भारतीय कृषि में सुधार क्यों नहीं हो पाते?
लेखक: प्रवेश शर्मा, अध्यक्ष, स्टीयरिंग कमेटी, नेशनल एसोसिएशन फॉर फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन्स (NAFPO)
02 जून 2026, नई दिल्ली: भारतीय कृषि में सुधार क्यों नहीं हो पाते? – भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद उद्योग, व्यापार, वित्त और सेवा क्षेत्रों में व्यापक बदलाव देखने को मिले, लेकिन कृषि क्षेत्र आज भी लगभग उसी नीतिगत ढांचे में काम कर रहा है जो सुधारों से पहले मौजूद था। यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर आज भी नीति निर्माताओं और कृषि विशेषज्ञों को तलाशना पड़ रहा है कि आखिर कृषि सुधारों का रास्ता इतना कठिन क्यों है।

हालांकि समय-समय पर मंडी व्यवस्था में बदलाव, सब्सिडी वितरण की नई प्रणालियां और पीएम-किसान जैसी प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण योजनाएं लागू की गईं, लेकिन कृषि की मूलभूत संरचना में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ। वर्ष 2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों को भी व्यापक विरोध के बाद वापस लेना पड़ा। इससे स्पष्ट होता है कि कृषि सुधारों को लेकर देश में एक प्रकार की नीतिगत जड़ता बनी हुई है।
कृषि की राजनीतिक अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी बाधा
भारतीय कृषि की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए उसकी राजनीतिक अर्थव्यवस्था को समझना आवश्यक है। कृषि में भूमि, श्रम और पूंजी जैसे उत्पादन के प्रमुख साधनों से जुड़े बाजार आज भी काफी हद तक पुराने ढर्रे पर चलते हैं।
भूमि सुधारों की बात करें तो स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन और काश्तकारी सुधारों को ऐतिहासिक कदम माना गया था। लेकिन वास्तविकता यह है कि आज भी बड़ी संख्या में किसान किराये पर भूमि लेकर खेती करते हैं, जबकि उनके पास कानूनी मान्यता या सुरक्षा नहीं होती। ऐसे किसानों को बैंक ऋण, फसल बीमा और सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। भूमि पर अधिकार की अनिश्चितता के कारण वे दीर्घकालिक निवेश करने से भी बचते हैं, जिससे कृषि उत्पादकता प्रभावित होती है।
अधिकांश राज्यों में प्रभावी भूमि पट्टा कानून नहीं हैं। भूमि स्वामित्व में असमानता और स्थानीय राजनीति में बड़े भूमिधारकों के प्रभाव के कारण किरायेदार किसानों के हितों की अनदेखी होती रही है। यही वजह है कि कृषि भूमि के उपयोग से जुड़े सुधार आगे नहीं बढ़ पाते।
मशीनीकरण के प्रति झिझक ने बढ़ाई चुनौतियां
भारतीय कृषि में श्रम बाजार भी कई संरचनात्मक समस्याओं से घिरा हुआ है। सरकारों ने बीज, सिंचाई और उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा दिया, लेकिन बड़े पैमाने पर मशीनीकरण को लेकर हमेशा सावधानी बरती गई। इसका प्रमुख कारण ग्रामीण रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव को माना गया।
हालांकि आज ग्रामीण क्षेत्रों में फसल की बुवाई और कटाई जैसे महत्वपूर्ण समय पर मजदूरों की कमी एक आम समस्या बन चुकी है। इसके बावजूद मशीनीकरण की गति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी। इसका नतीजा यह हुआ कि भारत की कृषि उत्पादकता कई विकसित कृषि अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर चीन, से पीछे रह गई। छोटे और सीमांत किसानों के पास महंगे कृषि यंत्र खरीदने की क्षमता नहीं होती और उन्हें कस्टम हायरिंग जैसी सुविधाएं भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं।
पूंजी की कमी और साहूकारी का दबदबा
कृषि क्षेत्र में पूंजी की उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। संस्थागत ऋण विस्तार की नीतियों के बावजूद लाखों किसान आज भी साहूकारों, बड़े किसानों और मंडी व्यापारियों पर निर्भर हैं। मंडी व्यापारी कम ब्याज पर बैंक से ऋण लेकर किसानों को अधिक ब्याज दर पर उधार देते हैं।
ऐसी अनौपचारिक वित्तीय व्यवस्था किसानों को कर्ज के बोझ में दबाए रखती है और कृषि में निवेश की क्षमता को सीमित करती है। पारंपरिक ग्रामीण पूंजी संरचनाएं प्रतिस्पर्धा और नवाचार के बजाय अपने प्रभुत्व को बनाए रखने में अधिक रुचि रखती हैं। यही कारण है कि सहकारी संस्थाओं, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और माइक्रोफाइनेंस मॉडल को मजबूत करने के कई प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए।
