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किसानों की सफलता की कहानी (Farmer Success Story)राज्य कृषि समाचार (State News)

सफलता की कहानी: धान में नुकसान के बाद उडुपी के किसान ने अपनाई कमल के फूलों की खेती

27 अक्टूबर 2026, उडुपी, कर्नाटक: सफलता की कहानी: धान में नुकसान के बाद उडुपी के किसान ने अपनाई कमल के फूलों की खेती – लगातार धान की खेती में नुकसान झेलने के बाद कापू तालुक के उलियारगोली गांव के मनोहर शेट्टी ने अपने निचले इलाके के खेतों का इस्तेमाल बिल्कुल अलग तरीके से करना शुरू किया। आज वे अपनी तीन एकड़ जमीन पर कमल के फूलों की खेती से हर महीने करीब एक लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं।

साई राधा ग्रुप के प्रबंध निदेशक शेट्टी पहले 15 से 20 एकड़ में धान उगाते थे, लेकिन लगातार घाटे के चलते उन्होंने अपनी दलदली और निचली जमीन को कमल के तालाबों में बदलने का फैसला किया। तटीय कर्नाटक के इस इलाके में बारिश के मौसम में पानी का जमाव धान के लिए नुकसानदायक था, लेकिन कमल की खेती के लिए यही जमीन मुनाफे का सौदा बन गई।

उन्होंने पिंक क्लाउड, व्हाइट पियोनी और बुचा जैसी किस्मों के कमल लगाए, जो अपने रंग और आकार के लिए सजावट और धार्मिक आयोजनों में खासतौर पर इस्तेमाल होते हैं। रोपाई के करीब 90 दिन बाद पहली फसल तैयार होती है, और इसके बाद तालाबों से लगातार कई महीनों तक फूल मिलते रहते हैं।

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मंदिरों से मिलता है बड़ा बाजार

पिछले दो महीनों से उनके तालाबों से रोजाना 400 से 500 फूल निकल रहे हैं, जो औसतन 15 रुपये प्रति फूल के भाव पर बिकते हैं। कमल के फूलों के सबसे बड़े खरीदार आसपास के मंदिर हैं, जिनमें कोल्लूर का मूकाम्बिका मंदिर, उचिला मंदिर और कापू मंदिर शामिल हैं। इसके अलावा उडुपी और कापू के फूल विक्रेता भी नियमित रूप से इनसे फूल खरीदते हैं।

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शेट्टी पूरी तरह जैविक तरीके से खेती करते हैं और कीट नियंत्रण के लिए नीम तेल पर आधारित घोल का इस्तेमाल करते हैं, जिससे न तो तालाब का पानी प्रदूषित होता है और न ही आसपास की मिट्टी पर कोई बुरा असर पड़ता है। इस वजह से मंदिरों और धार्मिक आयोजनों के लिए यह फूल और भी बेहतर विकल्प बन जाते हैं।

उनका मानना है कि कापू, उलियारगोली और पंगाला इलाके में करीब 200 एकड़ दलदली भूमि ऐसी है, जिसे इसी तरह कमल की खेती के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर आसपास के और किसान भी इस मॉडल को अपनाएं, तो तटीय कर्नाटक के उन इलाकों को नई पहचान मिल सकती है जहां पारंपरिक धान की खेती अब फायदे का सौदा नहीं रह गई है।

धान से फूलों तक का सफर

शेट्टी का कहना है कि धान की खेती में हर साल बीज, खाद और मजदूरी पर खर्च करने के बावजूद मौसम की मार या बाजार में सही दाम न मिलने की वजह से मुनाफा तय नहीं था। इसके उलट कमल की खेती में एक बार तालाब तैयार होने के बाद लागत कम हो जाती है, जबकि फूलों की मांग मंदिरों और धार्मिक आयोजनों की वजह से लगभग पूरे साल बनी रहती है।

इसी वजह से तटीय कर्नाटक के उन निचले इलाकों में, जहां पहले सिर्फ धान या मछली पालन का विकल्प होता था, अब कमल जैसी सजावटी व धार्मिक फसलों की खेती भी किसानों के लिए एक व्यावहारिक जरिया बनती जा रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसे मॉडल को और प्रोत्साहन मिले, तो तटीय इलाकों के छोटे किसान भी परंपरागत खेती के मुकाबले कम जोखिम में बेहतर आमदनी कमा सकते हैं।

शेट्टी का कहना है कि शुरुआत में उन्हें भी यह अंदाजा नहीं था कि कमल के फूलों की मांग इतनी नियमित रहेगी, लेकिन मंदिरों और स्थानीय फूल बाजार से मिले अनुभव के बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपने तालाबों का दायरा बढ़ाया। वे अब आसपास के कुछ और किसानों को भी अपने खेतों का एक हिस्सा कमल की खेती के लिए इस्तेमाल करने की सलाह दे रहे हैं, ताकि पूरे इलाके में सामूहिक रूप से बेहतर बाजार और परिवहन की सुविधा खड़ी की जा सके।

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