भारत में दोगुने से ज्यादा बढ़ा मछली उत्पादन, 198 लाख टन पहुंचा; RAS-बायोफ्लॉक से आधुनिक होगा एक्वाकल्चर
09 सितंबर 2026, नई दिल्ली: भारत में दोगुने से ज्यादा बढ़ा मछली उत्पादन, 198 लाख टन पहुंचा; RAS-बायोफ्लॉक से आधुनिक होगा एक्वाकल्चर – भारत का मत्स्य पालन और जलीय कृषि क्षेत्र देश की आर्थिक वृद्धि का अहम आधार बनकर उभरा है। करीब 3 करोड़ मछुआरों और मछली किसानों की आजीविका से जुड़ा यह क्षेत्र उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन और निर्यात में रोजगार दे रहा है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक और एक्वाकल्चर उत्पादक है। साथ ही झींगा उत्पादन और निर्यात में पहले तथा प्राकृतिक स्रोतों से मछली पकड़ने में दूसरे स्थान पर है। वैश्विक मछली उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी करीब 8 प्रतिशत है।
2013-14 से दोगुने से ज्यादा हुआ उत्पादन
लगातार नीतिगत समर्थन और सार्वजनिक निवेश से मत्स्य क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है। वर्ष 2015 के बाद सरकार ने मत्स्य पालन और एक्वाकल्चर के विकास के लिए ₹39,272 करोड़ से अधिक के निवेश को मंजूरी दी या घोषित किया है। इसके चलते उत्पादन, बुनियादी ढांचे, तकनीक, बाजार पहुंच और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूती मिली। भारत का वार्षिक मछली उत्पादन 2013-14 के 95.79 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में रिकॉर्ड 198 लाख टन हो गया। इस दौरान आंतरिक मत्स्य पालन और एक्वाकल्चर का उत्पादन 147 प्रतिशत बढ़कर 61.36 लाख टन से 151.60 लाख टन पहुंच गया।
समुद्री खाद्य निर्यात भी ₹73,890 करोड़ पहुंचा
मत्स्य क्षेत्र के बढ़ते प्रभाव का असर निर्यात पर भी दिखा है। भारत का समुद्री खाद्य निर्यात 2013-14 के ₹30,213 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में रिकॉर्ड ₹73,890 करोड़ हो गया। वैश्विक व्यापार में बढ़ती जटिलताओं और टैरिफ संबंधी चुनौतियों के बीच हासिल हुई यह वृद्धि भारतीय समुद्री खाद्य उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता और वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाती है।
RAS और बायोफ्लॉक से बदलेगा मछली पालन
एक्वाकल्चर में तकनीक का इस्तेमाल इस बदलाव का प्रमुख आधार बना है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत रिसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS) और बायोफ्लॉक जैसी तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इनसे नियंत्रित वातावरण में अधिक गहन, संसाधन-कुशल और व्यावसायिक मछली पालन संभव हो रहा है। RAS में पानी को उपचारित कर दोबारा इस्तेमाल किया जाता है, जबकि बायोफ्लॉक तकनीक लाभकारी सूक्ष्मजीवों के जरिए पानी की गुणवत्ता और मछली की वृद्धि को बेहतर बनाने में मदद करती है। RAS में 90-95 प्रतिशत तक पानी का पुनर्चक्रण किया जा सकता है, जिससे शहरी उपभोग केंद्रों और निर्यात हब के करीब भी मछली पालन इकाइयां स्थापित करने की संभावना बढ़ती है।
PMMSY के तहत अब तक 9,467 RAS और 4,573 बायोफ्लॉक इकाइयों को मंजूरी दी गई है। इन तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए योजना के तहत ₹4,120 करोड़ का निवेश किया गया है। इससे सालभर मछली पालन और पारंपरिक कृषि क्षेत्रों से आगे एक्वाकल्चर के विस्तार को बढ़ावा मिल रहा है।
निर्यात और हाई-वैल्यू प्रजातियों पर फोकस
नियंत्रित वातावरण में उत्पादन से गुणवत्ता, ट्रेसबिलिटी और जैवसुरक्षा बनाए रखने में मदद मिलती है, जिससे उच्च-मूल्य समुद्री खाद्य निर्यात को भी समर्थन मिल सकता है। RAS और बायोफ्लॉक का इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में ट्रॉट जैसी प्रीमियम प्रजातियों के लिए ठंडे पानी की मत्स्य पालन क्लस्टर में किया जा रहा है। वहीं खारे और लवणीय पानी में निर्यात-उन्मुख झींगा उत्पादन तथा सजावटी मछली पालन को भी इससे बढ़ावा मिल रहा है।
AI और ड्रोन से बढ़ेगी तकनीक की भूमिका
आने वाले समय में RAS और बायोफ्लॉक को डिजिटल मॉनिटरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन आधारित सेवाओं और नवीकरणीय ऊर्जा से जोड़ने पर जोर रहेगा। इससे परिचालन दक्षता बढ़ाने और उत्पादन लागत घटाने में मदद मिल सकती है। साथ ही झींगा, ट्रॉट, सीबास, तिलापिया, मुर्रल और पंगासियस जैसी उच्च-मूल्य प्रजातियों की ओर एक्वाकल्चर के विविधीकरण से बेहतर मूल्य प्राप्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बढ़ाने की संभावना है। कौशल विकास, उद्योग साझेदारी और मजबूत नीतिगत ढांचे के साथ तकनीक आधारित मत्स्य पालन खाद्य और पोषण सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और समुद्री खाद्य निर्यात को मजबूत कर सकता है। इससे भारत की टिकाऊ और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी ब्लू इकॉनमी को आगे बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
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