मुंबई की चकाचौंध से खेतों की हरियाली तक: टिश्यू कल्चर केले ने बदली किसान की जिंदगी
वैज्ञानिक खेती को धीरज नागौर ने बनाया सफलता का मंत्र; आधुनिक तकनीक और सही मार्गदर्शन से खड़ी की नई पहचान
25 अगस्त 2026, जलगांव: मुंबई की चकाचौंध से खेतों की हरियाली तक: टिश्यू कल्चर केले ने बदली किसान की जिंदगी – मायानगरी मुंबई में अच्छा करियर बनाने का सपना लेकर देशभर से युवा आते हैं. मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के तलुन गाँव के धीरज नागौर भी इसी सपने के साथ मुंबई पहुँचे. फिल्मी दुनिया में कदम रखा और कुछ धारावाहिकों में काम करने का अवसर भी मिला. लेकिन मुंबई की चकाचौंध के बीच अकेलापन और घर की मिट्टी का खिंचाव उन्हें बार-बार अपने गाँव की ओर खींचता रहा. आखिरकार उन्होंने मुंबई छोड़कर अपने गांव लौटने का फैसला किया. गाँव लौटे तो सामने एक सवाल था “अब करना क्या है?” पुश्तैनी खेती थी, लेकिन खेती का अनुभव नहीं था. इसलिए उन्होंने एक साल खेती को करीब से समझा, सीखा और गाँव के किसानों से खेती के नए तरीकों की जानकारी ली. इसी दौरान उन्हें जैन टिश्यू कल्चर केले के बारे में पता चला. उन्होंने पहली बार जैन टिश्यू कल्चर केले की खेती शुरू की और फिर… खेती ने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी. जिस युवा ने कभी मुंबई की फिल्मी दुनिया में अपना भविष्य तलाशा था, आज उन्हें खेतों की हरियाली और प्रकृति के बीच काम करने में कहीं ज्यादा सुकून मिल रहा है. कैमरों की लाइट और कृत्रिम दुनिया के मुकाबले खेती में उन्हें कहीं अधिक मानसिक शांति और आत्म संतोष मिलता है. आइए, जानते हैं धीरज नागौर की खेती की सफलता की पूरी कहानी… उनकी अपनी जुबानी।

आर्ट्स में ग्रेजुएशन करने के बाद साल 2011 में मैं कलाकार बनने का सपना लिए मुंबई पहुँचा. मुझे गाने का भी बेहद शौक था. अपनी जरूरतें पूरी करने और फिल्मी दुनिया में आगे बढ़ने का रास्ता तलाशने के लिए मैंने कुछ क्लबों में गाना शुरू कर दिया. इसके साथ ही मॉडलिंग और अभिनय की दुनिया में भी अवसर तलाशता रहा. मुंबई में मेरी जिंदगी ऑडिशन के चक्कर काटने, पार्ट-टाइम जॉब करके खर्चे निकालने और हर दिन खुद को साबित करने की कोशिशों के बीच गुजरने लगी. संघर्ष लंबा था, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं छोड़ी. आखिरकार मेरी मेहनत रंग लाई और मुझे टीवी धारावाहिकों में काम करने के अवसर मिलने लगे. लोकप्रिय शो ‘क्राइम पेट्रोल’ का हिस्सा बनना मेरे लिए एक खास उपलब्धि थी. इसके अलावा मैंने ‘सावधान इंडिया’, ‘राशिविला’, ‘बेपनाह’, ‘प्यार हो गया’, ‘दिल दोस्ती डांस’ और ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ जैसे कई सीरियल्स में अभिनय किया है. ‘सावधान इंडिया’ के दो एपिसोड्स में मैंने मुख्य भूमिका निभाई है. उस वक्त लगा कि जिस सपने को लेकर मैं मुंबई आया था, वह अब धीरे-धीरे सच होने लगा है. लेकिन साल 2018 तक आते-आते मुंबई की इस चकाचौंध भरी जिंदगी का एक दूसरा पहलू भी मेरे सामने था. काम और भागदौड़ के बीच भीतर कहीं एक गहरा अकेलापन घर करने लगा था. दूसरी ओर, पारिवारिक जिम्मेदारियां और अपनों के बीच रहने की चाह लगातार मुझे अपने गाँव की ओर खींच रही थी. आखिरकार मैंने मुंबई की उस दौड़-भाग भरी जिंदगी को पीछे छोड़कर 2018 में हमेशा के लिए अपने गाँव लौटने का फैसला कर लिया. गाँव तो लौट गया. अब सामने एक सवाल था “अब करना क्या है?”
