72 साल की उम्र में अमरूद की खेती से मिसाल बने ओडिशा के किसान पदन नायक
17 सितंबर 2026, केंद्रापड़ा (ओडिशा): 72 साल की उम्र में अमरूद की खेती से मिसाल बने ओडिशा के किसान पदन नायक – उम्र के 72वें पड़ाव पर जब ज्यादातर लोग आराम की जिंदगी पसंद करते हैं, केंद्रापड़ा जिले के देराबीश ब्लॉक के जान्रा बारीमूल गांव के किसान पदन नायक अमरूद की खेती से सालाना 6 से 7 लाख रुपये कमा रहे हैं। उन्होंने महज 10 से 12 गुंठा जमीन से अमरूद की खेती शुरू की थी, जिसे अब उन्होंने कहीं बड़े रकबे में फैला दिया है।
पदन नायक बताते हैं, “मैं सालाना करीब 2 लाख रुपये खेती पर खर्च करता हूं और 6-7 लाख रुपये कमाता हूं। मैं नियमित रूप से 2-3 मजदूर रखता हूं।” यानी सालाना खर्च घटाने के बाद भी उन्हें 4 से 5 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा हो रहा है, जो कई सरकारी नौकरियों से भी ज्यादा है।
बागवानी विभाग की मदद से मिली रफ्तार
बागवानी विभाग के सहायक निदेशक देबदास दत्ता ने बताया कि पिछले साल पदन नायक को अमरूद की खेती के लिए सरकारी सहायता दी गई थी, जिससे उन्हें बगीचे का विस्तार करने में मदद मिली। इसी सहायता के बाद उनकी पैदावार और आमदनी दोनों में बढ़ोतरी हुई है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत इस तरह की सहायता आमतौर पर पौध, खाद और सिंचाई ढांचे के लिए दी जाती है।
पदन नायक अपने बगीचे में 2 से 3 मजदूरों को नियमित रोजगार भी दे रहे हैं, जिन्हें वे हर महीने 12,000 रुपये मजदूरी देते हैं। इस तरह उनकी खेती सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि गांव के दूसरे परिवारों के लिए भी आय का जरिया बन गई है। खेती के साथ-साथ वे बगीचे में सिंचाई और देखभाल का काम भी खुद ही देखते हैं, जिससे लागत नियंत्रण में रहती है।
उनके अमरूद के बगीचे में समय-समय पर छंटाई, जैविक खाद का इस्तेमाल और उचित दूरी पर पौध रोपण जैसी तकनीकों का पालन किया जाता है, जिससे पेड़ों से लगातार अच्छी गुणवत्ता का फल मिलता रहता है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे खुद खेत में जाकर काम की निगरानी करते हैं और नई तकनीकों के बारे में जानकारी लेने के लिए बागवानी विभाग के अधिकारियों से लगातार संपर्क में रहते हैं।
गांव के कई युवा अब पारंपरिक धान की खेती के साथ-साथ थोड़े रकबे में अमरूद जैसी बागवानी फसलें भी लगाने लगे हैं, ताकि वे भी पदन नायक की तरह अतिरिक्त आमदनी कमा सकें। कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अगर ज्यादा किसान इस मॉडल को अपनाएं, तो इलाके में अमरूद की एक स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला विकसित हो सकती है, जिससे भंडारण और परिवहन जैसी सुविधाएं भी बेहतर होंगी।
सम्मान और पहचान
पदन नायक की मेहनत को कई मंचों पर सराहा जा चुका है। उन्हें ‘कृषक बंधु’ सम्मान से नवाजा गया है और भुवनेश्वर में आयोजित एक किसान मेले में उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया गया। 50 से ज्यादा निजी संगठनों ने भी उनके काम को पहचान दी है। इलाके के युवा किसान अब पदन नायक के बगीचे को देखने और सीखने के लिए पहुंचते हैं, जिससे इलाके में बागवानी के प्रति रुझान भी बढ़ रहा है।
पदन नायक अपने बगीचे से तैयार अमरूद को नजदीकी हाट और कस्बाई बाजारों में सीधे बेचते हैं, जिससे उन्हें बिचौलियों को दिए जाने वाले कमीशन से भी बचत होती है। इलाके के व्यापारी अब मौसम में सीधे उनके बगीचे तक पहुंचकर भी खरीद करने लगे हैं, जिससे उपज बेचने में लगने वाला समय और मेहनत दोनों कम हुई है।
पदन नायक की कहानी बताती है कि छोटी जमीन और सरकारी योजनाओं के सही इस्तेमाल से बुजुर्ग किसान भी बागवानी में बड़ा मुकाम हासिल कर सकते हैं। तटीय ओडिशा के किसानों के लिए अमरूद जैसी बागवानी फसलें परंपरागत धान की खेती के मुकाबले कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाला विकल्प बनकर उभर रही हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार भी पैदा हो रहा है और आसपास के किसान भी बागवानी अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।
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