ऊँट का दूध: रेगिस्तान का अमृत और स्वास्थ्य का सशक्त स्रोत
लेखक – डॉ. पारुल प्रजापति, डॉ. अखिलेश कुमार करोरिया, डॉ. बुलबुल शिवहरे, डॉ. सत्यम भंडारी, डॉ. स्वाति कोली, पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, महु, इंदौर (म.प्र.)
03 फरवरी 2026, भोपाल: ऊँट का दूध: रेगिस्तान का अमृत और स्वास्थ्य का सशक्त स्रोत –
परिचय
तेजी से बढ़ती वैश्विक जनसंख्या और बदलते जलवायु परिदृश्य में खाद्य और पोषण सुरक्षा आज दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुकी है। ऐसे समय में ऊँट जैसे पशु, जो अत्यंत कठोर पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी जीवित रहकर दूध उत्पादन कर सकते हैं, भविष्य की पशुधन व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। ऊँट न केवल रेगिस्तानी और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में आजीविका का प्रमुख साधन हैं, बल्कि उनका दूध पोषण और स्वास्थ्य दोनों दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान माना जाता है। हाल के वर्षों में वैज्ञानिक शोधों ने ऊँट के दूध को एक “सुपरफूड” के रूप में पहचान दिलाई है।
दुनिया भर में ऊँटों की संख्या लगभग 3.5 करोड़ से अधिक आँकी गई है। ये पशु अत्यधिक गर्मी, पानी की कमी और सीमित चारे की उपलब्धता के बावजूद दूध, मांस और प्रजनन क्षमता बनाए रखते हैं।अन्य दुग्ध पशुओं की तुलना में ऊँट रेगिस्तानी परिस्थितियों में भी लगातार दूध उत्पादन कर सकते हैं, जिससे यह खानाबदोश और शुष्क क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के लिए जीवनरेखा बन जाते हैं।
ऊँट के दूध की संरचना
ऊँट के दूध की संरचना गाय और बकरी के दूध से मिलती-जुलती है, लेकिन इसके कुछ गुण इसे विशेष बनाते हैं। यह दूध प्रोटीन, वसा, लैक्टोज़, खनिज और विटामिन से भरपूर होता है। साथ ही इसमें पाए जाने वाले लैक्टोफेरिन, लाइसोज़ाइमऔरइम्यूनप्रोटीन इसे रोग-प्रतिरोधक गुण प्रदान करते हैं। एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि ऊँट का दूध उन लोगों के लिए भी उपयुक्त हो सकता है जिन्हें गाय के दूध के सेवन से प्रतिकूल प्रतिक्रिया होती है।
ऊँट का दूध और मधुमेह(डायबिटीज)
वैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि ऊँट के दूध में इंसुलिनजैसेप्रोटीन पाए जाते हैं। ये प्रोटीन पेट के अम्लीय वातावरण में नष्ट नहीं होते और सीधे रक्त में अवशोषित होकर रक्त शर्करा को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।
शोधों में पाया गया है कि टाइप-1 मधुमेह रोगियों में ऊँट का दूध सेवन करने से:
- रक्त शर्करा स्तर में कमी
- इंसुलिन की आवश्यकता में 30–35% तक कमी
- समग्र जीवन गुणवत्ता में सुधार
देखा गया है। राजस्थान के कुछ समुदायों में, जहाँ ऊँट का दूध नियमित रूप से पिया जाता है, मधुमेह की दर लगभग नगण्य पाई गई।
हृदय स्वास्थ्य और वसा नियंत्रण में सहायक
मधुमेह अक्सर कोलेस्ट्रॉलऔरट्राइग्लिसराइड असंतुलन से जुड़ा होता है, जिससे हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है। ऊँट का दूध रक्त में:
- कुल कोलेस्ट्रॉल
- ट्राइग्लिसराइड
- खराब LDL कोलेस्ट्रॉल
को कम करने में सहायक पाया गया है, जबकि यह अच्छे HDL कोलेस्ट्रॉल को बनाए रखने में मदद करता है। इस प्रकार, यह हृदय रोगों के जोखिम को कम करने में सहायक बन सकता है।
यकृत(लिवर) औरगुर्दा(किडनी) स्वास्थ्य में भूमिका
डायबिटीज और अन्य चयापचय रोगों में लिवर और किडनी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। शोधों के अनुसार ऊँट का दूध:
- लिवर एंजाइम्स को सामान्य स्तर पर लाने
- किडनी की कार्यक्षमता सुधारने
- मूत्र में एल्बुमिन की मात्रा घटाने
में सहायक भूमिका निभाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ऊँट का दूध केवल पोषण ही नहीं, बल्कि रोग-निवारकक्षमता भी रखता है।
पारंपरिक ज्ञान से आधुनिक विज्ञानतक
एशिया और अफ्रीका के कई हिस्सों में ऊँट का दूध सदियों से पारंपरिक चिकित्सा का हिस्सा रहा है। आज आधुनिक विज्ञान भी इन पारंपरिक मान्यताओं की पुष्टि कर रहा है।
कैंसर, वायरल हेपेटाइटिस, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन संबंधी रोगों में इसके संभावित लाभों पर लगातार शोध जारी हैं।
निष्कर्ष
ऊँट का दूध कठोर पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी उत्पादित होने वाला एक उच्च पोषणीय और औषधीय मूल्य वाला प्राकृतिक पेय है। यह न केवल सामान्य स्वस्थ व्यक्तियों के लिए लाभकारी है, बल्कि मधुमेह, हृदय रोग, यकृत और गुर्दा विकारों में सहायक उपचार के रूप में भी उभर रहा है। भविष्य में ऊँट पालन और ऊँट के दूध के वैज्ञानिक उपयोग को बढ़ावा देकर पोषण सुरक्षा, स्वास्थ्य सुधार और सतत पशुधन उत्पादन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।
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