फसल अवशेष प्रबंधन एवं कम्पोस्टिंग तकनीक
मध्य प्रदेश के फसल चक्र, वैज्ञानिक विधियां, नमी-तापमान प्रबंधन एवं आर्थिक विश्लेषण
लेखक: अनिल कुमार सिंह, दिनेश कुमार सिंह, ऋचा सिंह, निहारिका शुक्ला एवं रश्मि शुक्ला, कृषि विज्ञान केन्द्र, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर, मध्य प्रदेश
07 नवंबर 2026, भोपाल: फसल अवशेष प्रबंधन एवं कम्पोस्टिंग तकनीक –
कार्यकारी सारांश एवं मध्य प्रदेश में फसल अवशेष की स्थिति
भारत में प्रतिवर्ष लगभग 683 मिलियन टन फसल अवशेष का उत्पादन होता है। मध्य प्रदेश में सोयाबीन, गेहूं, धान, कपास और गन्ना आधारित फसल चक्रों से प्रतिवर्ष लगभग 45 मिलियन टन अवशेष उत्पन्न होते हैं। इन अवशेषों को खेतों में जलाने (नरवाई दाह) से न केवल गंभीर वायु प्रदूषण (पीएम 2.5, पीएम 10) उत्पन्न होता है, बल्कि मृदा के प्राथमिक पोषक तत्वों (1.4% नाइट्रोजन, 0.6% फास्फोरस, 1.2% पोटेशियम) और सूक्ष्म जैविक पारिस्थितिकी का भारी नुकसान होता है।
कम्पोस्टिंग और वर्मीकम्पोस्टिंग इन अवशेषों को उच्च गुणवत्ता वाले जैविक उर्वरक (मूल्य ₹2,500 – ₹4,500 प्रति टन) में परिवर्तित करने की सबसे वैज्ञानिक और टिकाऊ विधि है। इससे मृदा के जैविक कार्बन (वर्टिसॉल आर्गेनिक कार्बन) में निरंतर सुधार होता है।
मुख्य अनुसंधान निष्कर्ष
मध्य प्रदेश की काली मृदा (वर्टिसोल्स) में आईसीएआर- भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान भोपाल के 20 वर्षों के दीर्घकालिक प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि फसल अवशेषों के कम्पोस्ट रूप में निरंतर प्रयोग से मृदा जैविक कार्बन (एसओसी) 0.42% से बढ़कर 0.74% हो जाता है और मृदा सूक्ष्मजैविक बायोमास कार्बन में 140% की वृद्धि होती है।
2. मध्य प्रदेश की प्रमुख फसलों के अवशेषों का रासायनिक एवं बायोकैमिकल प्रोफाइल
फसल अवशेषों के विघटन की गति मुख्यतः उनके कार्बन:नाइट्रोजन (सी:एन) अनुपात, लिग्निन और सेल्यूलोज की मात्रा पर निर्भर करती है:
| फसल अवशेष | कार्बन:नाइट्रोजन (सी:एन) अनुपात | लिग्निन (%) | सेल्यूलोज (%) | विघटन गति |
| सोयाबीन भूसा / डंठल | 25:1 – 30:1 | 8.2% | 34.5% | शीघ्र(30–45 दिन) |
| गेहूं का पाला / भूसा | 80:1- 100:1 | 14.5% | 42.0% | मध्यम(60–75 दिन) |
| धान का पुआल | 60:1 -70:1 | 12.0% | 38.2% | मध्यम(50–65 दिन) |
| कपास के डंठल | 110:1-140:1 | 21.5% | 46.8% | धीमी(90–120 दिन) |
| गन्ने की पत्तियां (ट्रैश) | 90:1- 110:1 | 18.4% | 44.1% | धीमी (90–110 दिन) |
3. मध्य प्रदेश के 5 प्रमुख फसल चक्र एवं अवशेष प्रबंधन की विशेष विधियां
3.1 धान–गेहूं फसल चक्र (कैमूर पठार एवं विंध्य क्षेत्र – जबलपुर, रीवा, सतना)
- अवशेष भार: कंबाइन कटाई (कंबाइन हार्वेस्टर) के बाद 8.5–11.0 टन/हेक्टेयर धान का पुआल खेत में बचता है।
- इन–सिटू विधि: इन-सिटू प्रबंधन हेतु पूसा बायो-डीकम्पोजर तैयार घोल अथवा जेएनकेवीवी बायोडाइजेस्टर (5 लीटर/हेक्टेयर) का छिड़काव करके सुपर सीडर से बुवाई की जाती है।
- एक्स–सिटू विधि: एक्स-सिटू विधि में पुआल को एकत्र कर गोबर के घोल एवं बायो-इनोक्युलेंट से उपचारित करके विन्ड्रो ढेर बनाए जाते हैं।
