बेंगलुरु के किसान कारिगौड़ा की लौकी पहुंचती है कतर तक
06 नवंबर 2026, बेंगलुरु: बेंगलुरु के किसान कारिगौड़ा की लौकी पहुंचती है कतर तक – बेंगलुरु के किसान कारिगौड़ा अपनी 3.5 एकड़ ज़मीन पर “बेबी बॉटल गार्ड” यानी छोटी लौकी उगाकर रोज़ाना करीब 50 हज़ार रुपये की बिक्री कर रहे हैं। उनकी उपज व्यापारियों के ज़रिए खाड़ी देश कतर के बाज़ारों तक पहुंचती है।
कारिगौड़ा ने एक इंटरव्यू में बताया कि उन्होंने परंपरागत खेती छोड़कर अपनी ज़मीन पर “स्वीकार 045 एफ1” किस्म की छोटी लौकी उगाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने ड्रिप इरिगेशन, मल्चिंग और आधुनिक कृषि उपकरणों को अपनाया।
जून-जुलाई में बुवाई, 70 दिन में तैयार फसल
बेबी बॉटल गार्ड की बुवाई जून-जुलाई में होती है और करीब 70 दिनों बाद यानी सितंबर से दिसंबर के बीच फसल की कटाई शुरू हो जाती है। कटाई का पूरा सीज़न लगभग 90 दिनों तक चलता है।
इस दौरान उनके खेत से रोज़ाना करीब 1,000 किलोग्राम लौकी निकलती है। बड़े व्यापारी खेत से ही 50 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर उपज खरीद लेते हैं, जिसके बाद इसे निर्यात के लिए आगे भेजा जाता है।
खाड़ी देशों में छोटे आकार की ताज़ा सब्ज़ियों, खासकर बेबी बॉटल गार्ड जैसी किस्मों की मांग बढ़ती जा रही है, जिससे कर्नाटक के कई किसान निर्यात-उन्मुख खेती की तरफ रुख कर रहे हैं। बेंगलुरु जैसे शहरों से सड़क और हवाई मार्ग से माल खाड़ी बाज़ारों तक पहुंचना आसान होने से भी यह कारोबार बढ़ा है।
रोज़ाना 50 हज़ार, सीज़न में 45 लाख तक बिक्री
एक हज़ार किलो लौकी का हिसाब 50 रुपये प्रति किलो के भाव से लगभग 50 हज़ार रुपये रोज़ाना बैठता है। इस तरह महीने भर में यह आंकड़ा करीब 15 लाख रुपये और पूरे 90 दिन के कटाई सीज़न में लगभग 45 लाख रुपये तक पहुंच जाता है।
यह आंकड़े उपज की कुल बिक्री राशि के हैं; खेती की लागत या शुद्ध मुनाफे का कोई अलग ब्योरा सामने नहीं आया है। कारिगौड़ा के मुताबिक यह पूरी कमाई सिर्फ लौकी की खेती से ही हो रही है, किसी और कारोबार से नहीं।
कारिगौड़ा का कहना है कि ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग अपनाने से पानी की बचत के साथ-साथ खरपतवार प्रबंधन और मिट्टी में नमी बनाए रखने में भी मदद मिली है, जिससे सीमित ज़मीन से भी बेहतर पैदावार मिल पा रही है। लौकी खरीदने वाले व्यापारी खेत से उपज उठाने के बाद कतर भेजने के लिए निर्यात और लॉजिस्टिक्स की प्रक्रिया खुद संभालते हैं।
बेबी बॉटल गार्ड जैसी छोटे आकार की सब्ज़ियां पैकेजिंग और ढुलाई में आसान होती हैं, जिससे निर्यातकों के लिए इन्हें विदेश भेजना सामान्य आकार की सब्ज़ियों के मुकाबले ज़्यादा सुविधाजनक रहता है। यही वजह है कि बेंगलुरु और आसपास के इलाकों के कई किसान अब परंपरागत सब्ज़ियों के साथ-साथ इस तरह की निर्यात-योग्य किस्मों की खेती की तरफ भी रुख कर रहे हैं।
कारिगौड़ा के मुताबिक एक बार तकनीक और बाज़ार की समझ बन जाने के बाद छोटी ज़मीन पर भी लगातार कमाई मुमकिन हो जाती है, बशर्ते सिंचाई और कीट प्रबंधन पर नियमित ध्यान दिया जाए।
बेबी बॉटल गार्ड की खेती में सामान्य लौकी के मुकाबले फल जल्दी तोड़ना पड़ता है, जिससे प्रति पौधा तुड़ाई की संख्या ज़्यादा रहती है और लगातार निगरानी ज़रूरी हो जाती है। कारिगौड़ा हर दिन खेत का दौरा करके पकी फसल चुनते हैं, ताकि व्यापारियों को तय मात्रा और गुणवत्ता की उपज समय पर मिल सके।
उनका मानना है कि निर्यात बाज़ार में टिके रहने के लिए उपज के आकार और गुणवत्ता में एकरूपता बनाए रखना सबसे ज़रूरी शर्त है, इसलिए वे बुवाई से कटाई तक हर चरण पर बराबर ध्यान देते हैं।
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