राज्य कृषि समाचार (State News)

क्या चार जिलों का कृषि रोडमैप देश की खेती बदल पाएगा ?

लेखक: मधुकर पवार 

06 जून 2026, नई दिल्ली: क्या चार जिलों का कृषि रोडमैप देश की खेती बदल पाएगा ? –  मध्यप्रदेश के रायसेन, विदिशा, सीहोर और देवास जिलों के लिए तैयार किया जा रहा विशेष कृषि रोडमैप निस्संदेह एक महत्वाकांक्षी पहल है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान इसे कृषि परिवर्तन के ऐसे मॉडल के रूप में विकसित करना चाहते हैं, जिसे भविष्य में देशभर में लागू किया जा सके। जल संरक्षण, वैज्ञानिक खेती, फसल विविधीकरण, समेकित कृषि प्रणाली और किसानों की आय बढ़ाने जैसे लक्ष्य निश्चित रूप से स्वागतयोग्य हैं। किंतु किसी भी बड़ी योजना की सफलता का आकलन केवल उसके उद्देश्यों से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन, व्यवहारिकता और संभावित चुनौतियों से भी किया जाना चाहिए। भारतीय कृषि लंबे समय से अनेक संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रही है। भूजल स्तर में गिरावट, मिट्टी की उर्वरता में कमी, बढ़ती उत्पादन लागत, बाजार की अनिश्चितता और जलवायु परिवर्तन के कारण खेती लगातार जोखिमपूर्ण होती जा रही है। ऐसे में चार जिलों को कृषि सुधार का मॉडल बनाने का विचार सकारात्मक अवश्य है, लेकिन यह भी देखना होगा कि क्या यह मॉडल वास्तव में देश के अन्य राज्यों के लिए भी कारगर सिद्ध होगा जिससे यह मॉडल किसानों की आय बढ़ाने में सफल होगा या फिर यह भी अनेक पूर्ववर्ती योजनाओं की तरह सरकारी दस्तावेजों तक सीमित रह जाएगा। इस रोडमैप की सबसे बड़ी विशेषता यह बताई जा रही है कि इसकी सफलता का पैमाना किसानों की शुद्ध आय होगी।

यह सोच सही दिशा में है, क्योंकि कृषि क्षेत्र में लंबे समय से उत्पादन और उपलब्धियों के आंकड़ों पर अधिक जोर दिया जाता रहा है, जबकि किसान की जेब में वास्तविक रूप से कितना पैसा पहुंचा, इसका आकलन कम हुआ है। लेकिन यहां पहला प्रश्न यह उठता है कि किसानों की आय का आधारभूत आंकड़ा कैसे तय होगा और उसकी निगरानी कितनी पारदर्शी होगी? यदि आय मापन की व्यवस्था स्पष्ट और वैज्ञानिक नहीं हुई तो सफलता के दावे वास्तविकता से दूर हो सकते हैं। योजना में जल संरक्षण और सूक्ष्म सिंचाई पर विशेष बल दिया गया है। अल-नीनो और संभावित जल संकट को देखते हुए यह आवश्यक भी है। लेकिन वास्तविकता यह है कि प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई की लागत आज भी छोटे किसानों की पहुंच से बाहर है। सरकारी अनुदान मिलने के बावजूद कई किसानों को महीनों तक भुगतान का इंतजार क रना पड़ता है। यदि इस व्यवस्था को सरल और पारदर्शी नहीं बनाया गया तो जल प्रबंधन का लक्ष्य अधूरा रह सकता है। भूजल स्तर में वृद्धि के लिए विशेष प्रयास करने की आवश्यकता है। फसल विविधीकरण को भी इस रोडमैप का प्रमुख आधार बनाया गया है। विदिशा में सोयाबीन-मक्का, रायसेन में धान-लहसुन, सीहोर में उच्च मूल्य वाली फसलें तथा देवास में मक्का-लहसुन-प्याज आधारित मॉडल प्रस्तावित किए गए हैं। लेकिन यहां भी एक बड़ी चुनौती बाजार की है। यदि किसान परंपरागत फसलों को छोड़कर नई फसलें अपनाते हैं और बाद में उन्हें उचित मूल्य नहीं मिलता, तो पूरी योजना का उद्देश्य विफल हो सकता है।

देश में प्याज, टमाटर, लहसुन और दलहनों के मूल्य में होने वाले भारी उतार-चढ़ाव इसके अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इसलिए फसल विविधीकरण के साथ-साथ मूल्य स्थिरता, प्रसंस्करण और विपणन व्यवस्था को भी समान प्राथमिकता देना होगी। समेकित कृषि प्रणाली अर्थात खेती के साथ डेयरी, मत्स्य पालन और बागवानी को जोड़ने का विचार भी सराहनीय है। इससे किसानों की आय के कई स्रोत बन सकते हैं। लेकिन इसके लिए प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन, वित्तीय सहायता और बाजार समर्थन की आवश्यकता होगी। केवल निर्देश जारी कर देने से किसान नई गतिविधियों को सफलतापूर्वक नहीं अपना पाएंगे। योजना में विभिन्न सरकारी योजनाओं के अभिसरण की बात कही गई है।

यह अवधारणा अच्छी है, लेकिन भारत में विभागीय समन्वय हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। कृषि, उद्यानिकी, सिंचाई, पशुपालन, ग्रामीण विकास और बैंकिंग संस्थाओं के बीच प्रभावी तालमेल के बिना यह लक्ष्य हासिल करना कठिन होगा। अनेक योजनाएं इसलिए अपेक्षित परिणाम नहीं दे पातीं क्योंकि विभाग अलग-अलग दिशा में कार्य करते हैं। एक अन्य चिंता यह भी है कि इस पूरी पहल का केंद्र चार अपेक्षाकृत विकसित कृषि जिले हैं। रायसेन, सीहोर, विदिशा और देवास में सिंचाई सुविधाएं, सड़क संपर्क और बाजार व्यवस्था प्रदेश के अनेक अन्य जिलों की तुलना में बेहतर हैं। यदि यह मॉडल सफल भी हो जाता है, तब भी यह आवश्यक नहीं कि बुंदेलखंड, बघेलखंड, आदिवासी अंचलों या अत्यधिक वर्षा-निर्भर क्षेत्रों में उसी रूप में लागू किया जा सके। इसलिए इस मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने से पहले विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों में इसकी व्यवहारिकता का परीक्षण किया जाना चाहिए। कृषि विज्ञान केंद्रों, भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान तथा केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान जैसे संस्थानों की भागीदारी निश्चित रूप से सकारात्मक कदम है। प्रत्येक ब्लॉक में अग्रणी किसान तैयार करने का विचार भी उपयोगी है। किंतु यह सुनिश्चित करना होगा कि कृषि विस्तार सेवाएं वास्तव में खेत तक पहुंचें। अक्सर देखा गया है कि वैज्ञानिक सलाह और सरकारी योजनाओं की जानकारी सीमित किसानों तक ही पहुंच पाती है।

इस रोडमैप की सफलता के लिए कुछ अतिरिक्त कदम आवश्यक हैं। सबसे पहले किसानों की आय का स्वतंत्र और पारदर्शी मूल्यांकन तंत्र विकसित किया जाना चाहिए। दूसरे, सूक्ष्म सिंचाई और आधुनिक तकनीकों के लिए अनुदान वितरण की प्रक्रिया सरल और समयबद्ध हो। तीसरे, फसल विविधीकरण के साथ न्यूनतम मूल्य सुरक्षा, प्रसंस्करण इकाइयों और बाजार संपर्क की मजबूत व्यवस्था बनाई जाए। चौथे, भूजल संरक्षण और वर्षा जल संचयन को इस योजना का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। पांचवें, छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष सहायता पैकेज तैयार किया जाए, क्योंकि कृषि सुधारों का वास्तविक लाभ इन्हीं तक पहुंचना चाहिए। चार जिलों का यह कृषि रोडमैप एक महत्वपूर्ण और दूरदर्शी पहल है, लेकिन इसकी सफलता केवल घोषणाओं, बैठकों और रोडमैप दस्तावेजों से तय नहीं होगी। सफलता तब मानी जाएगी जब किसान की लागत घटे, उसकी आय बढ़े, जल संसाधन सुरक्षित रहें और खेती आने वाली पीढ़ियों के लिए भी लाभकारी बनी रहे। यदि सरकार इस योजना के क्रियान्वयन में पारदर्शिता, जवाबदेही और किसानों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित कर पाती है, तो यह मॉडल मध्यप्रदेश ही नहीं, पूरे देश की कृषि व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकता है। अन्यथा यह भी उन अनेक महत्वाकांक्षी योजनाओं की सूची में शामिल हो जाएगा, जिनकी चर्चा तो बहुत हुई, लेकिन जिनका प्रभाव खेतों तक सीमित रूप से ही पहुंच पाया।

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