3.2 मक्का आधारित फसल चक्र (सतपुड़ा पठार एवं आदिवासी अंचल – छिंदवाड़ा, बैतूल, झाबुआ)
- विशेषता: मक्का का डंठल कड़ा और रेशेदार होता है (उत्पादन 6-8 टन/हेक्टेयर, सी:एन अनुपात 55:1)।
- कुट्टी प्रक्रिया: पावर चाफ कटर से डंठलों को <5 सेमी आकार में काटा जाता है ताकि सूक्ष्मजीव आसानी से हमला कर सकें।
- कम्पोस्टिंग विधि: कुट्टी किए गए मक्के के डंठल को मुर्गी की खाद के साथ मिलाकर नाडेप टैंक में भरा जाता है।
3.3 सोयाबीन–गेहूं फसल चक्र (मालवा पठार एवं नर्मदा घाटी – इंदौर, उज्जैन, हरदा, होशंगाबाद)
- सहक्रियात्मक मिश्रण: नाइट्रोजन-समृद्ध सोयाबीन भूसे (सी:एन 28:1) और कार्बन-समृद्ध गेहूं अवशेष (सी:एन 85:1) का मिश्रण अत्यंत आदर्श है।
- आदर्श अनुपात: 60% गेहूं भूसा + 40% सोयाबीन अवशेष मिलाने से प्रारंभिक सी:एन अनुपात 35:1 प्राप्त होता है, जिससे बिना अतिरिक्त यूरिया के 40–50 दिनों में कम्पोस्ट तैयार होती है।
3.4 कपास आधारित फसल चक्र (निमाड़ अंचल – खरगोन, खंडवा, धार)
- चुनौती: कपास के डंठल में लिग्निन की मात्रा >21% होती है, जो सामान्य परिस्थितियों में नहीं सड़ती।
- प्रसंस्करण विधि: आईसीएआर-केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान भोपाल द्वारा विकसित ट्रैक्टर-चलित श्रेडर से डंठलों को छोटे टुकड़ों में काटकर फफूंद इनोक्युलेंट (फेनेरोचैत क्रिसोस्पोरियम) से उपचारित किया जाता है। 30 दिन के पूर्व-पाचन के बाद इसे वर्मीकम्पोस्ट बेड में डाला जाता है।
3.5 गन्ना आधारित फसल चक्र (नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा एवं बैतूल शुगर बेल्ट)
- अवशेष मात्रा: गन्ने की कटाई के बाद 10–12 टन/हेक्टेयर सूखी पत्तियां (ट्रैश) बचती हैं।
- प्रबंधन विधि: कतारों के बीच पत्तियों की मल्चिंग करके ट्राईकोडेरमा विरिडी 5 किग्रा/हेक्टेयर तथा 10 किग्रा यूरिया प्रति टन अवशेष पर छिड़काव किया जाता है। पिट विधि में 80-90 दिनों में जैविक खाद बनती है।
4. मध्य प्रदेश फसल चक्र बायो–कनवर्जन तुलनात्मक मैट्रिक्स
| फसल चक्र | प्रमुख अवशेष | सी:एन अनुपात | अनुशंसित कम्पोस्टिंग विधि | तैयार होने की अवधि |
| धान–गेहूं | धान पुआल | 70:1 | विन्ड्रो विधि + बायो-डीकम्पोजर | 45–55 दिन |
| मक्का आधारित | मक्का डंठल(स्टोवर) | 55:1 | नाडेप ईंट टैंक विधि | 90–110 दिन |
| सोयाबीन–गेहूं | सोयाबीन + गेहूं मिश्रण | 35:1 | टर्न्ड विन्ड्रो / गड्डा विधि | 40–50 दिन |
| कपास आधारित | कपास डंठल चिप्स | 120:1 | फंगल उपचार + वर्मीकम्पोस्टिंग | 90–100 दिन |
| गन्ना आधारित | गन्ने की पत्तियां (ट्रैश) | 100:1 | इंदौर पिट + ट्राईकोडेरमा | 80–90 दिन |
5. कम्पोस्टिंग के बायोलॉजिकल सिद्धांत एवं सी:एन अनुपात की गणना
कम्पोस्टिंग एक अवायवीय (एरोबिक) सूक्ष्मजैविक प्रक्रिया है जिसमें सूक्ष्मजीव जैविक पदार्थों को विघटित करके स्थिर ह्यूमस में बदलते हैं:
- तापमान अवस्थाएं: मेसोफिलिक अवस्था (20-45°सेंटीग्रेड) में शर्करा अपघटक कवक और जीवाणु सक्रिय होते हैं। थर्माफिलिक अवस्था (45-65°सेंटीग्रेड) में सेल्यूलोज और लिग्निन का अपघटन होता है तथा हानिकारक खरपतवार के बीज व रोगाणु नष्ट होते हैं।
