भारतीय कृषि के विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख कानून और उनके नकारात्मक प्रभाव
लेखक: डॉ रवीन्द्र पस्तोर
25 जुलाई 2026, नई दिल्ली: भारतीय कृषि के विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख कानून और उनके नकारात्मक प्रभाव – भारत में कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय जीवनरेखा है। ऐतिहासिक रूप से, भारतीय कृषि को जीवन निर्वाह का साधन माना जाता था, लेकिन आज यह क्षेत्र एक बड़े संरचनात्मक और तकनीकी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। वर्तमान विकास दर, नवाचार, आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग, निवेश पर शानदार प्रतिफल (ROI), प्रति हेक्टेयर बढ़ती उत्पादकता, उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता और श्रम उत्पादकता में सुधार जैसे पैरामीटर्स यह स्पष्ट रूप से सिद्ध करते हैं कि भारतीय कृषि क्षेत्र में असीम क्षमताएं मौजूद हैं। लेकिन कृषि विकास को प्रभावित करने वाले कानूनों में से अधिकांश कई दशकों पुराने हो गए हैं।
भारत में कृषि विकास को प्रभावित करने वाले कानूनों की चर्चा करते समय एक बात स्पष्ट रखना जरूरी है: हर कानून कृषि के लिए “खराब” नहीं है। अधिकांश कानूनों का उद्देश्य किसान, उपभोक्ता, पर्यावरण या खाद्य सुरक्षा की रक्षा करना है। समस्या अक्सर पुराने कानून, अत्यधिक नियंत्रण, जटिल लाइसेंस व्यवस्था, अस्पष्ट नियम और कानूनों के असमान क्रियान्वयन से पैदा होती है जो अंततः भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है।
नीचे वे प्रमुख कानून और नियामक ढाँचे हैं जो भारतीय कृषि की उत्पादकता, निवेश, नवाचार, बाजार और किसान की आय को प्रभावित करते हैं।
1. आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955
यह कानून सरकार को आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, भंडारण, आपूर्ति, वितरण और व्यापार को नियंत्रित करने की व्यापक शक्ति देता है।
कृषि पर नकारात्मक प्रभाव
व्यापारी और निजी कंपनियां बड़े गोदाम और कोल्ड स्टोरेज बनाने से डरती हैं।
अचानक स्टॉक लिमिट लगने का खतरा निवेश को हतोत्साहित करता है।
किसानों को फसल के अच्छे भाव की प्रतीक्षा करने के बजाय तुरंत बेचने का दबाव बनता है।
कृषि उत्पादों की कीमतों में सरकारी हस्तक्षेप से बाजार में अनिश्चितता पैदा होती है।
कृषि-व्यापार और खाद्य प्रसंस्करण में दीर्घकालीन निवेश प्रभावित होता है।
मुख्य समस्या: भारत में कृषि भंडारण की कमी है, लेकिन ऐसी नियामक अनिश्चितता निजी निवेश को रोकती है।
2. राज्य कृषि उपज मंडी समिति कानून, APMC Acts
भारत में प्रत्येक राज्य का अपना APMC कानून है। इन कानूनों के तहत कई कृषि उत्पादों की बिक्री अधिसूचित मंडियों और लाइसेंस प्राप्त व्यापारियों के माध्यम से होती है।
नकारात्मक प्रभाव
किसान को कई बार अपनी उपज बेचने के लिए सीमित बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता है।
मंडी शुल्क, आढ़त, लाइसेंस और अन्य शुल्क से लागत बढ़ती है।
किसानों और अंतिम खरीदारों के बीच बिचौलियों की कई परतें हैं।
किसान सीधे प्रोसेसर, रिटेलर या खाद्य कंपनियों को बेचने में कठिनाई महसूस करता है।
कृषि बाजार का राज्यवार विभाजन राष्ट्रीय बाजार के विकास को रोकता है। क्योंकि किसानों को उपज बेचने के लिए ‘फेयर एवरेज क्वालिटी’ (FAQ) मापदण्ड अनिवार्य नहीं है।
