राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

2023–26 के दौरान भारत में 5,689 नई किस्मों का पंजीकरण

23 जुलाई 2026, नई दिल्ली: 2023–26 के दौरान भारत में 5,689 नई किस्मों का पंजीकरण – भारत ने वर्ष 2023 से 2026 के बीच 5,689 नई पौध किस्मों का पंजीकरण पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण (PPV&FR) अधिनियम के तहत किया है। यह पिछले तीन वर्षों में किस्म पंजीकरण की प्रक्रिया में उल्लेखनीय तेजी को दर्शाता है, जिसका उद्देश्य देश के बीज क्षेत्र को मजबूत बनाना और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना है।

यह जानकारी केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर के माध्यम से साझा की। उन्होंने बीज अनुसंधान, गुणवत्ता आश्वासन, अवसंरचना विकास, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों की जानकारी दी।

मंत्री ने बताया कि पिछले तीन वर्षों में PPV&FR प्राधिकरण ने पौध किस्मों के पंजीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाई है, जिससे किसानों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों (SAUs) और निजी बीज कंपनियों को अपनी विकसित किस्मों के बौद्धिक संपदा अधिकार प्राप्त करने में सुविधा हुई है। अब तक 219 फसलों की 10,802 किस्मों का पंजीकरण किया जा चुका है, जिनमें से 5,689 किस्में केवल 2023–26 की अवधि में पंजीकृत हुई हैं।

सरकार ने बताया कि राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा प्रणाली (NARES) के तहत उन्नत फसल किस्मों के विकास का कार्य लगातार जारी है। 2014 से 2025 के बीच 3,236 फसल किस्में जारी एवं अधिसूचित की गईं, जिनमें 2,996 जलवायु-सहिष्णु (क्लाइमेट-रेजिलिएंट) किस्में शामिल हैं। इनमें 587 ऐसी किस्में हैं जो सूखा, बाढ़, लवणीयता, अत्यधिक गर्मी और ठंड जैसी चरम जलवायु परिस्थितियों को सहन करने में सक्षम हैं।

इनमें सबसे अधिक नई किस्में अनाज फसलों की विकसित की गईं, जबकि दलहन, तिलहन, रेशा फसलें, चारा फसलें और गन्ना भी प्रमुख श्रेणियों में शामिल रहे।

सरकार ने कहा कि विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए उपयुक्त उच्च उत्पादक एवं जलवायु-सहिष्णु किस्मों के ब्रीडर, फाउंडेशन और प्रमाणित बीजोंके उत्पादन एवं विस्तार को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि किसानों को समय पर गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध हो सकें।

बीज उत्पादन एवं गुणवत्ता तंत्र का विस्तार

देश में वर्तमान में 229 सीड हब, 384 ब्रीडर सीड उत्पादन केंद्र, 17 राज्य बीज निगम तथा राष्ट्रीय बीज निगम (NSC) सहित कई सार्वजनिक एवं निजी संस्थान गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन और वितरण में योगदान दे रहे हैं।

बीज गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए देशभर में 178 अधिसूचित बीज परीक्षण प्रयोगशालाएं कार्यरत हैं। सरकार इन प्रयोगशालाओं के सुदृढ़ीकरण, इंटरनेशनल सीड टेस्टिंग एसोसिएशन (ISTA) की सदस्यता तथा अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त करने के लिए तकनीकी सहायता भी उपलब्ध करा रही है।

सरकार ने यह भी बताया कि सीड ऑथेंटिकेशन, ट्रेसबिलिटी एंड होलिस्टिक इन्वेंटरी (SATHI) पोर्टल को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। यह डिजिटल प्लेटफॉर्म बीज उत्पादन, प्रमाणीकरण, भंडारण, इन्वेंटरी प्रबंधन और वितरण की पूरी प्रक्रिया को ट्रैक करने में मदद करेगा तथा पारदर्शिता और गुणवत्ता नियंत्रण को मजबूत करेगा।

