दुधारू पशुओं के खुरों की देखभाल

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पशु के खुरों का बाहरी हिस्सा सख्त होता हैं लेकिन उसका तल तथा एड़ी नर्म होते हैं। वैसे खूर न तो ज्यादा सख्त होने चाहिए और न ही बहुत नर्म होने चाहिए। परंपरागत पद्धति में ज्यादातर देशी पशु पाले जाते हैं तथा इस पद्धति में काफी घूमने-फिरने से पशुओं के खुरों की प्राकृतिक रूप से निरंतर घिसाई हो जाती हैं और वे समतल रहते हैं।
लेकिन वैज्ञानिक ढंग से पाले जाने वाले दुधारू पशु को ज्यादा दूध उत्पादन प्राप्ति हेतु ज्यादातर समय एक ही जगह रखा जाता हैं। स्वाभाविकत: उसका घूमना-फिरना बहुत कम होता हैं और उसके खुरों की घिसाई बहुत कम होने से वे बढ़ जाते हैं। खुर बढऩे से पशु का शरीर संतुलन बिगड़ जाता हैं और वे उसकी वजह से न तो ठीक से खड़े हो पाते हैं और न ही ठीक से चल-फिर सकते हैं। इससे उन्हें चराई में तथा इधर-उधर जाने में पानी पीने हेतु टंकी के पास जाने में तथा अन्य कार्यकलापों में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता हैं। ठीक से चराई न होने से उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता हैं। उनके शरीर को पर्याप्त व्यायाम न मिलने से उनके पाचन, चारा रूपांतरण समता, कुल स्वास्थ्य तथा दूध उत्पादन पर विपरीत असर पड़ता हैं. सारांश, एक छोटी सी बात के इतने बुरे प्रभाव होते हैं. अत: पशुओं के खुरों की नियमित जांच करें तथा वे अनियमित और बड़े हो जाये। बढ़ जायें तो उन्हें साफ निर्जंतुक चाकू से ऊपरी सतह सावधानीपूर्वक काटकर उन्हें सुयोग्य आकार दें और कानस से घिसकर समतल बनायें. फिर उन पर जंतुनाशक घोल या क्रीम लगा सकते हैं।

दुधारू पशुओं के प्रबंधन में कई बातें जरूरी होती हैं। इनमें दुधारू पशुओं के खुरों की देखभाल भी जरूरी हैं क्योंकि खुरों की हालत तथा सेहत का उनके स्वास्थ्य तथा दूध उत्पादन से संबंध होता हैं। भारत में मौजूद अवर्णीत देशी पशुओं के खुर मजबूत होते हैं तथा वे ज्यादा सहनशील होते हैं अत: खराब आवास, खराब फर्श, कीचड़, खराब प्रबंधन होने के बावजूद उन पर ज्यादा असर नहीं होता। लेकिन विदेशी मूल के पशु जैसे होलस्टन, फ्रीजीयन, ब्राउन स्वीस तथा उनसे प्राप्त संकर पशुओं के खुर नाजुक होने के अलावा वे खराब फर्श, कीचड़, दलदल, गीलापन तथा खराब प्रबंधन से जल्दी तथा ज्यादा प्रभावित होते हैं. अत: उनके खुरों की देखभाल निहायत जरूरी हैं।

कभी-कभी खुरों में जख्म (सोल अल्सर) हो जाते हैं. जो काफी दर्दनाक होते हैं। इनके कारण पशु का चारा खाना, चारा रूपांतरण क्षमता, स्वास्थ्य आदि पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं। इनके अलावा दूध उत्पादन में कमी आना, देर से गर्मी में आना आदि प्रभाव भी होते हैं. खुरों के तल पर खून का रिसाव दिखाई दे तो समझ लें कि यह बीमारी 1 से 2 माह पुरानी है. खुरों को पानी में पोटेशियम परमेगनेट (लाल दवा) या अन्य जीवाणुनाशक दवा डालकर उस घोल से साफ करें तथा उन पर कॉपर सल्फेट (नीला थोथा) लगायें या जख्म साफ कर जिंक ऑक्साइड या अन्य जीवाणुनाशक मरहम लगाकर पट्टïी बाँधे। जरूरत पडऩे पर पशुओं के डाक्टर से जाँच करवाकर समुचित दवा का प्रयोग करें. खुरों के बीमारी के लक्षण निम्नलिखित अनुसार हैं।

       खुरों की देखभाल हेतु उपाय –

  • पशु को सूखे, हवादार, प्रकाशमान, साफ-सुथरे फर्श पर रखें.
  • जहाँ पशु को रखते हैं वहाँ कतई कीचड़ या गीलापन नहीं होना चाहिए।
  • फर्श ना तो चिकना हो और ना ही उबडख़ाबड़. पशु ठीक से खड़ा हो सके ऐसा फर्श चाहिए.
  • पशु को नियमित रूप से कुछ देर चलायें ताकि उनकी प्राकृतिक रूप से कुछ घिसाई हो. इसके बावजूद वे अनियमित रूप से बड़ जायें। तो वर्ष में दो बार उन्हें तराशकर आकार दें.
  • पशु के खुरों की पशुओं के डाक्टर द्वारा जांच करवायें तथा कुछ बीमारी होने पर समुचित दवा दें.
  • पशु को नियमानुसार हर वर्ष टीके लगवायें. इस प्रकार देखभाल करने से दुधारू पशुओं में खुरों को कम से कम समस्याएं होंगी।
  • खुरों पर स्थित सफेद रेखा दो भागों में विभाजित होना.
  • खुरों का तल पीला दिखना.
  • खुरों पर खून का रिसाव/जख्म दिखना.
  • खुरों की अनियमित बढ़वार होना.
  • खुरों पर खाँचे दिखाई देना.
  • खुर फटना.
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