पॉलीहाउस में एकीकृत रोग व कीट प्रबन्धन

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पॉलीहाउस में कीट-रोग प्रबंधन
सफाई:
पॉलीहाउस के आसपास के चारों तरफ  के क्षेत्र को खरपतवार से मुक्त रखें। पॉलीहाउस के चारों तरफ 10 से 20 फीट के क्षेत्र में  मल्चिंग करें, इससे खरपतवार के नियंत्रण में सहायता मिलती है। पॉलीहाउस क्षेत्र में धूल, जमा हुआ पानी, खरपतवार या अन्य फसल की पौध हो तो उसे निकाल दें। जमीन, दीवार, बेंच, पात्र, उगाने वाला माध्यम, सिंचाई की टंकी तथा सिंचाई के पाइप लाइनों की नियमित सफाई करें। उत्पादन स्थानों पर कम से कम लोगों का प्रवेश होना चाहिए, पैरों को धोना या जूतों को कवर करना तथा हाथों को अच्छी तरह से साफ /स्टरलाइज करना चाहिए।
बफर रूम:
पॉलीहाउस के उत्पादन क्षेत्र से पहले एक बफर रूम होना चाहिए। कर्मचारियों व आगन्तुकों के लिए हमेशा दो या अधिक दरवाजों का प्रवेश मार्ग बनाएं अन्यथा कीटों का प्रवेश आसान हो जाता है। बाहरी द्वार को खोलने पर पंखे की तेज हवा दरवाजे की तरफ  आनी चहिए ताकि बाहर से कीट अंदर प्रवेश ना कर सकें। बाहर का दरवाजा खोल कर कर्मचारियों को बफर रूम में अन्दर आने दें तथा बाहर का दरवाजा बंद करने के बाद उत्पादन क्षेत्र का दरवाजा खोलकर कर्मचारियों को अंदर जाने दें।
प्रतिरोधक प्रजातियों का प्रयोग:
रोगों व कीटों के प्रति प्रतिरोधक फसल प्रजातियों का उपयोग करें। यदि सम्भव हो तो ऐसी प्रजाति का चुनाव करें जो किसी एक के प्रति नहीं बल्कि कई कीटों व रोगों के प्रति प्रतिरोधी हो।
कीटों की निगरानी:
पॉलीहाउस के हवा प्रवेश की खिड़कियों व पंखों के स्थानों पर कीट रोधक जालियों का प्रयोग करें ताकि हवा प्रवेश के समय हवा के साथ-साथ कीटों का प्रवेश न हो सके।
प्रकाश परावर्तित या रिफलेक्ट करने वाली धातु की मल्चिंग का प्रयोग:
इस प्रकार की मल्चिंग सफेद मक्खी, एफिड व थ्रिप्स के नियंत्रण में बहुत सहायक होती है। इनके  द्वारा  प्रकाश परावर्तित होने की वजह से कीट असहज महसूस करते हैं इसलिए यह कीटों को भगाने में सहायक होती है।
परीक्षण: इस विधि में कीटों की संख्या व स्थिति  का परिक्षण करते हैं यह आँखों से देखकर, हैंडलेन्स  से , नेटजाल से या पीले या नीले चिपकने वाले ट्रेप से किया जाता है।
पॉलीहाउस में फसल सुरक्षा के कुछ महत्वपूर्ण उपाय
जल की व्यवस्था:

  •  सिंचाई के लिए सुरक्षित स्त्रोत से प्राप्त स्वच्छ/ असंक्रमित जल का प्रयोग करें।
  •  जल भण्डारण की टंकियों को नियमित रूप से साफ करें व ढंक कर रखें। जल को बेकार बर्बाद न होने दें।
  •  छिड़काव हेतु प्रयोग किये जाने वाला जल स्वच्छ एवं रोगमुक्त होना चाहिए।
  •  वर्ष में कम से कम एक बार सिंचाई जल का माइक्रोबियम, केमिकल व मिनरल प्रदूषण जैसे – पी.एच., विद्युत चालकता टी.डी.एस. की जांच अवश्य करायें।
  •  जल निकास की उचित व्यवस्था करें।

भूमि का उपचार:

  • बेड बनाते समय रोगों के जैविक नियंत्रण हेतु जैव नियंत्रकों जैसे – नीम व करंज खली, ट्राइकोडार्मा , स्यूडोमोनॉस, बैसिलोमाइसीटज, मेटाराइजम आदि का  प्रयोग करें।
  • फलों की तुड़ाई के बाद पौध अवशेषों की अच्छी तरह से सफाई करें।
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