आलू फसल में खाद का प्रबंधन कैसे करें

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आलू उत्पादन में मुख्य पोषक तत्व एनपीके की मात्रा कई बातों पर निर्भर करती है जैसे कि मृदा का प्रकार, उसकी पोषक तत्व धारण करने की क्षमता आलू की किस्म व पोषक तत्व हम किस माध्यम से दे रहे हैं। अनुसंधान व प्रयोगों के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया है कि सतपुड़ा पठार क्षेत्रों एनपीके (120,100,100 किग्रा) मात्रा उपयुक्त पाई।

नाइट्रोजन की उपलब्धता के लिए कौन-कौन से उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए 

आलू उत्पादन में नाइट्रोजन के लिए सबसे उपयुक्त उर्वरक अमोनिया सल्फेट व अमोनिया नाइट्रेट है इसके बाद कैल्शियम अमोनिया नाइट्रेट, अमोनिया क्लोराइड व यूरिया है। नाइट्रोजन उर्वरक की क्षमता मृदा प्रकार, केटायन एक्सचेंज क्षमता व पीएच द्वारा प्रभावित होती है। जैसे कि यूरिया का उपयोग हम मध्यम अम्लीय मृदा में कैल्शियम अमोनिया नाइट्रेट का उपयोग अम्लीय मृदा में कर सकते हैं। इसके विपरीत क्षारीय मृदाओं में इनका उपयोग नहीं करते।

आलू की फसल पोषक तत्वों के प्रति अधिक सहनशील होती है क्योंकि ये उथली व फैली जड़ों वाली फसल है आलू बहुत अधिक मात्रा में पोषक तत्व ग्रहण करता है अत: पौधे बढ़वार एवं अधिक उत्पादन के लिए इसका उपयुक्त खाद प्रबंधन बहुत ही आवश्यक है नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटेशियम तीन प्रमुख पोषक तत्व है जो आलू उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। नाइट्रोजन के उपायों से पौधों की बढ़वार में महत्वपूर्ण भूमिका के साथ-साथ कंदों की वृद्धि व कंदों के बनने की प्रक्रिया में सहायक होती है जिसके फलस्वरूप अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। फास्फोरस पौधे की आंतरिक संरचना के एवं कंदों का आकार एवं संख्या बढ़ाने में सहायक होता है। पोटेशियम कंद का आकार, शुष्क पदार्थ में वृद्धि रोग व कीट के प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करता है। भारत में आलू का औसत उत्पादन 19 टन/हे. है इसका मुख्य कारण उचित मात्रा में खाद व उर्वरक का उपयोग न करना है। 

यूरिया का उपयोग 

आलू लगाते समय यूरिया को 50 किग्रा तक नत्रजन यूरिया के द्वारा दे सकते हैं। बाकी का बचा हुआ नत्रजन प्रति हे. मिश्रित खाद द्वारा दें। इससे अधिक नत्रजन यूरिया से देने पर आलू के अंकुरण पर विपरीत प्रभाव होता है।

आलू की फसल 30 दिनों की होने पर 20 किग्रा नत्रजन प्रति हे. यूरिया के द्वारा दें एवं मिट्टी चढ़ाने का कार्य करें। यूरिया का 1.5 प्रतिशत घोल बनाकर 40-45 दिन की फसल पर छिड़काव करने से उपज में वृद्धि होती है। 

फास्फोरस की उपलब्धता के लिए उर्वरक व उनका उपयोग

फास्फोरस दूसरा आलू उत्पादन में सीमित पोषक इसकी कमी से पौधों की बढ़वार रूक जाती है मुख्यत: पौधे की प्रारंभिक अवस्था में पौधे गहरे हरे रंग के ही हो जाते हैं व पत्तियां गिरने लगती हैं। फास्फोरस के उपयोग से जड़ के विकास में सहायता मिलती है। फास्फोरस की मात्रा मृदा में उपलब्धता व मृदा स्थिरीकरण की क्षमता निर्भर करता है। आलू उत्पादन में फास्फोरस की मात्रा 80-180 किग्रा/हे. उपयोग की जाती है। और यह मात्रा जगह पर निर्भर करती है। जैसे पंजाब, उत्तरप्रदेश व बिहार की एल्यूवियल मृदा में इसकी 50-150 किग्रा/हे. की मात्रा उपयोग की जाती है। वहीं तराई मृदाओं जैसे रांची आदि में 190 किग्रा/हे. फास्फोरस लगता है। सतपुड़ा पठारी क्षेत्रों में फास्फोरस 100 किग्रा/हे. दर से आलू कंद लगाने के पूर्व डाला जाता है। फास्फोरस की उपलब्धता के लिए पानी में घुलनशील फास्फोरस उर्वरक जैसे सुपर फास्फेट और डाई अमोनिया फास्फेट (डीएपी) का उपयोग अधिक प्रभावी होता है। आलू कंद को 1.5 प्रतिशत सुपर फास्फेट + 0.5 यूरिया + 0.2 प्रतिशत मेंकोजेब घोल में उपचारित करने से फास्फोरस की आवश्यकता में 50 प्रतिशत तक की कमी आती है।

