राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

भूली बिसरी फसलें: क्या पोषण की खोई दौलत वापस लौटेगी? 

लेखक: शशिकांत त्रिवेदी, वरिष्ठ पत्रकार

24 जुलाई 2026, नई दिल्ली: भूली बिसरी फसलें: क्या पोषण की खोई दौलत वापस लौटेगी? –  हमारे पूर्वजों ने सैकड़ों प्रजातियों की वनस्पतियों को भोजन के रूप में अपनाया था, लेकिन आज की आधुनिक खेती और बाजार व्यवस्था ने इस विविधता को बुरी तरह सीमित कर दिया है। दुनिया भर में खाद्य रूप में इस्तेमाल होने वाली लगभग 7,000 फसल और फलों वगैरा की प्रजातियों में से मात्र 150 ही बड़े पैमाने पर उगाई जा रही हैं। लोगों की रोजमर्रा की सेहत और पोषण की जरूरतें महज 30 फसलों से पूरी हो रही हैं, जिनमें चावल, गेहूं और मक्का अकेले ही दुनिया भर के भोजन का 60 फ़ीसदी से ज्यादा हिस्सा साझा करते हैं। बाकी कई पौष्टिक फसलें धीरे-धीरे विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई हैं या किसान उन्हें पूरी तरह से भूल चुके हैं। इन भूली बिसरी फसलों में मोटे अनाज जैसे रागी, कुट्टू, कोदो, बहुत तरह के बेर-करौंदा जैसे फल और सहजन, चौलाई जैसी सब्जियां शामिल हैं। ये न केवल विटामिन, मिनरल्स, फाइबर और प्रोटीन से भरपूर हैं बल्कि इनमे औषधीय गुण भी होते हैं।

राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी (NAAS) ने अक्टूबर 2025 में जारी अपनी नीति पत्र संख्या 140 में इस समस्या पर गहराई से प्रकाश डाला है। रिपोर्ट में 10 फलों और 10 सब्जियों की उन प्रजातियों को चिन्हित किया गया है जो पहले आसानी से बाज़ार में मिल जाती थीं लेकिन अब बाजार से लगभग गायब हो चुकी हैं या इनके मूल स्वरुप नहीं हैं। इन्हे अमूमन देशी फसल कहा जाता था. थोड़ी बहुत मात्रा में ये अपने मौसम में मिल जाते हैं लेकिन इन्हे बड़े पैमाने पर कोई उगाता नहीं है. इनमें आंवला, बेल, जामुन, शरीफा, करौंदा, इमली, फालसा, सहजन, परवल, ग्वार फली और मिश्रीकंद जैसी फसलें शामिल हैं। ये फसलें कुपोषण, एनीमिया और जीवनशैली संबंधी बीमारियों से लड़ने में बेहद प्रभावी साबित हो सकती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन पर जलवायु परिवर्तन का कोई खास फर्क नहीं पड़ता। सूखा हो या कम बारिश हो या ऐसे ही कम बारिश वाले क्षेत्र हों ये सब जगह उग आते हैं. इन्हे थोड़ी बहुत खाद चाहिए बस, कोई कीटनाशक या महंगे बीज की भी ज़रूरत नहीं है. बंजर और परती भूमि पर इन्हें उगाने से न केवल अनुपजाऊ जमीन उपयोगी होती है बल्कि छोटे और सीमांत किसानों की आय भी बढ़ सकती है।

राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी की एक हालिया रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि इन फसलों की खेती को बढ़ावा देने, मूल्य संवर्धन और बेहतर विपणन व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है। इनकी छोटी शेल्फ लाइफ को ध्यान में रखते हुए प्रसंस्करण उद्योग को प्रोत्साहन मिलना चाहिए ताकि ऑफ-सीजन में भी ये उत्पाद उपलब्ध रहें। सरकारी योजनाओं के माध्यम से इनकी व्यावसायिक खेती को बढ़ावा दिया जाए तो पोषण सुरक्षा के साथ-साथ जैव विविधता संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। यदि इन “स्मार्ट फूड” को मुख्यधारा में लाया गया तो ये भविष्य के “सुपरफूड” साबित हो सकते हैं। हाल ही केंद्र सरकार ने मिशन सेहत (SEHAT) शुरू किया है. इस मिशन के तहत भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने संयुक्त रूप से ‘SEHAT – Science Excellence for Health through Agricultural Transformation’ नामक राष्ट्रीय मिशन मोड कार्यक्रम शुरू किया है। इस मिशन का उद्देश्य कृषि क्षेत्र की प्रगति को लोगों के स्वास्थ्य के ठोस परिणामों में बदलना है। देश वर्तमान में कुपोषण और डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, कैंसर के दोहरे बोझ से जूझ रहा है। इस मिशन में भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् पौष्टिक खाद्य प्रणालियां सुनिश्चित कर सकता है, जबकि भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् वैज्ञानिक प्रमाण प्रदान करेगा। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को जोड़कर खोई हुई विविधता को वापस लाकर भारत की खेती को बदलते परिवेश में बेहतर तरीके से बचाया जा सकता है.

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