दाल-सब्जी के लिए उपयोगी बरबटी लगाएं

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जलवायु:
इसकी खेती के लिए ट्रोपिकल तथा सब – ट्रोपिकल जलवायु उत्तम रहती है। इसकी खेती के लिए 24-27 डिग्री सेल्सियस तापक्रम अनुकूल रहता है। फसल की समुचित बढ़वार के लिए 27-35 डिग्री सेल्सियस तापक्रम अनुकूल रहता है। लोबिया की वृद्धि पर पाले तथा कम तापक्रम का बुरा प्रभाव पड़ता है।
भूमि:
लगभग सभी प्रकार की भूमियों में इसकी खेती की जा सकती है। इसकी खेती के लिए हलकी भूमियाँ उपयुक्त रहती है, उचित वृद्धि तथा बढ़वार के लिए दोमट तथा मटियार दोमट भूमियाँ जिसकी पी.एच. मान 5.5 से 6.5, उपयुक्त रहता है । भूमि जल निकास युक्त होनी चाहिए, क्षारीय तथा अम्लीय मिट्टी इसकी खेती के लिए अनुपयुक्त हैं।
भूमि की तैयारी:
खेत समतल तथा उचित जल निकास वाला होना चाहिए। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके दो जुताइयाँ देशी हल अथवा कल्टीवेटर से करनी चाहिए।
उन्नत किस्में:
पूसा कोमल – यह किस्म बैक्टीरियल ब्लाईट प्रतिरोधी है। इसे बसंत, ग्रीष्म तथा वर्षा तीनों मौसम में लगाते है। फली का रंग हल्का हरा, मोटा गूदेदार 20-22 से.मी. लम्बा होता है। इसकी उपज 100-120 क्ंिवटल/हेक्टेयर होती है। यह सब्जी तथा दानों के लिए उपयुक्त है।
पूसा दो फसली – पौधा छोटा व झाड़ीनुमा, फसल अवधि 70-80 दिन , इसके दाने बड़े तथा धब्बेदार होते हैं। यह प्रकाश – असंवेदनशील किस्म है। उपज क्षमता 10-12 क्विं/हेक्टेयर।
अर्का गरिमा – यह खम्भा (पोल) प्रकार की किस्म है यह 2-3 मी. ऊंची होती है। इसे वर्षा ऋतु एवं बसंत ऋतु में लगाया जा सकता है।
पूसा  ऋतुराज – यह किस्म ग्रीष्म तथा वर्षा दोनों मौसमों के लिए उपयुक्त है, फलियों की पहली फलत बोवाई 40-45 दिन पर आ जाती है। उपज 10-12 क्विं/ हेक्टेयर क्षमता, भारत के अधिकाँश भागों के लिए उपयुक्त किस्म।
पूसा फाल्गुनी -यह छोटी झाड़ीनुमा किस्म है फली का रंग गहरा हरा, सीधा एवं 10-20 से.मी लम्बा एवं 60 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इसकी उपज 70-75 क्विंटल/हेक्टेयर होती है।
पूसा दोफसली – यह किस्म बसंत, ग्रीष्म तथा वर्षा तीनों मौसम के लिये उपयुक्त है फली का रंग हल्का हरा एवं 18 से.मी लम्बा होता है। 45-50 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इसकी उपज 75-80 क्ंिवटल/हेक्टेयर होती है।
बीज दर:
साधाारणतया 12-20 कि.ग्रा. बीज/हेक्टेयर की दर से पर्याप्त होता है। बीज की मात्रा प्रजाति तथा मौसम पर निर्भर करती है। बेलदार प्रजाति के लिए बीज की कम मात्रा की आवश्यकता होती है।
बीज उपचार: 2.5 ग्राम थाइरम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करे।
बुवाई समय:
गर्मी के मौसम के लिए इसकी बुवाई फरवरी-मार्च में तथा वर्षा के मौसम में जून अंत से जुलाई माह में की जाती है।
बुवाई दूरी:
झाड़ीदार किस्मों के बीज की बुवाई के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45-60 सें.मी. तथा बीज से बीज की दूरी 10 सें.मी. रखी जाती है तथा बेलदार किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 80-90 सें.मी. रखते हैं। बुवाई से पहले बीज का राइजोबियम नामक जीवाणु से उपचार कर लेना चाहिए। बुवाई के समय भूमि में बीज के जमाव हेतु पर्याप्त नमी का होना बहुत आवश्यक है।
उर्वरक व खाद:
गोबर या कम्पोस्ट की 20-25 टन मात्रा बुवाई से 1 माह पहले खेत में डाल दें। लोबिया एक दलहनी फसल है, इसलिए नत्रजन की 20 कि.ग्रा, फास्फोरस 60 कि.ग्रा. तथा पोटाश 50 किग्रा/हेक्टेयर खेत में अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला देना चाहिए तथा 20 कि.ग्रा. नत्रजन की मात्रा फसल में फूल आने पर प्रयोग करें।
खरपतवार नियंत्रण:
दो से तीन निराई व गुड़ाई खरपतवार नियंत्रण के लिए करनी चाहिए। रसायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए स्टाम्प 3 लीटर/ हेक्टेयर की दर से बुवाई के बाद दो दिन के अन्दर प्रयोग करें।
तुड़ाई:
फसल बोवाई के 2 माह बाद तैयार हो जाती है। लोबिया की नर्म व कच्ची फलियों की तुड़ाई नियमित रूप से 4-5 दिन के अंतराल में करें। झाड़ीदार प्रजातियों में 3-4 तुड़ाई तथा बेलदार प्रजातियों में 8-10 तुड़ाई की जा सकती है।
उपज:
हरी फली की झाड़ीदार प्रजातियों में उपज 60-70 क्विंटल तथा बेलदार प्रजातियों में 80-100 क्ंिवटल हो सकती है।
बीज उपज: 10-12 क्विंटल/हेक्टेयर।
बीजोत्पादन: लोबिया के बीज उत्पादन के लिए गर्मी का मौसम उचित है क्योंकि वर्षा के मौसम में वातावरण के अंदर आद्र्रता ज्यादा होने से फली के अंदर बीज का जमाव हो जाने से बीज खराब हो जाता है। बीज शुद्धता बनाए रखने के लिए प्रमाणित बीज की पृथक्करण दूरी 5 मी. व आधार बीज के लिए 10 मी. रखें। बीज फसल में दो बार अवांछित पौधों को निकाल दें। पहली बार फसल के फूल आने की अवस्था में तथा दूसरी बार फलियों में बीज से भरने की अवस्था पर पौधे तथा फलियों के गुणों के आधार पर अवांछित पौधों को निकाल दें। समय-समय पर पकी फलियों की तुड़ाई करके बीज अलग कर लेने के बाद उन्हें सुखाकर व बीमारी नाशक तथा कीटनाशी मिलाकर भंडारित करें।