बीज निर्यात में बढ़त

पिछले तीन वर्षों में भारत का बीज निर्यात लगातार आयात से अधिक रहा है।

2025-26 के दौरान भारत ने 123.82 हजार मीट्रिक टन बीज का निर्यात किया, जिसकी कीमत ₹3,023.16 करोड़ रही। इसी अवधि में 31.84 हजार मीट्रिक टन बीज का आयात हुआ, जिसका मूल्य ₹1,755.96 करोड़ था।

2026-27 (मई 2026 तक) के दौरान 18.46 हजार मीट्रिक टन बीज का निर्यात ₹582.19 करोड़ मूल्य का हुआ, जबकि 4.43 हजार मीट्रिक टन बीज का आयात ₹357.36 करोड़ का दर्ज किया गया।

सरकार ने बताया कि अक्टूबर 2024 में EXIM समिति समाप्त किए जाने के बाद बीजों के आयात-निर्यात की स्वीकृति प्रक्रिया को विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) के डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से सरल बनाया गया है। साथ ही, भारत OECD Seed Schemes, ISTA और NABL मानकों के अनुरूप अपनी बीज गुणवत्ता प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ कर रहा है।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा

सरकार के अनुसार, बीज क्षेत्र में सार्वजनिक एवं निजी संस्थाओं के बीच सहयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।

2023-24 से 2025-26 के बीच 27 ICAR संस्थानों ने सार्वजनिक और निजी संगठनों के साथ 1,317 लाइसेंसिंग समझौते किए। इन समझौतों का उद्देश्य बीज उत्पादन, नई किस्मों का मूल्यांकन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा सार्वजनिक क्षेत्र में विकसित किस्मों के बड़े पैमाने पर प्रसार को बढ़ावा देना है।

सरकार ने बताया कि एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (AIF), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन (NFSNM), राष्ट्रीय खाद्य तेल-तिलहन मिशन (NMEO-Oilseeds), दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY), राष्ट्रीय उच्च उत्पादक बीज मिशन (NMHYS)तथा कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन जैसी योजनाओं के तहत बीज अवसंरचना, प्रसंस्करण, भंडारण, अनुसंधान एवं आधुनिक फसल सुधार तकनीकों को भी समर्थन दिया जा रहा है।

इन कार्यक्रमों के अंतर्गत जीनोम एडिटिंग, मार्कर-असिस्टेड सिलेक्शन, स्पीड ब्रीडिंग, बायोफोर्टिफिकेशन तथा मिलेट्स के लिए वैश्विक अनुसंधान एवं विकास केंद्र जैसी पहलों को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।

अपनाने की स्थिति पर नहीं दी गई जानकारी

हालांकि, लोकसभा में दिए गए इस लिखित उत्तर में यह नहीं बताया गया कि हाल के वर्षों में पंजीकृत या विकसित नई किस्मों को किसानों ने किस स्तर तक अपनाया है। उत्तर में इन किस्मों के व्यावसायिक प्रसार, विभिन्न फसलों के लिए उत्पादित प्रमाणित बीज की मात्रा, बीज प्रतिस्थापन दर (Seed Replacement Rate) अथवा इन किस्मों की आर्थिक व्यवहार्यता और बाजार प्रदर्शन से संबंधित कोई जानकारी भी नहीं दी गई। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि नई किस्मों के विकास और पंजीकरण के साथ-साथ उनका व्यापक स्तर पर किसानों तक पहुंचना और व्यावसायिक उपयोग भी उनकी वास्तविक सफलता का महत्वपूर्ण पैमाना होता है।

सरकार का कहना है कि जलवायु-सहिष्णु किस्मों, गुणवत्तापूर्ण बीज प्रणाली, आधुनिक प्रजनन तकनीकों तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से भारत कृषि उत्पादकता बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा मजबूत करने और वैश्विक बीज बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को सुदृढ़ करने की दिशा में कार्य कर रहा है।

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