पोटेशियम

पोटेशियम तत्व की कमी से कंद की गुणवत्ता के साथ उसकी रसायनिक संरचना पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। पोटेशियम का उपयोग दो बार 50 प्रतिशत आलू लगाते समय व बाकी का 50 प्रतिशत मिट्टी चढ़ाते समय डालेें इसके कंद की संख्या व उपज दोनों में वृद्धि होती है। पोटेशियम के उपयोग का प्रभाव आलू की ठंड की फसल में अधिक दिखाई देता है।

आलू में सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग

आलू के पौधे को एन.पी.के. के अलावा द्वितीय पोषक तत्व जैसे कैल्शियम, मेग्रिशियम, सल्फर व सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे आयरन, जिंक, मैगनीज, कॉपर, बोरान व माल्बिडेनम की आवश्यकता भी होती है। एन्डीसॉल्स प्रकार की मृदा में अगर हम आलू की खेती करते हैं उसमें सूक्ष्म पोषक तत्व की मात्रा बहुत कमी हेाती है जिसमें जिंक सबसे कम इसके बाद आयरन, कॉपर, मैंगनीज, बोरान व माल्बिडेनम की कमी पायी जाती है सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग से आलू की उपज व कंदों की गुणवत्ता दोनों में ही वृद्धि होती है।

सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग से आलू की उपज व कंदों की गुणवत्ता दोनों में ही वृद्धि होती है। जिंक व कॉपर के उपयोग करने से आलू के पौधे में बीमारी कम होती है। जिंक के प्रयोग से कंद की उपज में वृद्धि होती है। आलू में सूक्ष्म पोषक का प्रभाव मिट्टी का प्रकार आलू की किस्म तथा उनके उपयोग करने के तरीके पर निर्भर करता है विभिन्न प्रकार के प्रयोगों से ज्ञात होता है कि सभी पोषक तत्वों में जिंक सबसे महत्वपूर्ण है इसके बाद आयरन, कॉपर, मैंगनीज, बोरान व मॉब्लिडेनस है। अनुसंधान के आधार पर यह ज्ञात हुआ है कि एल्यूवियल व पर्वतीय क्षेत्रों की मृदाओं में कॉपर जिंक व मैंगनीज आदि कम पाये जाते हैं जबकि आयरन व मॉब्लिडेनम कमी काली मृदा में पाई जाती है। जिंक की कमी से आलू में एल्यूवियल या लिटिल लीफ नामक बीमारी आती एवं पौधे की बढ़वार रूक जाती है।

सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग की विधियां

मृदा का उपयोग 

  • जिंक सल्फेट को 25 किग्रा/हे. की दर से खेतों में डाल दें।
  • घोल बनाकर - मैदानी क्षेत्रों में सूक्ष्म पोषण तत्वों का दो बार 40 व 60 दिन में छिड़काव करें व पर्वतीय क्षेत्रों बुआई के 60-80 दिन में करेें।
  • सूक्ष्म पोषक तत्वों द्वारा बीज उपचारण कंद को 2 प्रतिशत जिंक आक्साइड में लगाने से पहले उपचारित करेें। कंदों को 0.05 प्रतिशत सूक्ष्म पोषक तत्व के घोल में 3 घंटे तक डुबा कर रखें।

आलू के खेत में जैविक खाद का उपयोग

आलू फसल में जैविक खाद जैसे एजेटोवेक्टर व फास्फो वेक्टिरिया के उपयोग से आलू की उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ उर्वरक के उपयोग में 25 प्रतिशत तक की कमी आती है। फास्फोरस घुलनशील जीवाणु से आलू के कंद को उपचारित करने से उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ कंद के शुष्क पदार्थ में भी वृद्धि होती है। इसी प्रकार नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए एजेेक्टोवेक्टर के उपयोग से मध्यम व बड़े आकार के कंद प्राप्त होते हैं।

 

  • डॉ. विजय के. पराड़कर 
  • डॉ. डी.एन. नांदेकर
  • डॉ. अशोक राय

    जे.ने.कृ.वि.वि. अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान आलू परियोजना
    आंचलिक कृषि अनुसंधान केन्द्र, चन्दनगांव, छिंदवाड़ा 

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