धान की फसल पर तना छेदक और पत्ती मोड़क का खतरा, किसान ऐसे करें बचाव
01 सितंबर 2026, भोपाल: धान की फसल पर तना छेदक और पत्ती मोड़क का खतरा, किसान ऐसे करें बचाव – धान की खेती करने वाले किसानों के लिए इस समय फसल की नियमित निगरानी बेहद जरूरी है। धान में तना छेदक और पत्ती मोड़क कीट का प्रकोप फसल को नुकसान पहुंचा सकता है। कृषि विभाग ने किसानों को खेतों का लगातार निरीक्षण करने और शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही नियंत्रण उपाय अपनाने की सलाह दी है। विभाग के अनुसार समय पर कीट की पहचान और उचित नियंत्रण से फसल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
तना छेदक की ऐसे करें पहचान
तना छेदक धान की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कीटों में शामिल है। इसके प्रकोप में पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। तने के निचले हिस्से में छोटे छेद दिखाई दे सकते हैं और अंदर से तना खोखला हो जाता है। प्रकोप बढ़ने पर धान की बालियां सफेद होकर सूखने लगती हैं, जिससे दाने बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और उपज घट सकती है।
कृषि विभाग की सलाह के अनुसार तना छेदक के नियंत्रण के लिए क्लोरपाइरीफास 50 प्रतिशत + साइपरमेथ्रिन 5 प्रतिशत के मिश्रण का 50 मिलीलीटर प्रति स्प्रेयर की दर से उपयोग किया जा सकता है। कीटनाशक का प्रयोग उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि विभाग की अनुशंसा के अनुसार ही करें।
पत्ती मोड़क से भी फसल को नुकसान
धान में पत्ती मोड़क को ग्रामीण क्षेत्रों में ‘सांवा कीट’ के नाम से भी जाना जाता है। इसकी हरी इल्ली पत्ती को मोड़कर उसके अंदर छिप जाती है और पत्ती के हरे हिस्से को खाती है। इससे पत्तियों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता प्रभावित होती है और पौधे की वृद्धि पर असर पड़ सकता है।
पत्तियों पर सफेद या पारदर्शी धारियां दिखाई देना इसके प्रकोप का प्रमुख संकेत है। मुड़ी हुई पत्तियों के साथ ऐसी धारियां नजर आएं तो किसानों को पौधों की जांच करनी चाहिए।
इसके नियंत्रण के लिए कृषि विभाग ने दो विकल्प बताए हैं—
क्लोरेन्ट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एससी: 6 से 10 मिलीलीटर प्रति स्प्रेयर।
एमामेक्टिन बेंजोएट 5 प्रतिशत एसजी: 8 से 10 ग्राम प्रति स्प्रेयर।
दोनों में से किसी एक विकल्प का उपयोग वास्तविक कीट प्रकोप और विभागीय अनुशंसा के अनुसार किया जाना चाहिए।
ज्यादा यूरिया और पानी से बढ़ सकता है प्रकोप
किसानों को धान में नाइट्रोजन यानी यूरिया का अत्यधिक इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जरूरत के अनुसार संतुलित उर्वरक का प्रयोग करें। साथ ही खेत में लंबे समय तक अधिक पानी भरा रहने से बचें और आवश्यकता पड़ने पर पानी की निकासी की व्यवस्था करें।
किसान खेतों का नियमित निरीक्षण करते रहें। पत्तियां पीली पड़ने, मुड़ने, तने में छेद या बालियां सफेद होने जैसे शुरुआती लक्षण दिखते ही कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेकर नियंत्रण उपाय अपनाना फसल को बड़े नुकसान से बचा सकता है।
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