- सी:एन संतुलन: प्रारंभिक सी:एन अनुपात 25:1 से 30:1 होना चाहिए। उच्च सी:एन(जैसे गेहूं भूसा 85:1) होने पर विघटन धीमा होता है, जबकि कम सी:एन(जैसे गोबर 15:1) होने पर अमोनिया गैस के रूप में नाइट्रोजन का नुकसान होता है।
सी:एन संतुलन हेतु गणितीय सूत्र
सूत्र: सी:एन = [W1 × C1 + W2 × C2] / [W1 × N1 + W2 × N2]
उदाहरण: 100 किग्रा गेहूं भूसा (C=40%, N=0.5%) + 40 किग्रा मुर्गी की खाद (C=30%, N=3.0%) मिलाने पर मिश्रण का सी:एन अनुपात 28.5:1 प्राप्त होता है, जो त्वरित अपघटन के लिए सर्वोत्तम है।
6. नमी प्रबंधन एवं स्क्वीज परीक्षण
कम्पोस्ट ढेर में नमी की मात्रा 50% से 60% के बीच होनी चाहिए। 40% से कम नमी पर सूक्ष्मजीव निष्क्रिय हो जाते हैं, तथा 65% से अधिक नमी होने पर ढेर में ऑक्सीजन की कमी से बदबू (अवायवीय स्थिति) उत्पन्न होती है।
खेत पर नमी जांच: स्क्वीज परीक्षण
- कम्पोस्ट ढेर के 30 सेमी गहराई से सैंपल लेकर हथेली में दबाएं।
- यदि सैंपल बिखर जाए और हाथ सूखा रहे: नमी <45% (पानी का छिड़काव करें)।
- यदि सैंपल का लड्डू बन जाए और उंगलियों के बीच 1-2 बूंद पानी चमके: नमी 50-60% (आदर्श स्थिति)।
4. यदि बिना कसकर दबाए उंगलियों से पानी बहने लगे: नमी >65% (ढेर को पलटें और सूखा भूसा मिलाएं)।
7. प्रमुख कम्पोस्टिंग विधियां एवं उनकी तकनीकी विशिष्टताएं
7.1 विन्ड्रो कम्पोस्टिंग
- संरचना: लंबी समलंब ढेरियाँ जिनकी चौड़ाई 2.5–3.0 मीटर, ऊंचाई 1.5–1.8 मीटर तथा लंबाई आवश्यकतानुसार 20–50 मीटर रखी जाती है।
- मशीनीकरण: ट्रैक्टर-चलित विन्ड्रो टर्नर से प्रति घंटा 500–800 घन मीटर सामग्री को पलटकर हवा व नमी प्रदान की जाती है। बड़े कृषि फार्मों के लिए सर्वोत्तम।
7.2 इंदौर गड्डा विधि
मध्य प्रदेश के इंदौर शहर (इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री) में विकसित विश्व प्रसिद्ध विधि।
- गड्डे का आकार: 10 मी (लंबाई) × 1.5 मी (चौड़ाई) × 1.0 मी (गहराई) का गड्डा। इसमें 15 सेमी फसल अवशेष, 5 सेमी गोबर की खाद व मिट्टी की परतें बिछाई जाती हैं।
- पलटाव अनुसूची: पहला पलटाव 16वें दिन, दूसरा 30वें दिन तथा तीसरा 60वें दिन किया जाता है। 90 दिनों में उच्च गुणवत्ता वाली कम्पोस्ट तैयार होती है।
7.3 नाडेप ईंट टैंक विधि
- टैंक निर्माण: 10 फीट × 6 फीट × 3 फीट आकार का ईंटों का पक्का टैंक, जिसकी दीवारों में मधुमक्खी के छत्ते की भांति हवा हेतु छेद रखे जाते हैं।
- भरने का अनुपात: 1,400 किग्रा फसल अवशेष + 100 किग्रा गोबर का घोल + 1,400 किग्रा सूखी मिट्टी + 2,000 लीटर पानी। बिना पलटाव के 110–120 दिनों में 3 टन कम्पोस्ट प्राप्त होती है।
7.4 वर्मीकम्पोस्टिंग तकनीक
- केंचुआ प्रजातियां: मध्य प्रदेश की जलवायु हेतु एसेनिया फिटिडा – लाल केंचुआ) एवं पेरियोनिक्स एक्स्कैवेटस – भारतीय नीला केंचुआ) सर्वोत्तम हैं।
- पूर्व–पाचन: केंचुए डालने से पहले फसल अवशेषों को 15-20 दिनों तक पूर्व-पाचन कराना अनिवार्य है ताकि गर्मी व अमोनिया निकल सके।
- बेड प्रबंधन: 12 फीट × 4 फीट × 2 फीट आकार के एचडीपीई बेड्स में 60-70% नमी एवं 20-30°C तापमान बनाए रखा जाता है। 45-60 दिनों में वर्मीकम्पोस्ट तैयार हो जाती है।
