फसल की खेती (Crop Cultivation)राज्य कृषि समाचार (State News)

धमतरी में धान की फसल पर तना छेदक, भूरा फुदका और ब्लास्ट का खतरा, कृषि विभाग ने बताई दवा और मात्रा

14 सितंबर 2026, धमतरी (छत्तीसगढ़): धमतरी में धान की फसल पर तना छेदक, भूरा फुदका और ब्लास्ट का खतरा, कृषि विभाग ने बताई दवा और मात्रा – जिले में धान की फसल इस समय बालियां बनने और दाना भरने की महत्वपूर्ण अवस्था में है, और ठीक इसी दौर में कई तरह के कीट और रोग खेतों में सक्रिय होने लगे हैं। कृषि विभाग, धमतरी ने 11 सितंबर को जारी अपनी सामयिक सलाह में किसानों को समय रहते निगरानी और छिड़काव करने की अपील की है, ताकि उपज पर पड़ने वाला असर कम से कम किया जा सके।

विभाग के मुताबिक इस समय धान में मुख्य रूप से तना छेदक, भूरा फुदका (ब्राउन प्लांट हॉपर), पत्ता लपेटक, पेनिकल माइट के साथ-साथ ब्लास्ट रोग और जीवाणु पत्ता झुलसा रोग का प्रकोप देखा जा रहा है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे अपने खेतों का नियमित निरीक्षण करें और लक्षण दिखते ही तुरंत अनुशंसित उपाय अपनाएं।

किस कीट-रोग के लक्षण क्या हैं

तना छेदक कीट के हमले से पौधों की बीच की कोंपल सूखकर “डेड हार्ट” यानी मृत हृदय की स्थिति बन जाती है, जिससे बाली ही नहीं बन पाती। भूरा फुदका पौधों के तने से रस चूसता है, जिससे पौधे अचानक सूखने लगते हैं और खेत में गोल घेरे के आकार में फसल गिरने लगती है।

पत्ता लपेटक कीट पत्तियों को लपेटकर अंदर से खाता है, जिससे पत्तियां सफेद धारीदार दिखने लगती हैं। पेनिकल माइट का असर सीधे बालियों पर पड़ता है और दाने काले पड़कर खराब हो जाते हैं। वहीं ब्लास्ट रोग में पत्तियों और गर्दन (नेक) पर धब्बे बनकर बाली सूख जाती है, जबकि जीवाणु पत्ता झुलसा रोग में पत्तियां किनारों से पीली पड़कर सूखने लगती हैं।

किस दवा की कितनी मात्रा, प्रति एकड़ छिड़काव का तरीका

कृषि विभाग, धमतरी ने कीट व रोग के हिसाब से अलग-अलग दवा और मात्रा बताई है। तना छेदक व भूरा फुदका के लिए कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 प्रतिशत दानेदार दवा 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से खेत में डालने की सलाह दी गई है। इसके अलावा क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.4 प्रतिशत एससी दवा का 60 मिलीलीटर प्रति एकड़ छिड़काव भी कारगर बताया गया है।

भूरा फुदका के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल दवा 50 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा में इस्तेमाल करने को कहा गया है। वहीं ब्लास्ट रोग से बचाव के लिए ट्राइसाइक्लाजोल 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी दवा 120 ग्राम प्रति एकड़ की दर से घोलकर छिड़कने की सलाह दी गई है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि छिड़काव सुबह या शाम के ठंडे समय में ही करें, ताकि दवा का असर बेहतर हो।

सितंबर के महीने में मानसून की वापसी के दौरान बनी नमी और उमस भरी परिस्थितियां भूरा फुदका, ब्लास्ट और जीवाणु झुलसा जैसे रोगों के फैलने के लिए अनुकूल मानी जाती हैं। खासकर घनी बोआई वाले और लगातार खड़े पानी वाले खेतों में भूरा फुदका का प्रकोप तेजी से बढ़ने का खतरा रहता है। कृषि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन उर्वरक के इस्तेमाल से भी पौधे कमजोर होकर कीट-रोग के प्रति संवेदनशील बन जाते हैं, इसलिए संतुलित उर्वरक प्रबंधन पर भी ध्यान देना जरूरी है।

विभाग ने यह भी सुझाव दिया है कि छिड़काव से पहले खेत का पानी हल्का निकाल लें और बारिश की संभावना होने पर छिड़काव को टाल दें, ताकि दवा बहकर बेकार न हो। इसके साथ ही छिड़काव करते समय दस्ताने, मास्क और पूरी बांह के कपड़े पहनने की सामान्य सावधानी बरतने की सलाह भी दी गई है।

धान खरीफ सीजन की सबसे बड़ी फसलों में शामिल है, और बाली बनने की अवस्था में लगने वाला कोई भी कीट या रोग सीधे उपज और किसान की आमदनी पर असर डालता है। सही समय पर सही दवा और सही मात्रा में छिड़काव करने से जहां किसानों का नुकसान बचता है, वहीं कीटनाशक एवं फफूंदनाशक कारोबार से जुड़े दुकानदारों और वितरकों के लिए भी यह जानकारी अहम है ताकि वे किसानों को सही उत्पाद और सही सलाह के साथ बेच सकें। धमतरी के अलावा अन्य धान उत्पादक जिलों के किसानों को भी अपने क्षेत्र में इसी तरह के लक्षण दिखने पर स्थानीय कृषि विस्तार अधिकारी से सलाह जरूर लेनी चाहिए।

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