राज्य कृषि समाचार (State News)

बैतूल प्राकृतिक खेती, आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर

07 सितंबर 2026, बैतूल(कृषक जगत)बैतूल प्राकृतिक खेती, आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर – जिला प्राकृतिक खेती: समृद्ध पर्यावरण और आत्मनिर्भर किसान की ओर अग्रसर है। यह जिला सतपुड़ा के पहाड़ में स्थित 10,07,800 हे. में फैला देश के हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश का जनजातीय बाहुल्य हैं एवं भौगोलिक स्थिति, समृद्ध जनजातीय संस्कृति और प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के लिए जाना जाता है।


वर्तमान में जहां रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो रही है और खेती की लागत बढ़ रही है, वहीं बैतूल जिले में प्राकृतिक खेती एक वरदान और बड़े अवसर के रूप में उभर रही है। बैतूल जिले की मिट्टी, जलवायु और यहाँ का सामाजिक ताना-बाना प्राकृतिक खेती के लिए बेहद अनुकूल है:


• जिले का एक बड़ा हिस्सा वनों से आच्छादित है। जंगलों के आस-पास एवं जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों की जमीनों में प्राकृतिक रूप से ‘ह्यूमस’ और जैविक कार्बन की मात्रा अच्छी है, जो प्राकृतिक खेती का मुख्य आधार है।
जिले में गोंड और कोरकू जैसी जनजातियों की बाहुल्यता है। ये समुदाय सदियों से प्रकृति के करीब रहे हैं और आज भी इनके पास पारंपरिक खेती का ज्ञान सुरक्षित है, जिससे इन्हें रासायनिक खेती से प्राकृतिक खेती की ओर मोड़ना आसान है। यहाँ गेहूं, अरहर, धान, ज्वार, चना के साथ-साथ कोदो-कुटकी (श्रीअन्न/मिलेट्स), और सीताफल, आम एवं सब्जी जैसी बागवानी फसलें बड़े पैमाने पर होती हैं। इन सभी फसलों में प्राकृतिक इनपुट्स (जैसे जीवामृत, बीजामृत) का बेहतरीन परिणाम देखा जा सकता है।

इसी कड़ी में किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग अंतर्गत संचालित आत्मा परियोजना द्वारा, नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग योजना में जिले के वर्ष 2025-26 में कृषकों के 50 क्लस्टर बनाकर 6250 किसानों द्वारा 2500 हेक्ट. भूमि में प्राकृतिक खेती की जा रही है। कृषकों को प्राकृतिक आदान (जीवामृत, बीजामृत, निमास्त्र, अग्निअस्त्र, दशपर्णीअर्क आदि) की उपलब्धता हेतु जिले में 33 बायो इनपुट रिसोर्स सेंटर (बीआरसी) की स्थापना विभाग के द्वारा की गई है। जिससे प्राकृतिक खेती करने वाले कृषकों को आदान सामग्री सुगमता के साथ उपलब्ध कराई जा सके साथ ही इसके ब्रांडिंग, पैकिंग के माध्यम से रोजगार सृजन की संभावना को तलाशा जा रहा है।


प्राकृतिक खेती मुख्य रूप से ‘जीवामृत’, ‘बीजामृत’, ‘आच्छादन (मल्चिंग)’ और ‘वापसा’ पर टिकी है। बैतूल के संदर्भ में इसके निम्नलिखित फायदे हैं:

(1) कुल भौगोलिक क्षेत्र में से 480139 हे. क्षेत्र निरा फसली क्षेत्र है जिसमें 377821.37 हे. (78.61%) क्षेत्र सिंचित है। खरीफ 2026 में कुल 456100 हे. क्षेत्र में फसलें बोयी गयी है।

(2) खरीफ 2026 में जिले में कुल 98645 मै. टन रासायनिक उर्वरक का उपयोग किसानों द्वारा किया जा चुका है प्रति हेक्टर के मान से नत्र 74.14 किलो, स्फूर 20.49 किलो और पोटाश 6.60 किलो खेतों में डाला गया है। जिले में सर्वाधिक 315000 हे. में हाइब्रिड मक्के की फसल बोई गई है, जिसमें वैज्ञानिक अनुशंसा अनुसार प्रति हे. 120 किलो नत्र, 60 किलो स्फूर और 40 किलो पोटाश की जरूरत होती है। तुलनात्मक रूप से जिले की प्रति हे. खपत कम है।

• कम लागत, अधिक लाभ: बैतूल के छोटे और सीमांत किसानों के लिए बाजार से महंगे रासायनिक उर्वरक (यूरिया, डीएपी) और कीटनाशक खरीदना आर्थिक रूप से बोझ बनता जा रहा है। प्राकृतिक खेती में किसान घर के गोवंश (गाय के गोबर और गोमूत्र) से खुद खाद और कीट नियंत्रक तैयार करते हैं, जिससे लागत लगभग शून्य हो जाती है।

• जल संरक्षण: बैतूल के कई पठारी इलाकों में जल स्तर की समस्या रहती है। प्राकृतिक खेती में ‘मल्चिंग’ (मृदा आच्छादन) के कारण जमीन में नमी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे सिंचाई के लिए पानी की आवश्यकता 50% से 60% तक कम हो जाती है। मिलेट्स (श्रीअन्न) को बढ़ावा: जिले के भीमपुर, भैंसदेही और शाहपुर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कोदो-कुटकी और ज्वार-बाजरा की खेती की अपार संभावनाएं हैं। इन फसलों की पैदावार यदि पूर्णतः प्राकृतिक तरीके से प्राप्त करें तो इनकी वैश्विक मांग और कीमत दोनों वैश्विक बाजारों तक उनकी पहुंच बढ़ाकर अधिक लाभ प्राप्त करने की ओर प्रयास किये जा रहे हैं। वि.खं. शाहपुर स्थित सतपुड़ांचल फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रही है।


जिले में संभावनाएं और उभरते बाजार

बैतूल में प्राकृतिक उत्पादों के लिए एक बेहतरीन इकोसिस्टम हेतु प्रयास-

• सीताफल और बागवानी में असीम संभावनाएं: जिले के मुलताई और प्रभातपट्टन क्षेत्र को सीताफल एवं बागवानी का गढ कहा जाता है। रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से साग सब्जी में रसायनों के अवशेष से मानव स्वास्थ्य पर विपरीत असर हो रहा है। यहाँ प्राकृतिक खेती को बढावा देकर उद्यानिकी फसलों की गुणवत्ता में सुधार लाया जा रहा है जिससे स्वाद, चमक और शेल्फ-लाइफ (भंडारण क्षमता) बढेगी ि‍नर्यात के अवसर खुलेंगे।

• शहरी और नजदीकी बाजारों की उपलब्धता: बैतूल भौगोलिक रूप से नागपुर, अमरावती (महाराष्ट्र) और भोपाल जैसे बड़े शहरों से रेल और सड़क मार्ग द्वारा सीधे जुड़ा हुआ है। इन महानगरों में जैविक और प्राकृतिक अनाज, दालों, और सब्जियों की भारी मांग है। किसान सीधे ‘फार्म टू टेबल’ मॉडल से जुड़कर मुनाफा कमा सकते हैं। इस ओर प्रयास किये जा रहे हैं।

• कृषि पर्यटन जिले के सुंदर ग्रामीण इलाकों को प्राकृतिक खेती के मॉडल के रूप में विकसित कर कृषि पर्यटन को बढ़ावा दिये जाने हेतु जिला प्रशासन प्रयासरत है जिससे किसानों को अतिरिक्त आय होगी। प्रस्तुति – सुरेंद्र परहाते परियोजना संचालक आत्मा एवं विकासखण्ड तकनीकी प्रबंधक नितीन जैसवाल, विजेंद्र वाईकर ।

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