एक साल खेती सीखी, फिर खोजा नया रास्ता – हमारे पास लगभग 35 एकड़ की पुश्तैनी खेती थी, जहाँ सालों से कपास, मक्का, चना और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलें ही बोई जाती थीं. इस खेती से उपज और मुनाफा हमेशा एक ही ढर्रे पर सीमित रहता था. जब मैं मार्च 2018 में मुंबई की चकाचौंध छोड़कर गाँव लौटा, तब मेरा रुख खेतों की तरफ गया. वर्ष 2019 तक पूरे एक साल मैंने अपनी ज़मीन की मिट्टी, मौसम के मिज़ाज और खेती की बारीकियों को बहुत करीब से समझा और सीखा. इस दौरान लगातार एक बात मेरे मन में घूमती रही कि अगर खेती में वाकई कुछ बड़ा और सार्थक करना है, तो हमें पारंपरिक तरीकों से बाहर निकलकर कुछ आधुनिक और अलग अपनाना ही होगा.
जैन टिश्यू कल्चर केला बना जिंदगी का टर्निंग पॉइंट – मेरे खोज के दौरान मैंने देखा कि गाँव के कुछ प्रगतिशील किसान जैन टिश्यू कल्चर केले की खेती कर रहे हैं. उत्सुकता मुझे उनके खेतों तक खींच ले गई, और वहाँ जाकर जो दृश्य मैंने देखा, उसने मेरी सोच को पूरी तरह बदल दिया. खेत में एक ही ऊँचाई पर लहलहाते एकसमान पौधे, उनकी गज़ब की हरियाली, हर पौधे पर लदे भारी-भरकम घौद और फलों की एक जैसी चमकदार बनावट, आकर्षक रंग यह सभ देखकर मैं दंग रह गया. उस मंज़र ने मेरे मन पर इतना गहरा असर छोड़ा कि मैंने ठान लिया कि अब मुझे भी जैन टिश्यू कल्चर केले की ही खेती करनी है. आखिरकार, 17 मार्च 2020 रंगपंचमी के शुभ और रंगों से भरे दिन मैंने अपने खेतों में पहली बार जैन टिश्यू कल्चर केले के पौधों का रोपण किया. वह दिन मेरे लिए सिर्फ़ मिट्टी में पौधे लगाने का दिन नहीं था, बल्कि मेरी ज़िंदगी के एक नए और सुनहरे अध्याय का शुभारंभ था. 17 मार्च का वह दिन मेरी पूरी जीवन-यात्रा का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ, जहाँ से मैंने पारंपरिक खेती की पुरानी सीमाओं को पीछे छोड़कर आधुनिक, वैज्ञानिक और प्रगतिशील कृषि की राह पर अपना पहला ऐतिहासिक कदम रखा।
वैज्ञानिक तकनीक ने बदली खेती की तस्वीर – जब पहली बार लगाए गए केले के पौधे चार महीने के हुए, तो उनकी शानदार और एकसमान बढ़त देखकर मेरा हौसला बुलंद हो गया. उस बेहतरीन परिणाम से मुझे इतनी हिम्मत मिली कि मैंने उसी साल दिसंबर में ‘जैन टिश्यू कल्चर’ का एक और नया प्लांट लगा दिया. सही शुरुआत का नतीजा यह रहा कि उत्पादन बेहद शानदार मिलने लगा और खेती को लेकर मेरी सोच पूरी तरह बदल गई. टिश्यू कल्चर केले की खेती में सही तकनीक और वैज्ञानिक सलाह सबसे अहम होती है. इसके लिए मुझे ‘जैन इरिगेशन’ के वरिष्ठ केले वैज्ञानिक डॉ. के. बी. पाटील साहब का मार्गदर्शन मिला. उनके मार्गदर्शन में मैंने फसल में पौधों की दूरी, पानी और पोषण प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना शुरू किया. मैं गर्मी के मौसम में हार्वेस्ट होने वाले केले पौधों के लिए मैं 5.5 × 5.5 फीट की दूरी रखता हूँ. वहीं, ठंड और बारिश के मौसम में कटाई के लिए तैयार होने वाली फसल को 5.5 × 6 फीट के अंतर पर लगाता हूँ, ताकि हवा और धूप का सही संतुलन बना रहे. पौधो को सही पोषण और पानी के सटीक प्रबंधन के लिए मैंने पूरे खेत में जैन इरिगेशन की ड्रिप सिस्टम लगाई है, जिससे पौधों को ज़रूरत के हिसाब से ही पानी और खाद मिलती है.
फर्टीगेशन और क्रॉप-प्रोटेक्शन से बेहतर उत्पादन – खाद और उर्वरक प्रबंधन के लिए मुझे लगातार डॉ. के. बी. पाटील सर का मार्गदर्शन मिलता रहता है. हम खाद को सीधे खेत की मिट्टी में डालने के बजाय ड्रिप इरिगेशन के माध्यम से फर्टीगेशन करते हैं. इससे पोषक तत्व सीधे पौधों की जड़ों तक पहुँचते हैं, पौधे उन्हें बेहतर तरीके से ग्रहण करते हैं और खाद की अनावश्यक बर्बादी भी कम होती है. फसल को बीमारियों और कीटों से सुरक्षित रखने के लिए हम नियमित रूप से खेत और मौसम की स्थिति पर नजर रखते हैं. लगभग हर आठ दिन में मौसम के मिजाज, तापमान और फसल की स्थिति का आकलन करके आवश्यकता के अनुसार क्रॉप-प्रोटेक्शन स्प्रे किया जाता है. हमारा न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट और क्रॉप-प्रोटेक्शन शेड्यूल किसी एक तय फार्मूले पर नहीं, बल्कि मौसम और फसल की वास्तविक जरूरत के अनुसार तय होता है. इसी वैज्ञानिक और सटीक प्रबंधन का परिणाम हमें उत्पादन में भी देखने को मिलता है. अलग-अलग मौसम में हमारी फसल का प्रदर्शन शानदार और संतुलित रहता है. गर्मी के मौसम में हार्वेस्ट होने वाले केले के प्रति पौधे से औसत 28 से 30 किलो का भारी-भरकम बंच प्राप्त होता है. वहीं बारिश के मौसम की हार्वेस्टिंग में औसतन 25 से 27 किलो और सर्दियों में हार्वेस्ट होने वाली फसल से लगभग 21 से 23 किलो प्रति पौधा का अच्छा वजन आसानी से प्राप्त हो जाता है. मेरे अनुभव में, केले की खेती में यह पूरा खेल मौसम के मिजाज और सही समय पर की गई देखभाल के तालमेल का है. जब मौसम को समझ कर पौधे को सही समय पर सही मात्रा में पानी, पोषण और सुरक्षा दी जाती है, तो इसका सीधा असर बंच के आकार, वजन और गुणवत्ता पर दिखाई देता है.
जैन टिश्यू कल्चर पौधे की क्षमता जबरदस्त – दूसरी किस्मों की तुलना में जैन टिश्यू कल्चर केले के पौधे अधिक मजबूत, टिकाऊ और मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने वाले दिखाई देते हैं. इनकी सहनशीलता और अच्छी वृद्धि क्षमता के कारण मौसम में अचानक होने वाले बदलावों या पोषक तत्वों की कमी का असर अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है. पौधों में पूरे फसल चक्र के दौरान गहरा हरापन और बेहतर हरियाली बनी रहती है. इसका सकारात्मक प्रभाव बंच के विकास, फलों के आकार, गुणवत्ता और अंतिम वजन पर दिखाई देता है. यही कारण है कि सही न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट, मौसम की समझ और समय पर क्रॉप-प्रोटेक्शन के साथ जैन टिश्यू कल्चर केले की खेती में हमें बेहतर गुणवत्ता के साथ लगातार अच्छा उत्पादन प्राप्त होता है।
जैन ड्रिप से पानी और पोषण का सटीक प्रबंधन – मेरे पूरे खेत में जैन ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगा हुआ है और पिछले अनुभव के आधार पर कहूँ तो इस सिस्टम ने मेरी खेती को अधिक व्यवस्थित, प्रभावी और वैज्ञानिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. खासतौर पर केले की फसल में पानी और पोषक तत्वों का सही प्रबंधन बहुत महत्वपूर्ण होता है, और इस मामले में जैन ड्रिप सिस्टम का अनुभव मेरे लिए बेहद शानदार रहा है. इस ड्रिप इरिगेशन सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत मुझे इसका सटीक और संतुलित वॉटर फ्लो लगता है. ड्रिपर से प्रति घंटे जितने पानी के डिस्चार्ज का दावा किया जाता है, खेत में भी लगभग उसी के अनुरूप पौधों तक पानी पहुँचता है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि हर पौधे को उसकी जरूरत के अनुसार समान और नियंत्रित मात्रा में पानी मिलता है. इससे कहीं ज्यादा पानी जमा होने या कहीं कम नमी रहने जैसी समस्या कम होती है और सिंचाई का बेहतर प्रबंधन संभव होता है. हम इसी ड्रिप सिस्टम के माध्यम से फर्टीगेशन भी करते हैं. पानी के साथ आवश्यक खाद और पोषक तत्व सीधे पौधों की जड़ क्षेत्र तक पहुँचाए जाते हैं. इससे पोषक तत्वों का वितरण अधिक समान रहता है और पौधों को उनकी जरूरत के अनुसार पोषण देना आसान हो जाता है. खासकर केले जैसी फसल में, जहां पूरे फसल चक्र के दौरान पोषण की लगातार जरूरत रहती है, यह व्यवस्था काफी उपयोगी साबित होती है.
ड्रिप इरिगेशन की वजह से हमारे लिए पानी की बचत के साथ-साथ समय और श्रम की भी बचत होती है. पारंपरिक सिंचाई की तुलना में खेत के हर हिस्से में पानी पहुँचाने की प्रक्रिया अधिक नियंत्रित रहती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सिंचाई को मौसम, मिट्टी की स्थिति और पौधे की अवस्था के अनुसार आसानी से समायोजित किया जा सकता है. खेती में केवल अच्छी तकनीक लगाना पर्याप्त नहीं होता; उस तकनीक का सही तरीके से इस्तेमाल और समय-समय पर उसका उचित मार्गदर्शन भी उतना ही जरूरी है. इस मामले में जैन इरिगेशन की टीम का निरंतर सहयोग मुझे काफी उपयोगी लगा है. जैन ड्रिप इरिगेशन सिर्फ सिंचाई की एक तकनीक नहीं है, बल्कि आधुनिक और वैज्ञानिक खेती का एक महत्वपूर्ण आधार बन चुका है. आज मेरे खेत में सटीक सिंचाई, संतुलित फर्टीगेशन और निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन इन तीनों का अच्छा तालमेल देखने को मिलता है.
खेती ने बदली आर्थिक स्थिति और जीवनशैली – शुरुआत में मुझे भी लगता था कि खेती करना बेहद कठिन और जोखिम भरा काम है. लेकिन जब मैंने खुद खेती के मैदान में उतरकर उसे वैज्ञानिक तरीके से करना शुरू किया, तब मेरी सोच पूरी तरह बदल गई. मुझे महसूस हुआ कि खेती सिर्फ गुजारे का साधन नहीं है, बल्कि एक शानदार, सम्मानजनक और टिकाऊ करियर भी बन सकती है. पिछले छह वर्षों में खेती ने मेरे जीवन में जो सामाजिक और आर्थिक बदलाव लाया है, वह मेरे लिए सचमुच अकल्पनीय है. इसी खेती की कमाई से मैंने दो एकड़ नई जमीन खरीदी है. रहने के लिए प्लॉट लिया, अपना पक्का मकान बनवाया, नई कार खरीदी और खेतों में पानी की स्थायी व्यवस्था के लिए कुएँ भी बनवाए. खेती ने मुझे सिर्फ आर्थिक मजबूती नहीं दी, बल्कि मेरे आत्मविश्वास और सामाजिक प्रतिष्ठा को भी एक नई पहचान दी है. कभी-कभी मैं यह भी सोचता हूँ कि अगर मैं 20 लाख रुपये के सालाना पैकेज वाली नौकरी कर रहा होता, तो इतने कम समय में अपने जीवन में इतना बड़ा और सकारात्मक बदलाव नहीं ला पाता.
