कानपुर की बरशा अग्रवाल ने परमाकल्चर से बदली बंजर ज़मीन की तस्वीर
06 नवंबर 2026, कानपुर: कानपुर की बरशा अग्रवाल ने परमाकल्चर से बदली बंजर ज़मीन की तस्वीर – साल 2020 में बरशा अग्रवाल ने कानपुर में अपने परिवार की उस ज़मीन पर कदम रखा, जो सालों से रासायनिक खेती की वजह से थकी हुई थी। आज वही ज़मीन बिना किसी रासायनिक खाद या कीटनाशक के कई तरह की फसलें और उत्पाद दे रही है, और करीब 50 परिवारों तक उनकी उपज सीधे पहुंचती है।
बरशा के बेटे पढ़ाई के लिए विदेश जा चुके थे, जिससे उनके पास समय था और उन्होंने पौधों में अपनी बचपन की दिलचस्पी को फिर से जगाया। उन्होंने अपने ससुर से बंजर पड़ी ज़मीन पर खेती करने की इजाज़त मांगी, जो उन्हें मिल गई। शुरुआत में उनका मकसद सिर्फ परिवार के लिए शुद्ध भोजन उगाना था।
कोविड के दौरान सीखा परमाकल्चर, मिट्टी सुधारने में लगे साल
कोविड-19 के दौरान बरशा ने एक बागवानी कोर्स किया, उसके बाद आर्ट ऑफ लिविंग के “परमाकल्चर एंड बियॉन्ड” कार्यक्रम में दाखिला लिया। चार-पांच हफ्तों की ऑनलाइन पढ़ाई के बाद उन्होंने बेंगलुरु में आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर में रहकर प्रशिक्षण लिया।
शुरुआत में उन्होंने जैविक कीटनाशक, जीव-अमृत, वर्मीकम्पोस्ट और गोबर खाद खरीदे। बाद में परमाकल्चर ने उन्हें जो संसाधन खेत में ही उपलब्ध हैं उन्हीं का इस्तेमाल करना और खर्च घटाना सिखाया, जिसे वह खुद “जुगाड़ की खेती” कहती हैं।
गाय का गोबर खाद बन गया, जबकि गोमूत्र और खेत के अन्य संसाधनों से प्राकृतिक कीट-नियंत्रण के घोल तैयार होने लगे। रसायनों से थकी मिट्टी को दोबारा उपजाऊ बनाने में उन्हें तीन से चार साल लगातार मेहनत और खरपतवार प्रबंधन में लगाने पड़े।
हल्दी से शहद तक, एक-एक उत्पाद से बढ़ी पहचान
शुरुआत में कच्ची जैविक हल्दी को अच्छे भाव पर बेचना मुश्किल हुआ, तो बरशा ने परमाकल्चर समुदाय से हल्दी प्रोसेसिंग सीखी। अपने ही ब्रांड के नाम से पैक की गई हल्दी से उसकी शेल्फ लाइफ बढ़ी, बर्बादी घटी और उसका बेहतर दाम मिलने लगा।
धीरे-धीरे उन्होंने अदरक, मसूर, सरसों, चना, अलसी, तिल, ज्वार और बाजरा जैसी फसलों में भी हाथ आज़माया। खेत में लगी पत्थर की चक्की से बाजरे का आटा तैयार होता है, जबकि मधुमक्खी पालन से शहद मिलता है।
साल 2022 से बरशा खुद ही पांच किलो की सब्ज़ी हैम्पर तैयार कर घर-घर पहुंचाने लगीं, जिसके लिए पति की फैक्ट्री के बचे हुए कपड़े से बने जूट और कॉटन के थैलों का इस्तेमाल होता है। आज करीब 50 परिवारों को हफ्ते में दो बार उनकी उपज मिलती है, और आसपास के गांवों की चार महिलाओं को उन्होंने इस काम में प्रशिक्षित भी किया है।
बरशा कहती हैं, “मुझे कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन एक बात साफ थी कि मैं रसायनों का इस्तेमाल नहीं करना चाहती थी।” इस सफर में आर्ट ऑफ लिविंग के परमाकल्चर कार्यक्रम के प्रमुख प्रशिक्षक बिनय कुमार सिंह और उनके समुदाय से मिले सहयोग ने भी बरशा को आगे बढ़ने में मदद की।
बरशा की कहानी देश में बढ़ते प्राकृतिक खेती और परमाकल्चर के चलन का एक उदाहरण है, जहां किसान धीरे-धीरे रासायनिक खेती से हटकर मिट्टी और सेहत दोनों को प्राथमिकता देने लगे हैं। उनके मुताबिक हर बदलाव धीरे-धीरे और एक-एक उत्पाद से आगे बढ़ा है, न कि एक दिन में।
उनकी खेती का तरीका बताता है कि कम लागत वाले स्थानीय संसाधनों से भी मिट्टी की सेहत सुधारी जा सकती है, बिना बाज़ार से महंगी रासायनिक खाद और कीटनाशक खरीदे। गोबर, गोमूत्र और खेत के ही बचे हुए पौधों जैसे संसाधनों का दोबारा इस्तेमाल करना परमाकल्चर के इस मॉडल की सबसे बड़ी खूबी मानी जाती है।
बरशा का कहना है कि शुरुआती सालों में धैर्य सबसे ज़रूरी था, क्योंकि रसायन-मुक्त मिट्टी को नतीजे देने में वक्त लगता है। उनकी सलाह है कि नए किसान एक साथ पूरी ज़मीन पर बदलाव करने के बजाय छोटे टुकड़े से शुरुआत करें और धीरे-धीरे प्रयोग बढ़ाएं।
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