सस्ते खाद्य पदार्थों की नीति किसानों पर भारी
भारतीय कृषि नीति में एक और महत्वपूर्ण पहलू है—खाद्य महंगाई को नियंत्रित रखने का दबाव। शहरी उपभोक्ताओं को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने के लिए सरकारें अक्सर कृषि बाजारों में हस्तक्षेप करती हैं। कीमतें बढ़ने पर निर्यात प्रतिबंध लगाए जाते हैं, भंडारण सीमाएं तय की जाती हैं और आयात को बढ़ावा दिया जाता है।
इन कदमों से अल्पकाल में उपभोक्ताओं को राहत मिलती है, लेकिन किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। दालों और खाद्य तेलों के मामले में यह स्थिति बार-बार देखने को मिलती है। सरकार किसानों को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती है, लेकिन जब कीमतें बढ़ती हैं तो सस्ते आयात के जरिए बाजार में दखल देती है। इससे किसानों का निवेश प्रभावित होता है और वे जोखिम उठाने से बचते हैं।
सुधारों के प्रति राजनीतिक अनिच्छा
इन सभी कारणों ने मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बना दी है जिसमें यथास्थिति बनाए रखना राजनीतिक रूप से अधिक सुविधाजनक माना जाता है। कृषि सुधारों के लाभ लंबे समय बाद दिखाई देते हैं, जबकि उनके राजनीतिक जोखिम तुरंत सामने आ जाते हैं। इसलिए अधिकांश राजनीतिक दल और सरकारें सुधारों की बात तो करती हैं, लेकिन उन्हें लागू करने से बचती हैं।
चीन से क्या सीख सकता है भारत?
चीन का अनुभव बताता है कि कृषि सुधारों की शुरुआत भूमि उपयोग, ऋण सुविधा और मशीनीकरण जैसे बुनियादी क्षेत्रों से की जानी चाहिए। इन सुधारों से वहां उत्पादकता और किसानों की आय में तेजी से वृद्धि हुई, जिससे आगे के सुधारों का रास्ता आसान हुआ।
भारत में भी भूमि पट्टा व्यवस्था को कानूनी मान्यता देने, किसानों को संस्थागत ऋण तक बेहतर पहुंच उपलब्ध कराने और साझा कृषि मशीनरी ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता है। साथ ही व्यापार और मूल्य निर्धारण से जुड़ी नीतियों में स्थिरता लानी होगी ताकि किसान अचानक होने वाले नीतिगत बदलावों से प्रभावित न हों।
किसानों को केवल उपभोक्ताओं के लिए सस्ता भोजन उपलब्ध कराने का साधन नहीं समझना होगा
लेखक का मानना है कि जब तक किसानों को केवल शहरी उपभोक्ताओं के लिए सस्ता भोजन उपलब्ध कराने का माध्यम माना जाता रहेगा, तब तक वास्तविक कृषि सुधार संभव नहीं होंगे। किसानों को एक आर्थिक इकाई के रूप में देखना होगा, जिन्हें स्थिर आय, निवेश का अवसर और विकास के लिए अनुकूल वातावरण चाहिए।
आज जब वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखलाओं को लेकर अनिश्चितताएं बढ़ रही हैं, तब कृषि सुधार केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता भी बन चुके हैं।
NAFPO के बारे में
नेशनल एसोसिएशन फॉर फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन्स (NAFPO) एक राष्ट्रीय स्तर का गैर-लाभकारी संगठन है, जो किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को मजबूत बनाने और छोटे किसानों की आय एवं आजीविका में सुधार के लिए काम करता है। संगठन का मानना है कि यदि किसानों को संगठित संस्थाओं के माध्यम से बाजार, वित्त, तकनीक और प्रशिक्षण तक बेहतर पहुंच मिले, तो वे अधिक सशक्त और आत्मनिर्भर बन सकते हैं। NAFPO देशभर में एफपीओ को डिजिटल समाधान, क्षमता निर्माण कार्यक्रमों, नीतिगत सहयोग और बाजार संपर्क उपलब्ध कराने में मदद करता है। संगठन का उद्देश्य ऐसे किसान-नेतृत्व वाले संस्थानों का विकास करना है जो किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त करने, आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने और टिकाऊ कृषि विकास को बढ़ावा देने में सक्षम बनाएं। NAFPO का लक्ष्य कृषि क्षेत्र में समावेशी विकास को बढ़ावा देना है, ताकि छोटे और सीमांत किसान भी वित्तीय सेवाओं, नवाचारों और नए बाजार अवसरों का लाभ उठाकर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकें।
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