उतार-चढ़ाव के बावजूद खेती में डटे रहे – हालांकि , मैं यह भी मानता हूँ कि खेती में हर बार लागत का तीन गुना मुनाफा नहीं मिलता. कई बार परिस्थितियाँ हमारे पक्ष में नहीं होतीं और नुकसान भी उठाना पड़ता है. कभी मौसम साथ देता है, तो कभी खराब मौसम चुनौती बन जाता है. कभी बाजार में अच्छे भाव मिलते हैं, तो कभी कीमतों में गिरावट आ जाती है. ऐसे समय में निराश होकर पीछे हटने के बजाय डटे रहना और परिस्थितियों से सीखना ज्यादा जरूरी है. अगर फसल का चुनाव सही हो, बाजार की जानकारी लगातार अपडेट रखी जाए और फसल की जरूरत के अनुसार बीमारी एवं कीट प्रबंधन, सही फर्टीगेशन, सिंचाई और समय पर क्रॉप-प्रोटेक्शन का ध्यान रखा जाए, तो खेती में बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं. खेती को सिर्फ खेती नहीं, बल्कि एक बिजनेस की तरह देखना. जिस तरह कोई व्यवसायी अपने बिजनेस में सही जगह निवेश करता है, उसी तरह किसान को भी मिट्टी, पानी, पोषण, तकनीक और फसल प्रबंधन में सोच-समझकर निवेश करना चाहिए. खेती जोखिम जरूर है, लेकिन सही ज्ञान, आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक प्रबंधन और धैर्य के साथ यही खेती एक मजबूत, सम्मानजनक और समृद्ध भविष्य की नींव बन सकती है.
सीखने और सिखाने से आगे बढ़ता किसान – मेरी कोशिश हमेशा रही है कि सीखने और सिखाने का यह सिलसिला कभी न रुके. मैं खुद भी दूसरे किसानों के खेतों पर जाकर उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी देता हूँ और साथ ही अनुभवी किसानों से नई तकनीक, नए प्रयोग और बेहतर प्रबंधन के तरीके सीखता रहता हूँ. मेरा मानना है कि खेती में ज्ञान जितना साझा किया जाता है, उतना ही बढ़ता है. मेरी इस पूरी कृषि यात्रा में जैन इरिगेशन के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. के. बी. पाटील सर और डॉ. अनिल पाटील सर का मार्गदर्शन लगातार मिलता रहा है. इसके साथ ही संतोष लखेटा जी और मधुभाऊ पाटीदार जी का सहयोग भी मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है. इन सभी के मार्गदर्शन और सहयोग ने मुझे खेती को सिर्फ परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय के रूप में देखने की दृष्टि दी. कृषि क्षेत्र में हो रहे नए प्रयोगों, तकनीकों और शोध से खुद को अपडेट रखने के लिए हम हर दो-तीन महीने में जैन हिल्स, जलगाँव भी जाते हैं. वहाँ विशेषज्ञों से चर्चा, नई तकनीकों की जानकारी और दूसरे किसानों के अनुभवों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है. यही निरंतर सीखने की प्रक्रिया आज भी मेरी खेती को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देती है.
मिट्टी की खुशबू से पुरस्कार तक का सफर – कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए मुझे इस वर्ष प्रतिष्ठित “अमित उद्यान रत्न पुरस्कार” से सम्मानित किया गया. यह पुरस्कार प्रगतिशील किसानों को दिया जाता है. 30 मई 2026 को हरियाणा के कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा द्वारा करनाल में मुझे यह पुरस्कार प्रदान किया गया. मेरे लिए यह सम्मान केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि पिछले कई वर्षों की मेहनत, सीख और संघर्ष की पहचान है. मायानगरी मुंबई की चकाचौंध से शुरू हुआ मेरा सफर आज मिट्टी की खुशबू, खेतों की हरियाली और सफलता की नई पहचान तक पहुँच चुका है. कभी जिस खेती को मैं कठिन और जोखिम भरा काम समझता था, आज वही खेती मेरे जीवन की सबसे बड़ी ताकत और पहचान बन चुकी है. यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं है। यह हर उस किसान के लिए एक संदेश है, जो अपनी मिट्टी पर विश्वास रखता है और कुछ नया करने का साहस करता है।
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