लेकिन संतुलित दृष्टिकोण
APMC मंडियों ने किसानों को संगठित बाजार, नीलामी व्यवस्था और कुछ हद तक मूल्य सुरक्षा भी दी है। इसलिए समाधान APMC को समाप्त करना नहीं, बल्कि APMC के साथ समानांतर प्रतिस्पर्धी निजी बाजार विकसित करना होना चाहिए।
3. बीज अधिनियम, 1966 और बीज संबंधी नियमन
बीज क्षेत्र में गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यक है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में कई प्रक्रियाएं जटिल और धीमी होती हैं।
नकारात्मक प्रभाव
नई बीज किस्मों के बाजार में आने में लंबा समय लगता है।
छोटे बीज उद्यमों और स्टार्टअप्स के लिए परीक्षण और अनुमोदन महंगे होते हैं।
स्थानीय और पारंपरिक बीज प्रणालियों को औपचारिक बाजार में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
किसानों को गुणवत्तापूर्ण और नवीन किस्मों तक पहुंचने में देरी होती है।
अनुसंधान संस्थानों और निजी कंपनियों के बीच नवाचार की गति धीमी है।
बीज का व्यापार करने में लाइसेंस राज तथा लाल फीताशाही के कारण मोनोपॉली उत्पन्न होती है।
महत्वपूर्ण सुधार: गुणवत्ता नियंत्रण बना रहना चाहिए, लेकिन अनुमोदन प्रणाली अधिक तेज, पारदर्शी और जोखिम-आधारित होनी चाहिए। व्यापार करने में लाइसेंस राज तथा लाल फीताशाही के कारण मोनोपॉली उत्पन्न करने वाले प्राबधान समाप्त करने होंगे।
4. पौध किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001
यह कानून किसानों और पौध प्रजनकों दोनों के अधिकारों की रक्षा करता है।
संभावित चुनौती
बौद्धिक संपदा और किसान अधिकारों के बीच संतुलन जटिल है।
नई किस्मों के विकास में निवेश करने वाली कंपनियों को लंबे समय तक कानूनी अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है।
किसानों, कंपनियों और शोध संस्थानों के बीच अधिकारों को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं।
सकारात्मक पक्ष
यह कानून किसान को पारंपरिक रूप से संरक्षित अधिकार देता है। इसलिए समस्या कानून के अस्तित्व में नहीं, बल्कि स्पष्टता, जागरूकता और प्रभावी क्रियान्वयन में अधिक है।
5. कीटनाशी अधिनियम, 1968
यह कानून कीटनाशकों के आयात, निर्माण, बिक्री, परिवहन, वितरण और उपयोग को नियंत्रित करता है। इसका उद्देश्य मनुष्यों और पशुओं को जोखिम से बचाना है। (India Code)
नकारात्मक प्रभाव
नए और कम विषैले कीटनाशकों के पंजीकरण में अधिक समय लगता है।
जैविक कीटनाशकों और जैव-नियंत्रण उत्पादों के लिए स्पष्ट और तेज नियामक व्यवस्था का अभाव होता है।
नकली और अवैध उत्पादों पर प्रभावी नियंत्रण न होने से ईमानदार कंपनियां नुकसान उठाती हैं।
छोटे कृषि-तकनीकी स्टार्टअप के लिए अनुपालन लागत बहुत अधिक होती है।
कीटनाशकों और जैव-नियंत्रण उत्पादों के व्यापार करने में लाइसेंस राज तथा लाल फीताशाही के कारण मोनोपॉली उत्पन्न होती है।
मुख्य समस्या
सुरक्षा नियमन आवश्यक है, लेकिन वैज्ञानिक उत्पादों के लिए अनावश्यक रूप से लंबी और अस्पष्ट मंजूरी प्रक्रिया कृषि नवाचार को रोकती है।
व्यापार करने में लाइसेंस राज तथा लाल फीताशाही के कारण मोनोपॉली उत्पन्न करने वाले प्राबधान समाप्त करने होंगे।
6. उर्वरक नियंत्रण आदेश, 1985
उर्वरक क्षेत्र में गुणवत्ता, मूल्य और वितरण को नियंत्रित करने के लिए अनेक नियम लागू हैं।
नकारात्मक प्रभाव
नए उर्वरक उत्पादों और नवाचारों को बाजार में आने में लंबा समय लगता है।