8. परिपक्वता सूचकांक एवं उर्वरक नियंत्रण आदेश (एफसीओ) मानक
अच्छी तरह तैयार कम्पोस्ट का रंग गहरा भूरा/काला, संरचना भुरभुरी (चाय पत्ती जैसी) और गंध सोंधी मिट्टी जैसी होती है। एफसीओ द्वारा निर्धारित कानूनी मानक निम्न हैं:
| गुणवत्ता मानदंड | सिटी कम्पोस्ट मानक (एफसीओ) | वर्मीकम्पोस्ट मानक (एफसीओ) |
| सी:एन अनुपात | < 20:1 | < 15:1 |
| पीएच (1:5 घोल) | 6.5 – 7.5 | 6.8 – 7.5 |
| विद्युत चालकता (ईसी) | < 4.0 dS/m | < 3.0 डीएस/ मी. |
| कुल नाइट्रोजन (N%) | न्यूनतम 0.8% | न्यूनतम 1.2% |
| कुल फास्फोरस (P2O5%) | न्यूनतम 0.4% | न्यूनतम 0.8% |
| कुल पोटेशियम (K2O%) | न्यूनतम 0.4% | न्यूनतम 0.8% |
| अंकुरण सूचकांक(जीआई) | > 85%(अविषैला) | > 85%(अविषैला) |
9. अर्थशास्त्र एवं वित्तीय विश्लेषण
9.1 व्यावसायिक वर्मीकम्पोस्ट इकाई (100 टन प्रतिवर्ष क्षमता) की लागत व लाभ
| वित्तीय घटक | विवरण / मात्रा | वार्षिक राशि (₹) |
| पूंजीगत व्यय (CAPEX) | 20 एचडीपीई बेड्स, शेड नेट, पावर कटर, केंचुए, सीव मशीन | ₹3,47,000 (एकमुश्त) |
| वार्षिक कच्चा माल व गोबर | 150 टन अवशेष व गोबर @ ₹400/टन | ₹60,000 |
| वार्षिक श्रम लागत (लेबर) | 1 श्रमिक @ ₹9,000/माह | ₹1,08,000 |
| बिजली, पैकिंग व अन्य | 2,000 बैग्स (50 किग्रा) + बिजली व्यय | ₹54,000 |
| कुल वार्षिक परिचालन व्यय (OPEX) | परिचालन लागत | ₹2,22,000 |
| वार्षिक कुल आय | 100 टन वर्मीकम्पोस्ट बिक्री @ ₹4,500/टन | ₹ 4,50,000 |
| शुद्ध वार्षिक लाभ | कुल आय – परिचालन व्यय | ₹ 2,28,000 |
| पूंजी पुनर्भुगतान अवधि (पेबैक) | पूंजीगत व्यय / शुद्ध लाभ | 1.52 वर्ष |
9.2 कृषक स्तर पर प्रति हेक्टेयर आर्थिक लाभ
- उर्वरक बचत: प्रति हेक्टेयर 5 टन कम्पोस्ट/वर्मीकम्पोस्ट के प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों (यूरिया, डीएपी, पोटाश) में 25% की बचत होती है, जिससे ₹3,800/हेक्टेयर की सीधी बचत होती है।
- उपज वृद्धि लाभ: जेएनकेवीवी व आईसीएआर- भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान के परीक्षणों के अनुसार सोयाबीन-गेहूं उपज में 8-11% की वृद्धि से ₹8,500/हेक्टेयर का अतिरिक्त लाभ प्राप्त होता है।
- कुल शुद्ध लाभ: मध्य प्रदेश के किसानों को प्रति हेक्टेयर कुल शुद्ध आर्थिक लाभ ₹12,300 प्रतिवर्ष होता है।
10. राष्ट्रीय व राज्य अनुसंधान उपलब्धियां एवं शासकीय योजनाएं
शासकीय योजनाएं: राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत वर्मीकम्पोस्ट इकाई हेतु 50% अनुदान (अधिकतम ₹50,000) तथा एस. एम. ए.एम. योजना के तहत मशीनों पर 50%-80% सब्सिडी दी जाती है।
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर द्वारा कवक-जीवाणु आधारित फास्ट बायो-डीकम्पोजर कंसोर्टियम विकसित किया गया, जो अपघटन समय को 20 दिन घटाता है।
भा.कृ.अनु.प.-केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल द्वारा इन-सिटू अवशेष प्रबंधन हेतु सुपर सीडर, पैडी स्ट्रॉ चॉपर एवं स्ट्रॉ रीपर का सफल मशीनीकरण किया गया।
आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture


