Ad DesktopAd TabletAd Mobile
राज्य कृषि समाचार (State News)

मुंबई-रीवा का सफर करने वाले इंजीनियर ने प्राकृतिक खेती से बदली तस्वीर

07 नवंबर 2026, रीवा: मुंबई-रीवा का सफर करने वाले इंजीनियर ने प्राकृतिक खेती से बदली तस्वीर – मूल रूप से मैकेनिकल इंजीनियर रहे निरज कुमार सिंह अब मुंबई और रीवा के बीच आना-जाना करते हुए खेती कर रहे हैं। वे रीवा जिले में अपनी तीन एकड़ और लीज पर ली गई 25 एकड़ जमीन पर पूरी तरह रासायनिक खाद-दवा मुक्त प्राकृतिक खेती करते हैं।

पंचगव्य और जीवामृत से खेती, लागत शून्य

निरज सोना मोती गेहूं और बुद्धा चावल जैसी पुरानी देसी किस्मों की खेती करते हैं। खाद के लिए वे घर पर ही गोबर और गोमूत्र से पंचगव्य और जीवामृत तैयार करते हैं। उनका कहना है, “आज मेरी खाद और कीटनाशक पर लागत शून्य है।”

उनके मुताबिक, प्राकृतिक तरीके से खेती करने पर उन्हें रासायनिक खेती के मुकाबले प्रति एकड़ दो से तीन गुना ज्यादा उत्पादन मिल रहा है। वे कहते हैं, “रासायनिक खेती की तुलना में मुझे प्रति एकड़ जमीन पर आसानी से दो से तीन गुना ज्यादा उत्पादन मिल जाता है।” यह आंकड़ा उनका अपना अनुभव-आधारित अनुमान है, किसी मापी गई तुलना पर आधारित नहीं।

Ad DesktopAd TabletAd Mobile
Ad DesktopAd TabletAd Mobile

पंचगव्य आम तौर पर गाय के गोबर, गोमूत्र, दूध, दही और घी को मिलाकर तैयार किया जाता है, जबकि जीवामृत बनाने में गोबर, गोमूत्र, गुड़ और बेसन का इस्तेमाल होता है। दोनों का मकसद मिट्टी में फसल के लिए जरूरी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाना होता है, जिससे पौधों को पोषक तत्व बेहतर तरीके से मिल सकें।

कृषक जगत को व्हाट्सएप पर फॉलो करें
खेती-किसानी की ताज़ा खबरें, सीधे आपके फ़ोन पर
चैनल फॉलो करें

गेहूं का दोगुना दाम, दूध से अतिरिक्त कमाई

सोना मोती गेहूं की खासियत यह है कि इसे बाजार में सामान्य रासायनिक गेहूं के मुकाबले लगभग दोगुने दाम पर बेचा जाता है। निरज बताते हैं, “मैं सोना मोती गेहूं को रासायनिक तरीके से उगाए गेहूं के लगभग दोगुने दाम पर बेचता हूं।”

खेती के साथ-साथ निरज डेयरी पशु भी पालते हैं और दूध व दुग्ध उत्पाद बेचकर अतिरिक्त कमाई करते हैं। उनका कहना है, “मैं सिर्फ दूध उत्पाद बेचकर महीने में लगभग 75,000 रुपये कमा लेता हूं।” यह राशि दूध की कुल बिक्री पर आधारित है, लागत घटाने के बाद की शुद्ध बचत नहीं, इसलिए असल मुनाफा इससे कम भी हो सकता है।

निरज की खेती की यात्रा मुंबई में नौकरी के साथ शुरू हुई, जहां वे समय-समय पर रीवा आकर खेत का काम देखते हैं और बाकी समय स्थानीय मदद पर निर्भर रहते हैं। उनका कहना है कि देसी और पुरानी अनाज किस्मों की मांग शहरी उपभोक्ताओं में बढ़ रही है, जो सीधे किसान से खरीदना पसंद करते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में देश भर में प्राकृतिक और जैविक खेती के तरीकों को लेकर किसानों की दिलचस्पी बढ़ी है, खासकर उन इलाकों में जहां लगातार रासायनिक खेती से मिट्टी की उर्वरता घटने की शिकायतें रही हैं। निरज जैसे किसान खेती के साथ शहर में नौकरी को भी साथ लेकर चलने का एक व्यावहारिक मॉडल पेश करते हैं, जिसमें जमीन से जुड़ाव भी बना रहता है और अतिरिक्त आय का जरिया भी मिलता है।

निरज की कहानी उन किसानों के लिए एक उदाहरण है जो खेती के साथ दूसरा पेशा भी करना चाहते हैं, लेकिन अपनी जमीन और पुश्तैनी खेती से जुड़े रहना चाहते हैं। देसी किस्मों और प्राकृतिक तरीकों से खेती करने पर बाजार में अलग पहचान बनाना मुमकिन है, बशर्ते किसान गुणवत्ता और नियमितता बनाए रखें।

रीवा और आसपास के इलाके के कई किसान अब पारंपरिक गेहूं और धान की किस्मों के साथ-साथ देसी व पुरानी किस्मों की छोटे पैमाने पर खेती शुरू कर रहे हैं, ताकि बाजार में अलग ग्राहक वर्ग तक पहुंचा जा सके। लागत कम रखने और उत्पाद की सीधी बिक्री करने का यही तरीका निरज जैसे किसानों को रासायनिक खेती के मुकाबले ज्यादा टिकाऊ आमदनी का जरिया बनाता दिख रहा है।

आपने उपरोक्त समाचार कृषक जगत वेबसाइट पर पढ़ा: हमसे जुड़ें
> नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़, व्हाट्सएप्प
> कृषक जगत अखबार की सदस्यता लेने के लिए यहां क्लिक करें – घर बैठे विस्तृत कृषि पद्धतियों और नई तकनीक के बारे में पढ़ें
> कृषक जगत ई-पेपर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: E-Paper
> कृषक जगत की अंग्रेजी वेबसाइट पर जाने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें: Global Agriculture