उत्पादों की स्वीकृति और पंजीकरण प्रक्रिया जटिल होती है।
छोटे निर्माताओं और कृषि स्टार्टअप्स के लिए अनुपालन लागत बहुत अधिक होती है।
किसानों को स्थानीय मिट्टी और फसल की आवश्यकताओं के अनुसार नए उत्पादों के विकल्प सीमित मिलते हैं।
सब्सिडी आधारित व्यवस्था कभी-कभी वास्तविक कृषि आवश्यकता के बजाय प्रशासनिक वर्गीकरण को प्राथमिकता देती है।
व्यापार करने में लाइसेंस राज तथा लाल फीताशाही के कारण मोनोपॉली उत्पन्न करने वाले प्राबधान समाप्त करने होंगे।
7. कृषि भूमि संबंधी कानून और भूमि-सीमा कानून
भारत में भूमि मुख्यतः राज्य का विषय है। राज्यों में भूमि स्वामित्व, हस्तांतरण, पट्टा, भूमि-सीमा और उपयोग में परिवर्तन के लिए अलग-अलग कानून हैं।
नकारात्मक प्रभाव
छोटे और बिखरे हुए खेतों के कारण बड़े पैमाने पर आधुनिक कृषि करना कठिन हो जाता है।
कई राज्यों में भूमि पट्टे पर देने के नियम अत्यधिक कठोर हैं।
किसान अपनी जमीन औपचारिक रूप से पट्टे पर देने से डरता है।
किरायेदार किसान को संस्थागत ऋण, बीमा और सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता।
कृषि भूमि को गैर-कृषि उपयोग में बदलने की प्रक्रिया कई बार लंबी और जटिल होती है।
परिणाम
भारत में करोड़ों किसान छोटी जोत पर खेती करते हैं, लेकिन कानूनों के कारण भूमि का कुशल समेकन और आधुनिक कृषि मॉडल विकसित करना कठिन होता है।
8. भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन कानून
भूमि अधिग्रहण में किसानों के अधिकारों की रक्षा आवश्यक है। लेकिन लंबी प्रक्रियाओं के कारण:
सिंचाई परियोजनाओं में देरी होती है।
ग्रामीण सड़क और कृषि बुनियादी ढांचे के निर्माण में समय लग सकता है।
वेयरहाउस, कोल्ड चेन और खाद्य प्रसंस्करण परियोजनाएं अटक सकती हैं।
औद्योगिक और कृषि मूल्य श्रृंखलाओं का विकास धीमा हो रहा है।
यहां समस्या किसान के अधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि निष्पक्ष मुआवजा और तेज प्रक्रिया के बीच संतुलन की है।
9. पर्यावरण संरक्षण कानून
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, जल और वायु प्रदूषण संबंधी कानून तथा पर्यावरणीय स्वीकृति व्यवस्था आवश्यक हैं।
कृषि पर संभावित प्रभाव
खाद्य प्रसंस्करण और कृषि-आधारित उद्योगों को कई अनुमतियों की आवश्यकता होती है।
छोटे उद्योगों के लिए अनुपालन लागत अधिक होती है।
कृषि अपशिष्ट से ऊर्जा या जैविक उत्पाद बनाने वाली इकाइयों को कई विभागों से अनुमति लेनी पड़ती है।
कृषि-आधारित उद्योगों की स्थापना में देरी होती है।
संतुलन
पर्यावरण सुरक्षा को कमजोर करना समाधान नहीं है। आवश्यकता है कि छोटे और कम जोखिम वाले कृषि उद्योगों के लिए सरल, ऑनलाइन और समयबद्ध स्वीकृति प्रणाली बनाई जाए।
10. जैव-सुरक्षा और GM फसलों से संबंधित नियमन
भारत में आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों के परीक्षण और व्यावसायिक उपयोग के लिए कठोर जैव-सुरक्षा व्यवस्था है।
नकारात्मक प्रभाव
नई तकनीकों के परीक्षण में वर्षों लगते हैं।
कृषि जैव-प्रौद्योगिकी में निजी निवेश कम होता है।
भारतीय किसानों को नई तकनीक और उन्नत किस्मों तक पहुंच में देरी होती है।
वैश्विक कृषि अनुसंधान की गति से भारत पीछे रहता है।
मुख्य प्रश्न: सुरक्षा मानकों से समझौता किए बिना क्या परीक्षण और अनुमोदन प्रक्रिया अधिक तेज हो सकती है?
