राज्य कृषि समाचार (State News)

जबलपुर : प्रीति ने प्राकृतिक खेती से घटाई लागत, उपज का मिल रहा बेहतर दाम

14 अगस्त 2026, जबलपुर: जबलपुर : प्रीति ने प्राकृतिक खेती से घटाई लागत, उपज का मिल रहा बेहतर दाम – यह कहानी है जिले के जबलपुर विकासखंड के ग्राम घाना कैलवास की महिला किसान प्रीति पटेल की। प्रीति ने रासायनिक खेती को छोड़ प्राकृतिक खेती को अपनाया। इससे खेती की लागत कम हुई और उपज की गुणवत्ता में भी सुधार आया। अब वे खुद प्राकृतिक खेती से आत्मनिर्भर बनने के साथ गांव और आसपास के किसानों को भी रसायन मुक्त खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

प्रीति बताती हैं रासायनिक खेती से  मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही थी। इसी दौरान वे आत्मा  परियोजना और नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग से जुड़ीं। योजना के तहत उन्हें प्राकृतिक खेती के तरीकों और जैविक घोल तैयार करने का प्रशिक्षण मिला। प्रशिक्षण में सीखी तकनीक को अपने खेत में अपनाया , जिसके बाद उन्हें खेती में बदलाव नजर आने लगा। प्राकृतिक तरीके से खेती करने पर मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर हुई और उपज की गुणवत्ता में भी सुधार आया है। प्रीति बताती है कि वे अपनी 2 एकड़ सहित कुल 7 एकड़ में खेती करती हैं। पहले रासायनिक खाद और महंगे कीटनाशकों पर 40 हजार रुपए तक खर्च आता था ।लेकिन अब प्राकृतिक खेती पर 5 से 10 हज़ार रुपए तक खर्च आता है। इससे सालाना बचत लगभग 2 से 2.5 लाख रुपए तक हो जाती है।

बीजामृत-जीवामृत बनाना सीखा :- प्रशिक्षण के दौरान प्रीति ने बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत और नीमास्त्र-ब्रह्मास्त्र जैसे प्राकृतिक कीटनाशक तैयार करने की विधि सीखी। इसके बाद उन्होंने अपने खेत में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग पूरी तरह बंद कर प्राकृतिक तरीकों से खेती शुरू की।

बाजार से खाद-कीटनाशक खरीदने का खर्च हुआ खत्म :-   प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद खेती की लागत में कमी आई। बाजार से महंगी रासायनिक खाद और कीटनाशक खरीदने की जरूरत भी नहीं रही। वहीं बीजामृत और जीवामृत के इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार के साथ फसलों की पैदावार में भी वृद्धि हुई।

प्राकृतिक उपज को मिल रहे बेहतर दाम :- प्राकृतिक तरीके से तैयार अनाज और सब्जियों की बाजार में मांग होने से प्रीति को उपज के बेहतर दाम मिलने लगे। इससे उनकी खेती पहले की तुलना में अधिक लाभकारी बनी।

प्राकृतिक खेती के लिए अब दूसरों को कर रहीं प्रेरित :- प्रीति पटेल की सफलता अब उनके खेत तक सीमित नहीं है। वे घाना कैलवास और आसपास के किसानों को भी प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती से लागत कम करने के साथ मिट्टी और पर्यावरण का संरक्षण भी किया जा सकता है।

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