राज्य कृषि समाचार (State News)

एमबीए छोड़ खेती अपनाई, महासमुंद के मोहन चंद्राकर बने परंपरागत व जैविक धान के ब्रांड एंबेसडर

14 सितंबर 2026, महासमुंद (छत्तीसगढ़): एमबीए छोड़ खेती अपनाई, महासमुंद के मोहन चंद्राकर बने परंपरागत व जैविक धान के ब्रांड एंबेसडर –  एमबीए की डिग्री लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों में करीब 16 साल नौकरी करने के बाद खेती की ओर लौटने का फैसला आमतौर पर आसान नहीं होता, लेकिन महासमुंद जिले के केशवा गांव के मोहन चंद्राकर ने यही राह चुनी और आज वे प्रदेश के प्रगतिशील किसानों में गिने जाते हैं। उन्हें इस साल अप्रैल में “राइस आइकॉन ऑफ इंडिया” सम्मान से नवाजा गया, वहीं 4 जून को मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने उन्हें नवाचार एवं प्रगतिशील किसान सम्मान से सम्मानित किया।

मोहन चंद्राकर ने 1997 से 2013 तक विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम किया। साल 2013 में उन्होंने खेती को व्यवसाय के तौर पर विकसित करने का संकल्प लेकर गांव लौटने का फैसला किया। तभी से वे जैविक एवं प्राकृतिक पद्धति से खेती कर रहे हैं।

विलुप्त हो रही देसी धान किस्मों को दी नई पहचान

चंद्राकर के खेतों में जावफूल, विष्णुभोग, जोहा, चखव, संजीवनी और पीहू पर्पल राइस जैसी परंपरागत व औषधीय गुणों वाली धान किस्मों के साथ-साथ काला गेहूं भी उगाया जाता है। ये किस्में बाजार में सामान्य धान के मुकाबले कहीं ज्यादा दाम दिलाती हैं, क्योंकि इनकी मांग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं में लगातार बढ़ रही है।

सिर्फ खेती तक सीमित न रहते हुए उन्होंने 2017 में तथास्तु फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (ऊर्जा कृषि एफपीओ) की स्थापना की। इस एफपीओ से आज करीब 300 किसान जुड़े हुए हैं। चंद्राकर अपनी राइस मिल में उपज का प्रसंस्करण कर “तथास्तु – अच्छे लोग, अच्छा भोजन” ब्रांड के तहत बाजार में उतारते हैं, जिससे किसानों को बिचौलियों की जगह सीधे बेहतर दाम मिल पाता है।

फसल के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण पर भी जोर

चंद्राकर ने अपनी 6 एकड़ बंजर जमीन पर पहले 400 ऑस्ट्रेलियन सागौन के पौधे लगाए थे, जो अब 20 से 30 फीट ऊंचे पेड़ बन चुके हैं। साल 2024 से वे इसी जमीन पर सफेद चंदन के साथ आम, महुआ, जामुन, चीकू और अमरूद के पौधे भी लगा रहे हैं। इससे साफ है कि वे सिर्फ अल्पकालिक फसल आय पर निर्भर न रहकर दीर्घकालिक वृक्षारोपण को भी अपनी आय योजना का हिस्सा बना रहे हैं।

वे अपने इलाके के अन्य किसानों को आधुनिक तकनीक अपनाने, फसल विविधीकरण करने, उपज के प्रसंस्करण और ब्रांडिंग करने तथा सीधे बाजार से जुड़ने के तरीके भी सिखाते हैं, जिससे इलाके के कई और किसान परिवार बिचौलियों पर निर्भरता कम कर पा रहे हैं।

केंद्र सरकार बीते कुछ वर्षों से देश भर में किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को बढ़ावा देने पर खास जोर दे रही है, ताकि छोटे किसान मिलकर सामूहिक खरीद, प्रसंस्करण और बिक्री का लाभ उठा सकें। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश भर में अब तक करीब 10,000 किसान उत्पादक संगठन पंजीकृत हो चुके हैं। मोहन चंद्राकर का तथास्तु एफपीओ इसी राष्ट्रीय अभियान का एक जमीनी उदाहरण है, जहां संगठित होकर किसान अपनी परंपरागत फसलों को बेहतर बाजार मूल्य दिला पा रहे हैं।

चंद्राकर जिन देसी धान किस्मों की खेती करते हैं, उनमें से कई किस्में सुगंध, पोषण और औषधीय गुणों के लिए स्थानीय स्तर पर पारंपरिक रूप से पहचानी जाती रही हैं, लेकिन आधुनिक खेती के दौर में इनका रकबा लगातार घटता गया था। जैविक खेती और सीधी ब्रांडिंग के जरिए इन किस्मों को नया बाजार मिलने से न सिर्फ किसान की आय बढ़ी है, बल्कि क्षेत्र की जैव-विविधता को बचाने में भी मदद मिल रही है।

मोहन चंद्राकर की कहानी बताती है कि परंपरागत और औषधीय गुणों वाली देसी फसलों को सही ब्रांडिंग और एफपीओ जैसे सामूहिक ढांचे के साथ जोड़कर किसान अच्छी कमाई कर सकते हैं। बीज कंपनियों, प्रसंस्करण इकाइयों और एफपीओ को बढ़ावा देने वाली एजेंसियों के लिए भी यह मॉडल इस बात का उदाहरण है कि छोटे किसानों को संगठित कर बाजार से सीधा जोड़ने पर कैसे बेहतर नतीजे मिल सकते हैं।

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