11. कृषि उत्पादों पर GST और कर कानून
कृषि क्षेत्र में कर व्यवस्था कई स्तरों पर जटिल है।
नकारात्मक प्रभाव
कृषि मशीनरी और उपकरणों पर कर लागत बढ़ती जा रही है।
कृषि इनपुट और कृषि उत्पादों की कर व्यवस्था में असमानता जटिलता पैदा करती है।
छोटे कृषि उद्यमों और ग्रामीण प्रोसेसरों के लिए अनुपालन करना कठिन होता है।
छोटे किसान और किसान उत्पादक संगठन (FPO) औपचारिक बाजार में आने से बचते हैं।
12. सहकारी समितियों और FPO से संबंधित कानून
FPO और सहकारी समितियां किसानों को सामूहिक शक्ति प्रदान करती हैं।
संभावित समस्याएं
पंजीकरण और अनुपालन प्रक्रिया जटिल होती है।
राज्यों के अलग-अलग कानूनों से राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार कठिन होता है।
किसानों के सामूहिक उद्यमों को पेशेवर प्रबंधन में कठिनाई होती है।
कई FPO सरकारी सहायता पर निर्भर रह जाते हैं और व्यावसायिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पाते।
13. कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग संबंधी कानून
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग किसानों को बाजार और पूर्व-निर्धारित खरीदार उपलब्ध करा सकती है। लेकिन यदि नियम स्पष्ट न हों तो:
किसानों और कंपनियों के बीच विवाद बढ़ते जा रहे हैं।
छोटे किसान कानूनी रूप से कमजोर स्थिति में होते हैं।
कंपनियां छोटे किसानों के साथ अनुबंध करने से बचती हैं।
गुणवत्ता और कीमत को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं।
इसलिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए सरल अनुबंध, स्थानीय विवाद समाधान और किसान के लिए कानूनी सहायता आवश्यक है।
14. उपभोक्ता संरक्षण कानून और कृषि उत्पाद
खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता संरक्षण आवश्यक हैं। लेकिन छोटे किसानों और छोटे खाद्य उद्यमों पर अनुपालन का अत्यधिक बोझ पड़ता है।
संभावित प्रभाव
छोटे प्रसंस्करण व्यवसायों के लिए लाइसेंस और दस्तावेजी प्रक्रियाएं जटिल होती हैं।
ग्रामीण उद्यम औपचारिक क्षेत्र में आने से बचते हैं।
किसान सीधे मूल्यवर्धित उत्पाद बेचने में कठिनाई महसूस करते हैं।
सबसे बड़ी समस्या: कानूनों की संख्या नहीं, उनका जटिल और असंगत ढांचा
भारतीय कृषि के सामने मुख्य नियामक समस्याएं इस प्रकार हैं:
1. अनेक विभागों की अनुमति
एक कृषि उद्यम को कृषि, खाद्य, पर्यावरण, श्रम, कर, मंडी और स्थानीय प्रशासन से अलग-अलग अनुपालन करना पड़ता है।
2. केंद्र और राज्यों के अलग-अलग कानून
कृषि भारत में मुख्यतः राज्य विषय है। परिणामस्वरूप:
एक राज्य में वैध व्यवसाय दूसरे राज्य में कठिन होता है।
राष्ट्रीय कृषि बाजार बनाना कठिन होता है।
कृषि स्टार्टअप का विस्तार महंगा हो जाता है।
3. पुराने कानून
कई कानून ऐसे समय बनाए गए थे जब:
भारत खाद्य संकट से जूझ रहा था।
निजी क्षेत्र की भूमिका सीमित थी।
डिजिटल बाजार मौजूद नहीं थे।
कृषि आपूर्ति श्रृंखला स्थानीय थी।
आज कृषि बदल चुकी है, लेकिन कानूनों का बड़ा हिस्सा अभी भी पुराने प्रशासनिक दृष्टिकोण पर आधारित है।
4. किसान को उत्पादक से अधिक “नियंत्रित व्यक्ति” मानना
भारतीय नियामक व्यवस्था में किसान को अक्सर:
लाइसेंस लेने वाला व्यक्ति,
नियंत्रित बाजार का हिस्सा,
सब्सिडी का लाभार्थी माना जाता है।
