पशुओं के गोबर से बनाई वर्मी कम्पोस्ट, रासायनिक खाद-दवा का खर्च घटा; एक एकड़ में ₹10 हजार तक हो रही बचत
01 अक्टूबर2026, भोपाल: पशुओं के गोबर से बनाई वर्मी कम्पोस्ट, रासायनिक खाद-दवा का खर्च घटा; एक एकड़ में ₹10 हजार तक हो रही बचत – खेती की बढ़ती लागत के बीच खेत और पशुधन से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर किसान अपनी लागत कम कर रहे हैं। मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के विकासखंड मेघनगर के ग्राम हात्यादेली के 42 वर्षीय किसान श्री कुकला ने भी इसी तरीके को अपनाया है। परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) के तहत मिले प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन से उन्होंने पशुओं के गोबर से खुद वर्मी कम्पोस्ट तैयार करना शुरू किया और जैविक कीट एवं रोग नियंत्रण के उपाय अपनाए। इससे रासायनिक उर्वरकों और दवाओं पर होने वाला खर्च कम हुआ है। किसान के अनुसार, एक एकड़ में सालाना करीब ₹10 हजार तक की लागत बच रही है।
1.50 हेक्टेयर जमीन पर करते हैं खेती
श्री कुकला और उनके भाई के पास कुल 1.50 हेक्टेयर सिंचित कृषि भूमि है। पांच सदस्यीय परिवार की आजीविका मुख्य रूप से खेती पर निर्भर है। खरीफ में वे मक्का, कपास और सोयाबीन की खेती करते हैं, जबकि रबी में गेहूं और चना उगाते हैं। कृषि के साथ पशुपालन भी उनकी आजीविका का हिस्सा है। उनके पास 2 बैल, एक गाय, 3 भैंस और 2 पड़ापाड़ी हैं। पशुओं से मिलने वाले गोबर को बेकार जाने देने के बजाय वे इसका इस्तेमाल वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने में कर रहे हैं।
PKVY से सीखा जैविक खेती का तरीका
पहले कुकला फसल उत्पादन के लिए मुख्य रूप से रासायनिक उर्वरकों और अन्य बाहरी कृषि आदानों पर निर्भर थे। कम लागत में खेती के विकल्प तलाशते हुए वे परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत गठित क्लस्टर से जुड़े। योजना के माध्यम से उन्हें जैविक खेती का प्रशिक्षण, कृषक भ्रमण और तकनीकी मार्गदर्शन मिला। प्रशिक्षण में सीखी तकनीकों को उन्होंने अपने खेत में अपनाना शुरू किया। योजना के तहत उन्हें वर्मी कम्पोस्ट इकाई की स्थापना के लिए ₹5 हजार का अनुदान मिला। उन्होंने इकाई का नियमित संचालन करते हुए पशुओं से मिलने वाले गोबर का उपयोग वर्मी कम्पोस्ट बनाने में किया। उनके अनुसार, अब तक इस इकाई से करीब ₹50 हजार मूल्य की वर्मी कम्पोस्ट तैयार की जा चुकी है, जिसका इस्तेमाल वे अपने खेत में कर रहे हैं। इससे बाजार से खाद खरीदने की जरूरत कम हुई है।
जैविक खाद से घटा रासायनिक खाद-दवा का खर्च
श्री कुकला के अनुसार, खुद तैयार की गई जैविक खाद और जैविक कीट नियंत्रण उपायों के इस्तेमाल से रासायनिक उर्वरक और दवाओं पर होने वाला खर्च कम हुआ है। उनके द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, एक एकड़ भूमि पर हर साल करीब ₹10 हजार तक की लागत बच रही है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से कृषि आदानों की पूर्ति होने के कारण बाजार से कृषि सामग्री खरीदने पर निर्भरता भी कम हुई है।
गेहूं में भी अपना रहे जैविक तकनीक
वर्तमान रबी मौसम में श्री कुकला गेहूं की फसल में भी जैविक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। बुवाई से पहले वर्मी कम्पोस्ट में ट्राइकोडर्मा मिलाकर बीज उपचार किया गया। फसल की शुरुआती अवस्था में वर्मी-वॉश का छिड़काव भी किया गया। कृषक के अनुसार, इससे अच्छा अंकुरण और फसल की स्वस्थ वृद्धि देखने को मिली है। फसल में कीट और रोग नियंत्रण के लिए वे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से जैविक घोल और अन्य सामग्री तैयार कर जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करते हैं। साथ ही फसल की नियमित निगरानी कर समय पर जैविक कीट एवं रोग प्रबंधन के उपाय किए जाते हैं।
खेती और पशुपालन को बनाया एक-दूसरे का पूरक
श्री कुकला ने खेती और पशुपालन से मिलने वाले संसाधनों को आपस में जोड़ दिया है। पशुओं से मिलने वाले गोबर से वर्मी कम्पोस्ट तैयार होती है और इसी खाद का उपयोग खेत में किया जाता है। इस तरह पशुधन से मिलने वाले संसाधन दोबारा कृषि उत्पादन में इस्तेमाल हो रहे हैं और बाहरी कृषि आदानों पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जा रहा है। श्री कुकला बताते हैं कि जैविक खेती के शुरुआती वर्ष में उत्पादन में कुछ कमी महसूस हुई। हालांकि, बाजार से रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक नहीं खरीदने के कारण खेती की लागत भी कम हुई। लगातार जैविक तकनीकों के इस्तेमाल और फसल की नियमित निगरानी से उनका जैविक खेती के प्रति भरोसा बढ़ा है।
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