकर गूदा खाती रहती हैं। जिससे फल कीट ग्रसित हो जाते हैं और भिण्डी खाने योग्य नहीं रहती।

प्रबंधन:- 
  • क्षतिग्रस्त पौधों के तनों तथा फलों को एकत्रित करके नष्ट कर देें।
  • फल छेदक की निगरानी के लिए 5 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर लगायें।
  • फल शुरु होने पर 400-500 मि.ली. मैलाथियान 50 ई.सी. 75-80 मि.ली. स्पाईनोसैड 45 एस.सी. को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़कें। इसे 15 दिन के अंतर पर दोहराएं।
  • समय-समय पर कीट ग्रसित कोपलें व फल तोड़कर मिट्टी में गहरा दबा दें या जला दें।

 

 

  • रूमी रावल
  • कृष्णा रोलानिया
  • email : rawal78@gmail.com
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