आधुनिक खेती की तकनीकें सीखने भोपाल पहुंचे विदिशा के 35 किसान, ICAR-CIAE में मिला प्रशिक्षण
01 सितंबर 2026, भोपाल : आधुनिक खेती की तकनीकें सीखने भोपाल पहुंचे विदिशा के 35 किसान, ICAR-CIAE में मिला प्रशिक्षण – कृषि रोडमैप के अंतर्गत किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ने के उद्देश्य से आत्मा परियोजना, विदिशा द्वारा जिले के 35 किसानों का ICAR–केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान (ICAR-CIAE), भोपाल में कृषक प्रशिक्षण आयोजित किया गया। प्रशिक्षण के दौरान किसानों को आधुनिक कृषि यंत्रों, कृषि अभियांत्रिकी तकनीकों, सूक्ष्म सिंचाई, संरक्षित खेती, सौर ऊर्जा, कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन तथा प्राकृतिक संसाधनों के दक्ष उपयोग से संबंधित व्यावहारिक जानकारी प्रदान की गई।
प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने कृषि में उपयोग किए जाने वाले विभिन्न आधुनिक कृषि यंत्रों एवं उपकरणों का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। विशेषज्ञों ने किसानों को यंत्रों के संचालन, उपयोग की विधि तथा विभिन्न कृषि कार्यों में उनकी उपयोगिता के बारे में विस्तार से जानकारी दी। किसानों को बताया गया कि आधुनिक कृषि यंत्रों के उपयोग से कृषि कार्यों में लगने वाले समय एवं श्रम की बचत के साथ कृषि लागत को भी कम किया जा सकता है तथा कार्य की दक्षता में वृद्धि होती है।
सूक्ष्म सिंचाई और संरक्षित खेती की तकनीकों की जानकारी
किसानों को सूक्ष्म सिंचाई पद्धति, विशेष रूप से ड्रिप इरिगेशन के माध्यम से जल के कुशल उपयोग की जानकारी दी गई। इसके साथ ही पॉलीहाउस एवं संरक्षित खेती की तकनीकों का अवलोकन कराया गया। किसानों ने समझा कि संरक्षित खेती के माध्यम से प्रतिकूल मौसम परिस्थितियों के प्रभाव को कम करते हुए गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त करने तथा कृषि से बेहतर आय अर्जित करने की संभावनाएं बढ़ाई जा सकती हैं। प्रशिक्षण में सौर ऊर्जा आधारित कृषि तकनीकों पर भी विशेष जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा के उपयोग, ऊर्जा की बचत तथा सिंचाई सहित अन्य कृषि कार्यों में इसके उपयोग की संभावनाओं से किसानों को अवगत कराया।
कृषि अवशेषों से ब्रिकेट निर्माण की तकनीक देखी
प्रशिक्षण के दौरान कृषि अवशेषों के प्रबंधन एवं मूल्य संवर्धन की आधुनिक तकनीक का भी प्रदर्शन किया गया। किसानों को बताया गया कि पराली, सोयाबीन का भूसा, गेहूँ का भूसा, धान की भूसी, लकड़ी का बुरादा, मक्का के अवशेष सहित अन्य जैविक अवशेषों को मशीनों के माध्यम से दबाकर ब्रिकेट तैयार किए जा सकते हैं। इन ब्रिकेट का उपयोग ऊर्जा एवं ईंधन के रूप में किया जा सकता है।
इस तकनीक से किसानों को कृषि अवशेषों को जलाने के बजाय उनका उपयोगी संसाधन के रूप में प्रबंधन करने तथा उनसे अतिरिक्त मूल्य प्राप्त करने की संभावनाओं की जानकारी मिली। नरवाई एवं फसल अवशेष प्रबंधन पर विशेष जोर देते हुए विशेषज्ञों ने अवशेष जलाने से होने वाले पर्यावरणीय एवं मृदा संबंधी नुकसान के बारे में भी समझाया।
सोयाबीन से दूध एवं पनीर बनाने की तकनीक का अवलोकन
किसानों ने सोयाबीन से दूध एवं पनीर बनाने की तकनीक तथा इससे संबंधित विभिन्न प्रसंस्करण मशीनों का भी प्रत्यक्ष अवलोकन किया। विशेषज्ञों ने सोयाबीन के प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और कृषि उत्पादों से अतिरिक्त आय अर्जित करने के अवसरों के संबंध में जानकारी दी। किसानों को बताया गया कि कृषि उपज का केवल उत्पादन करने के बजाय उसके प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन से आय के नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
प्राकृतिक एवं जैविक खेती पर भी दिया जोर
प्रशिक्षण में खेत समतलीकरण के लाभ, जैविक खेती, प्राकृतिक खेती एवं आधुनिक कृषि पद्धतियों पर भी विस्तृत जानकारी दी गई। किसानों को बताया गया कि उचित खेत समतलीकरण से सिंचाई जल का समान वितरण सुनिश्चित करने, जल की बचत करने तथा फसल की बेहतर वृद्धि में सहायता मिलती है। साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और कृषि में उपलब्ध संसाधनों के दक्ष उपयोग को भी आधुनिक खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया।
विशेषज्ञों ने किसानों की जिज्ञासाओं का किया समाधान
प्रशिक्षण के दौरान ICAR-CIAE के निदेशक डॉ. सी. आर. मेहता, डॉ. मनोज कुमार, डॉ. ए. के. राउल एवं डॉ. बी. पी. चौधरी सहित संस्थान के विशेषज्ञ उपस्थित रहे। विशेषज्ञों ने किसानों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए आधुनिक कृषि यंत्रों, सूक्ष्म सिंचाई, सौर ऊर्जा, संरक्षित खेती, कृषि उत्पाद प्रसंस्करण, ब्रिकेट निर्माण, प्राकृतिक एवं जैविक खेती तथा फसल अवशेष प्रबंधन से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की।
प्रशिक्षण के समापन अवसर पर किसानों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। किसानों ने प्रशिक्षण में उत्साहपूर्वक सहभागिता की और आधुनिक कृषि तकनीकों एवं कृषि यंत्रों को अपने खेतों में अपनाने में रुचि दिखाई। यह प्रशिक्षण किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ने, कृषि लागत कम करने, जल एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों का दक्ष उपयोग सुनिश्चित करने, फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन तथा कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन के माध्यम से अतिरिक्त आय के अवसर बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल रहा।
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