बजट की सुर्ख़ियाँ बहुत, किसान की हिस्सेदारी कितनी?
लेखक- सचिन बोंद्रिया
02 फरवरी 2026, इंदौर: बजट की सुर्ख़ियाँ बहुत, किसान की हिस्सेदारी कितनी? – केंद्रीय बजट 2026-27 पेश हो चुका है। हर बार की तरह इस बार भी बजट की सुर्ख़ियों में विकास, तकनीक, निवेश और आत्मनिर्भर भारत जैसे बड़े शब्द प्रमुख रहे, लेकिन सवाल वही पुराना है—इस बजट में किसान वास्तव में कहाँ खड़ा है?बजट भाषण में कृषि क्षेत्र का उल्लेख अवश्य किया गया, उच्च-मूल्य वाली फसलों, कृषि विविधीकरण, पशुपालन, मत्स्य पालन और निर्यात बढ़ाने की बात भी कही गई, परंतु सीधे किसान को मिलने वाली राहत और आय सुरक्षा पर ठोस घोषणाएँ अपेक्षा के अनुरूप नहीं दिखीं।
सरकार ने यह जरूर कहा कि खेती को लाभ का व्यवसाय बनाया जाएगा, लेकिन उत्पादन लागत, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), फसल नुकसान और बाज़ार की अनिश्चितता जैसे ज़मीनी मुद्दों पर किसान आज भी असमंजस में है। बजट में तकनीक और डिजिटल कृषि की बात तो हुई, पर छोटे और सीमांत किसानों तक इसका लाभ कैसे पहुँचेगा, इस पर स्पष्ट रोडमैप नज़र नहीं आता।
खेती के साथ पशुपालन और मत्स्य पालन को आय के अतिरिक्त स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन इन क्षेत्रों में लगे किसानों के लिए बीमा, ऋण और बाज़ार समर्थन को लेकर बजट मौन दिखाई देता है। वहीं, प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे किसानों के लिए भी किसी विशेष पैकेज की घोषणा नहीं की गई।
किसान संगठनों का मानना है कि बजट में कृषि का ज़िक्र होना ही पर्याप्त नहीं है। किसान की आय, सुरक्षा और सम्मान को केंद्र में रखे बिना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं किया जा सकता। आज भी देश का किसान यही पूछ रहा है कि जब बजट की सुर्ख़ियाँ इतनी बड़ी हैं, तो उसकी हिस्सेदारी आखिर कितनी है?
कुल मिलाकर, यह बजट नीति और संभावनाओं की बात तो करता है, लेकिन ज़मीनी किसान को तत्काल राहत देने के लिहाज़ से अधूरा माना जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि बजट की घोषणाएँ खेत तक कब और कैसे पहुँचती हैं।
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