मक्के में फॉल आर्मीवर्म का खतरा, हिमाचल में कृषि वैज्ञानिकों ने बताई दवा और सही मात्रा
07 नवंबर 2026, सोलन (हिमाचल प्रदेश): मक्के में फॉल आर्मीवर्म का खतरा, हिमाचल में कृषि वैज्ञानिकों ने बताई दवा और सही मात्रा – हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में मक्के की फसल पर फॉल आर्मीवर्म कीट, यानी स्पोडोप्टेरा फ्रुजिपर्डा, का प्रकोप किसानों के लिए लगातार चिंता का विषय बना रहता है। डॉ यशवंत सिंह परमार उद्यान एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन की ओर से जारी कृषि मौसम सलाह बुलेटिन में इस कीट से बचाव के उपाय बताए गए हैं।
फॉल आर्मीवर्म मूल रूप से अमेरिकी महाद्वीप का कीट है, जो भारत में पहली बार 2018 में कर्नाटक में मक्के की फसल पर देखा गया था। इसके बाद से यह देश के ज्यादातर मक्का उत्पादक क्षेत्रों में फैल गया है। यह कीट मक्के के पौधे के भंवर यानी व्होर्ल में छिपकर पत्तियों में खिड़कीनुमा छेद बनाकर नुकसान पहुंचाता है, जिससे इसे पहचानना आसान हो जाता है।
सोलन, शिमला, बिलासपुर और सिरमौर में सतर्कता की सलाह
विश्वविद्यालय की सलाह सोलन सहित शिमला, बिलासपुर और सिरमौर जिलों के मक्का उत्पादक किसानों के लिए है। बुलेटिन में कहा गया है कि यह कीट मक्के की फसल को बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए खेत में निगरानी बहुत जरूरी है।
किसानों को प्रति एकड़ चार फेरोमोन ट्रैप लगाने की सलाह दी गई है, जिससे कीट की मौजूदगी और संख्या का समय पर पता चल सके।
दवा का नाम और सही मात्रा
जिन खेतों में कीट का प्रकोप 10 प्रतिशत से ज्यादा पाया जाए, वहां क्लोरएंट्रानिलिप्रोल 18.5 एससी का छिड़काव 0.4 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से करने की सलाह दी गई है। यह छिड़काव साफ और शुष्क मौसम में ही करना चाहिए, ताकि दवा असर कर सके और बारिश में बह न जाए।
जो किसान जैविक तरीका अपनाना चाहते हैं, उनके लिए बुलेटिन में नीम की गिरी के अर्क का विकल्प भी दिया गया है, जिसे 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़का जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ प्रकोप दिखने पर दवा छिड़कने से बेहतर है कि फेरोमोन ट्रैप के जरिए लगातार निगरानी रखी जाए, जिससे कीट की संख्या बढ़ने से पहले ही रोकथाम हो सके। समय पर और सही मात्रा में दवा का इस्तेमाल न केवल फसल को बचाता है, बल्कि अनावश्यक छिड़काव की लागत को भी कम करता है।
फॉल आर्मीवर्म की सुंडी जब छोटी अवस्था में होती है, तब वह पत्तियों की ऊपरी सतह को खुरचकर खाती है, जिससे पत्तियों पर छोटे-छोटे सफेद धब्बे दिखते हैं। बड़ी होने पर यही सुंडी भंवर के भीतर घुसकर पत्तियों में बड़े छेद बना देती है और मक्के के भुट्टे तक को नुकसान पहुंचा सकती है।
इस कीट की पतंगा अवस्था रातों-रात लंबी दूरी तय कर सकती है, इसलिए एक खेत में नियंत्रण कर लेने के बाद भी पड़ोस के खेतों से दोबारा प्रकोप होने का खतरा बना रहता है। इसीलिए विशेषज्ञ पूरे गांव या इलाके के किसानों को मिलकर निगरानी और छिड़काव करने की सलाह देते हैं, ताकि कीट को फिर से पनपने का मौका न मिले।
इसके अलावा फसल चक्र अपनाने और खेत की मेड़ों पर नेपियर घास जैसी ट्रैप फसल लगाने की सलाह भी आमतौर पर दी जाती है, क्योंकि फॉल आर्मीवर्म का पतंगा मक्के से पहले ऐसी ट्रैप फसलों की ओर आकर्षित होता है। इससे मुख्य फसल को नुकसान पहुंचने से पहले ही कीट की पहचान और रोकथाम आसान हो जाती है।
हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में मक्का कई छोटे किसानों की मुख्य फसल है और पशुओं के चारे के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है। इसलिए फॉल आर्मीवर्म जैसे कीट से बचाव सिर्फ अनाज उत्पादन के लिए नहीं, बल्कि पशुपालन पर निर्भर परिवारों की आजीविका के लिए भी जरूरी माना जाता है।
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