                                                                                   प्रमुख रोग एवं कीट नियंत्रण
रोग :
जीवाणु अंगमारी (जैन्थोमोनास कैम्पेस्ट्रिस विग्नीकोला)  लक्षण : रोग संक्रमित बीजों से निकलने वाले पौधों के बीज पत्रों एवं नई पत्तियों पर रोग के लक्षण सर्वप्रथम दिखाई पड़ते हैं। इस रोग के कारण बीज पत्र लाल रंग के होकर सिकुड़ जाते हैं। नई पत्तियों पर सूखे धब्बे बनते हैं। पौधों की कलिकाएँ नष्ट हो जाती है और बढ़वार रुक जाती है। अन्त में पूरा पौधा सूख जाता है।
नियंत्रण :

  • रोगी पौधों के अवशेषों को नष्ट कर देना चाहिए।
  • जल निकास का अच्छा प्रबंध होना चाहिए।
  • दो वर्षों का फसल चक्र अपनाना चाहिए।
  • उपचारित बीज का प्रयोग करना चाहिए तथा उन्नत कृषि विधियाँ अपनानी चाहिए।
  • खड़ी फसलों में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 कि. ग्रा. एक हजार लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

लोबिया मोजेक (मोजेक विषाणु)
लक्षण : रोगी पत्तियाँ हल्की पीली हो जाती है ।

इस रोग में हल्के पीले तथा हरे रंग के दाग भी बनते हैं। रोग की उग्र अवस्था में पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है और उन पर फफोले सदृश उभार पर आ जाते हैं । रोगी फलियों के दाने सिकुड़े हुए होते हैं तथा कम बनते हैं। ‘रोगी पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए।’

नियंत्रण :

  • स्वस्थ तथा अच्छे पौधों से प्राप्त बीज को ही बीज उत्पादन के काम मे लाना चाहिए।
  • कीटनाशी जैसे मेटासिस्टॉक्स (ऑक्सी मिथाइल डेमेटॉन) एक मि.लि. या डायमेक्रान (फॉस्फोमिडान) आधा मि.ली. प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर 15-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।

कीट
फली भेदक कीट (मुरिका टेस्टुलैलिस)
लक्षण : पौधे के परिपक्व होते समय इस कीट के इसके लार्वा फूलों के कलियों एवं फली मे छेदकर करके नुकसान पहुंचाते हैं।

नियंत्रण :
इस कीट के नियंत्रण के लिये कार्बारिल 0.15 प्रतिशत या साईपरमेथ्रिन 0.0125 प्रतिशत की दर से  पौधे के कली अवस्था में छिड़काव करना चाहिए।
माहू
लक्षण : इस कीट के शिशु वृद्धि कर रहे नये पौधे की पत्तियों के रस को चुसकर हानि पहुचाते हैं

जिसके कारण पत्तियां सूखने तथा मुडऩे लगती है। तथा पौधे की वृद्धि रूक जाती है और फली नही बन पाती है। यह कीट मोजेक विषाणु रोग को भी फैलाती है।
नियंत्रण :इसकी रोकथाम के लिये फास्फोमिडान या डायमिथिएट 0.05 प्रतिशत की दर से छिड़काव करना चाहिए।

 

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