धान में शीथ ब्लाइट और फाल्स स्मट रोग की आशंका, पीएयू लुधियाना ने बताई फफूंदनाशक दवा और मात्रा
11 सितंबर 2026, लुधियाना: धान में शीथ ब्लाइट और फाल्स स्मट रोग की आशंका, पीएयू लुधियाना ने बताई फफूंदनाशक दवा और मात्रा – पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) ने अपनी सितंबर माह की फार्म एडवाइजरी में धान किसानों को शीथ ब्लाइट और फाल्स स्मट जैसी फफूंद जनित बीमारियों से बचाव की सलाह दी है। ज्यादा नमी रहने और बाली निकलने की अवस्था में इन बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।
विश्वविद्यालय के मुताबिक, शीथ ब्लाइट रोग पत्तियों के आवरण (शीथ) पर भूरे धब्बों के रूप में दिखता है और फैलने पर पूरी बाली को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे दाने खोखले रह जाते हैं।
शीथ ब्लाइट के लिए 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव
पीएयू ने प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में अयान 48 डब्ल्यूजी (क्रेसोक्सिम मिथाइल़+हेक्साकोनाजोल) 200 ग्राम, या नेटिवो 75 डब्ल्यूजी (ट्राइफ्लोक्सिस्ट्रोबिन+टेबुकोनाजोल) 80 ग्राम, या इग्लेयर/पल्सर 24 एससी (थिफ्लुजामाइड) 150 मिलीलीटर मिलाकर छिड़काव करने और जरूरत पड़ने पर 15 दिन बाद दोबारा छिड़काव करने की सलाह दी है।
फाल्स स्मट से बचाव के उपाय
बाली निकलने की अवस्था में ज्यादा नमी रहने पर फाल्स स्मट यानी झूठी कांगियारी रोग लगने की आशंका बढ़ जाती है। इसके लिए पीएयू ने प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में गैलीलियो वे 18.76 एससी (पिकोक्सीस्ट्रोबिन+प्रोपिकोनाजोल) 400 मिलीलीटर या कोसाइड 46 डीएफ (कॉपर हाइड्रॉक्साइड) 500 ग्राम के छिड़काव की सलाह दी है।
विश्वविद्यालय ने यह भी कहा है कि खेत में पानी का सही प्रबंधन और संतुलित नाइट्रोजन खाद का इस्तेमाल भी इन बीमारियों के खतरे को कम करता है। ज्यादा नाइट्रोजन खाद डालने से पौधे कमजोर हो जाते हैं और फफूंद जल्दी हमला करती है।
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, घनी बुवाई वाले खेतों में हवा और धूप की आवाजाही कम होने से नमी ज्यादा समय तक बनी रहती है, जिससे शीथ ब्लाइट फैलने का खतरा और बढ़ जाता है। ऐसे खेतों में किसानों को समय-समय पर पानी निकालने और खेत की निगरानी करने की सलाह दी गई है।
विश्वविद्यालय ने किसानों से यह भी अपील की है कि किसी भी फफूंदनाशक का इस्तेमाल करने से पहले लेबल पर दी गई जानकारी जरूर पढ़ें और तय मात्रा से ज्यादा दवा न डालें। एक ही दवा का बार-बार इस्तेमाल करने से फफूंद में भी प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है, इसलिए जरूरत पड़ने पर अलग-अलग समूह की दवाओं को बदल-बदल कर इस्तेमाल करना बेहतर रहता है।
फसल कटाई से पहले के आखिरी हफ्तों में बीमारी का हमला सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है, क्योंकि इस समय दाना भरने की प्रक्रिया चल रही होती है। ऐसे में किसानों को सलाह दी जाती है कि वे खेत का नियमित निरीक्षण करें और बाली में बदलाव के शुरुआती लक्षण दिखते ही सलाह के मुताबिक छिड़काव कर दें, ताकि उपज और दाने की गुणवत्ता दोनों सुरक्षित रहें।
विशेषज्ञों के मुताबिक, फफूंदनाशक के छिड़काव के साथ खेत में जल निकासी की व्यवस्था ठीक रखना भी जरूरी है, क्योंकि लंबे समय तक पानी भरा रहने से नमी बढ़ती है और बीमारी फैलने की रफ्तार तेज हो जाती है। पंजाब के अलावा हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धान क्षेत्रों में भी सितंबर में इन बीमारियों पर नजर रखने की जरूरत बताई गई है।
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