आधुनिक कृषि में किसान को उद्यमी, व्यापारी, निवेशक और मूल्य श्रृंखला के भागीदार के रूप में देखना होगा।
मेरी दृष्टि में सबसे अधिक सुधार की आवश्यकता वाले क्षेत्र
प्राथमिकता 1: कृषि बाजार
APMC के साथ-साथ किसानों को स्वतंत्र रूप से बेचने के अधिक विकल्प मिलें।
प्राथमिकता 2: कृषि इनपुट
बीज, जैव-उत्पाद, कीटनाशक और उर्वरक के अनुमोदन की प्रक्रिया तेज और वैज्ञानिक हो।
प्राथमिकता 3: भूमि पट्टा
कानूनी और सुरक्षित कृषि लीज मॉडल विकसित किया जाए।
प्राथमिकता 4: Essential Commodities Act
सरकार को बाजार में हस्तक्षेप करने की शक्ति रहे, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में अचानक और अप्रत्याशित हस्तक्षेप न हो।
प्राथमिकता 5: कृषि स्टार्टअप
एक Single Window Agriculture Regulatory System बनाया जाए।
प्राथमिकता 6: किसान उत्पादक संगठन
FPO को केवल सरकारी योजना का लाभार्थी नहीं, बल्कि वास्तविक कृषि कंपनी की तरह विकसित किया जाए।
प्राथमिकता 7: ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ व्यापार करने में आसानी की नीति के तहत कृषि सेक्टर को सरकारी तंत्र के चंगुल से बाहर निकाल कर नियम कानूनों का सरलीकरण कर भ्रष्टाचार को कम करना होगा।
निष्कर्ष
भारतीय कृषि और संबद्ध क्षेत्र अब भी भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारभूत शक्ति हैं। वर्ष 2024-25 के लिए कृषि और संबद्ध क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धन में वर्तमान कीमतों पर 10.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसी अवधि में भारत का खाद्यान्न उत्पादन अनुमानित रूप से 3,577.32 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा। यह पिछले वर्ष की तुलना में 7.65 प्रतिशत अधिक था। यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय कृषि को अक्सर धीमी गति से बढ़ने वाला क्षेत्र माना जाता है। वास्तविकता यह है कि कृषि के भीतर भी संरचनात्मक परिवर्तन हो रहे हैं। पारंपरिक अनाज उत्पादन के साथ-साथ दूध, मछली, पशुपालन, बागवानी, मसाले, फल, सब्जियां, फूल, जैविक उत्पाद और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ तेजी से बढ़ रहे हैं।
भारतीय कृषि की सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ी संभावना दोनों प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में छिपी हुई हैं। भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी कृषि योग्य भूमि में से एक है, लेकिन कई प्रमुख फसलों में भारत की औसत प्रति हेक्टेयर उत्पादकता विकसित कृषि अर्थव्यवस्थाओं से कम है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय कृषि कमजोर है। इसका अर्थ यह है कि भारत में अभी भी उत्पादन बढ़ाने की बहुत बड़ी गुंजाइश है।
भारतीय कृषि में बड़ी संख्या में लोग कार्यरत हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति कृषि श्रम उत्पादकता अभी भी अपेक्षाकृत कम है। इसका मुख्य कारण छोटे और बिखरे हुए खेत, पारंपरिक तकनीक, कम मशीनीकरण और कृषि कार्यों में अधिक मानवीय श्रम है। मशीनीकरण से श्रम उत्पादकता में बड़ी वृद्धि हो सकती है। इसका अर्थ है कि कृषि की वृद्धि केवल खेत में अधिक उत्पादन से नहीं, बल्कि पूरी कृषि मूल्य श्रृंखला में हो रही है। विश्व बाजार में केवल अधिक उत्पादन पर्याप्त नहीं है।
