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राज्य कृषि समाचार (State News)

मप्र विधानसभा में ‘समान नागरिक संहिता विधेयक-2026 पारित’

“राम से लेकर रहीम तक… अब पूरा मध्य प्रदेश एक ही संविधान और एक ही कानून से चलेगा” : मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव

जनजातीय समाज को कानून के दायरे से रखा गया पूरी तरह बाहर

21 जुलाई 2026, भोपाल: मप्र विधानसभा में ‘समान नागरिक संहिता विधेयक-2026 पारित’ – आज मप्र विधानसभा में ‘समान नागरिक संहिता विधेयक-2026 पारित हो गया । मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सदन में कहा, “भारतीय संस्कृति में समानता का भाव हमेशा से सर्वोपरि रहा है। अब प्रदेश में रहने वाले राम से लेकर रहीम तक, सभी नागरिक एक समान न्याय और समान अवसर के दायरे में आएंगे। कानून किसी के धार्मिक रीति-रिवाजों में दखल नहीं देगा, बल्कि महिलाओं और बेटियों को समाज में सुरक्षा और बराबरी का हक दिलाएगा।”मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने आंकड़े पेश करते हुए कहा कि ड्राफ्टिंग कमेटी को मिले सुझावों में 76% से अधिक मुस्लिम बहनों ने व्यक्तिगत रूप से इस कानून का पुरजोर समर्थन किया है, क्योंकि वे वर्षों से कुप्रथाओं की मार झेल रही थीं।

 विधेयक के 5 बड़े और कड़े कानून : जो अब पूरे मध्यप्रदेश में बदल जाएंगे

 1. एक शादी का नियम (बहुविवाह पर रोक): प्रदेश में अब कोई भी व्यक्ति पहली पत्नी या पति के जीवित रहते दूसरा विवाह नहीं कर सकेग।

2. तलाक और हलाला पर प्रतिबंध : तीन तलाक और निकाह हलाला को पूर्णतः गैर-कानूनी और दंडनीय बनाया गया है। तलाक केवल कोर्ट के जरिए कानूनी प्रक्रिया से ही मान्य होगा।

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 3. लिव-इन का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन: लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को 1 महीने के भीतर संबंधित रजिस्ट्रार के पास अनिवार्य रूप से पंजीकरण करवाना होगा। नियम तोड़ने पर 3 महीने की जेल या 10,000 रुपये का जुर्माना भुगतना होगा।

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 4. बेटियों को संपत्ति में बराबर हक : पैतृक और अर्जित संपत्ति में बेटों और बेटियों (चाहे वे शादीशुदा हों या नहीं) को समान रूप से उत्तराधिकार का अधिकार मिलेगा।

 5. सरोगेसी और लिव-इन से जन्मे बच्चों को वैधता : ऐसे संबंधों से पैदा होने वाले बच्चों को पूर्ण कानूनी वारिस माना जाएगा, उन्हें समाज में ‘नाजायज’ नहीं कहा जा सकेगा।* *जनजातीय समुदाय की संस्कृति से कोई छेड़छाड़ नहीं : इस कानून का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मध्यप्रदेश की विशाल जनजातीय आबादी को इससे बाहर रखना है। संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत आने वाले भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया जैसे आदिवासी समाजों पर यह कानून लागू नहीं होगा।

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