आज बाजार गुणवत्ता, सुरक्षा, ट्रेसबिलिटी और प्रमाणन की मांग करता है। भारतीय कृषि उत्पादों की वैश्विक मांग बढ़ रही है। वर्ष 2024-25 में भारत का कृषि निर्यात लगभग 51.913 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। APEDA के अंतर्गत आने वाले उत्पादों का निर्यात लगभग 28.6 अरब डॉलर रहा। भारतीय कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद 200 से अधिक देशों और क्षेत्रों तक पहुंचते हैं।
भारत में कृषि उत्पादन बढ़ने के बावजूद किसानों की आय कई बार इसलिए कम रहती है क्योंकि उत्पादन का एक हिस्सा खेत से बाजार तक पहुंचने से पहले खराब हो जाता है। यदि किसान को बाजार में तुरंत बेचने की मजबूरी न हो, तो उसकी सौदेबाजी की शक्ति बढ़ती है। कोल्ड चेन केवल खाद्य नुकसान को कम नहीं करती। यह किसान को समय के अनुसार बिक्री का अवसर देती है। कृषि में निवेश का एक बड़ा क्षेत्र इसलिए खेत नहीं, बल्कि फार्म-गेट के बाद की अवसंरचना है।
भारत की कृषि की सबसे बड़ी शक्ति केवल भूमि नहीं है। इसकी वास्तविक ताकत है:
विशाल घरेलू बाजार,
विविध जलवायु,
विविध फसलें,
बड़ी ग्रामीण आबादी,
कृषि वैज्ञानिकों और संस्थानों का नेटवर्क,
तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था,
विशाल खाद्य प्रसंस्करण बाजार,
निर्यात की संभावना,
युवा उद्यमी,
तकनीकी नवाचार।
भविष्य की भारतीय कृषि में सफलता का सूत्र होगा:
अधिक उत्पादन नहीं, बेहतर उत्पादन।
केवल फसल नहीं, मूल्य संवर्धन।
केवल किसान नहीं, कृषि उद्यमी।
केवल खेत नहीं, पूरी मूल्य श्रृंखला।
केवल परंपरा नहीं, विज्ञान और तकनीक।
भारत में कृषि का भविष्य अत्यंत व्यापक है।
भारत के सामने यह चुनौती नहीं है कि वह कृषि उत्पादन कर सकता है या नहीं। भारत ने यह क्षमता पहले ही सिद्ध कर दी है। असली चुनौती यह है कि उत्पादन को उत्पादकता, उत्पादकता को लाभ, लाभ को निवेश और निवेश को टिकाऊ ग्रामीण समृद्धि में कैसे बदला जाए। भारत की कृषि समस्या केवल कम उत्पादन या कम वर्षा की समस्या नहीं है। यह काफी हद तक नियामक ढांचे की समस्या भी है। किसान को खेत में स्वतंत्रता मिलती है, लेकिन खेत से बाजार तक पहुंचते-पहुंचते वह अनेक कानूनों, लाइसेंस, मंडी नियमों, करों, परिवहन प्रतिबंधों, भंडारण नियमों और राज्य-स्तरीय अनुमतियों में उलझ जाता है।
भारत को कृषि क्षेत्र में कम कानून नहीं, बल्कि बेहतर कानून चाहिए।
ऐसे कानून जो:
किसान की रक्षा करें,
उपभोक्ता की सुरक्षा करें,
पर्यावरण बचाएं,
लेकिन उद्यमिता को न रोकें;
नवाचार को प्रोत्साहित करें,
निवेश को आकर्षित करें,
और किसान को अपनी उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त करने की वास्तविक स्वतंत्रता दें।
कृषि कानूनों का अंतिम उद्देश्य यह होना चाहिए कि किसान सरकार का नियंत्रित लाभार्थी नहीं, बल्कि स्वतंत्र और सक्षम कृषि उद्यमी बने।
इस परिवर्तन के केंद्र में किसान होगा, लेकिन उसके साथ वैज्ञानिक, स्टार्टअप, उद्योग, डिजिटल तकनीक, वित्तीय संस्थान, FPO और सरकार को मिलकर काम करना होगा।
भारत की कृषि का भविष्य केवल खेत में नहीं उगता। वह प्रयोगशालाओं, डेटा सेंटरों, स्टार्टअप कार्यालयों, प्रसंस्करण इकाइयों, कोल्ड चेन, निर्यात बाजारों और गांवों के नए उद्यमों में भी तैयार हो रहा है।
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