“मखाना” : पारंपरिक उत्पाद से वैश्विक सुपरफूड बनने का स्वर्णिम सफर
डॉ. दीपक कोहली
29 अगस्त 2026, नई दिल्ली: “मखाना” : पारंपरिक उत्पाद से वैश्विक सुपरफूड बनने का स्वर्णिम सफर – भारत में सदियों से व्रत-त्योहार और पारंपरिक खान-पान का हिस्सा रहा मखाना अब केवल एक पारंपरिक खाद्य पदार्थ नहीं रह गया है। स्वास्थ्य और पोषण के प्रति बढ़ती वैश्विक जागरूकता ने इसे दुनिया के बाजारों में तेजी से लोकप्रिय ‘सुपरफूड’ बना दिया है। फॉक्स नट्स, कमल गट्टा और वैज्ञानिक नाम यूरियाले फेरॉक्स (Euryale ferox) से पहचाना जाने वाला मखाना कम कैलोरी और पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण आज अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ताओं का ध्यान आकर्षित कर रहा है। इसकी बढ़ती मांग भारतीय किसानों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि निर्यात के लिए नए अवसरों का संकेत है।

बिहार बना मखाने का प्रमुख केंद्र
भारत मखाना उत्पादन में दुनिया के अग्रणी देशों में है और देश में इसका सबसे बड़ा उत्पादन केंद्र बिहार है। उत्तर बिहार के दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, कटिहार, पूर्णिया और सहरसा जैसे जिले मखाना उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र हैं। यहाँ की आर्द्र जलवायु, तालाब और दलदली भूमि मखाने के पौधे के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराते हैं।
बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भी मखाने की खेती का विस्तार हो रहा है। बिहार के मखाने को जीआई टैग मिलने से इसकी विशिष्ट पहचान और बाजार मूल्य को मजबूती मिली है। इससे स्थानीय उत्पाद को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अलग पहचान बनाने में मदद मिली है।
पोषण से बढ़ी लोकप्रियता
मखाने की वैश्विक लोकप्रियता का सबसे बड़ा आधार इसकी पोषण गुणवत्ता है। इसमें प्रोटीन, फाइबर और जटिल कार्बोहाइड्रेट के साथ कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, फास्फोरस और आयरन जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसमें वसा और सोडियम की मात्रा कम होती है तथा इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी अपेक्षाकृत कम माना जाता है।
इन्हीं खूबियों के कारण स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं के बीच मखाने की मांग तेजी से बढ़ी है। पारंपरिक भारतीय स्नैक से आगे बढ़कर यह अब क्लीन-लेबल, प्लांट-बेस्ड और हेल्थ फूड बाजार का हिस्सा बन रहा है। रोस्टेड, फ्लेवर्ड और पाउडर के रूप में इसके नए उत्पाद युवाओं और शहरी उपभोक्ताओं को आकर्षित कर रहे हैं।
तालाब से डाइनिंग टेबल तक का सफर
मखाने का उत्पादन और प्रसंस्करण बेहद श्रमसाध्य है। किसान और मजदूर पानी में उतरकर तालाबों की तलहटी से कांटेदार बीज निकालते हैं। इसके बाद बीजों की सफाई और धूप में सुखाने का काम होता है। सूखे बीजों को मिट्टी या लोहे की कड़ाही में तेज तापमान पर भुना जाता है। भुनाई के बाद पारंपरिक तरीके से लकड़ी के हथौड़ों से बीजों को फोड़कर उनके भीतर का सफेद गुदा निकाला जाता है। यही पॉप्ड मखाना बाजार में उपभोक्ताओं तक पहुँचता है।
इसके बाद ग्रेडिंग, साइजिंग, पॉलिशिंग और पैकेजिंग की जाती है। मखाने का आकार, सफेदी और गुणवत्ता उसकी बाजार कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बड़े और अधिक सफेद दानों को प्रीमियम श्रेणी में रखा जाता है।
वैश्विक बाजार में बढ़ती मांग
भारतीय मखाने की गुणवत्ता और विशिष्टता ने इसे वैश्विक बाजार में मजबूत पहचान दिलाई है। अमेरिका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात इसके प्रमुख बाजारों में शामिल हैं। यूरोप, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और मध्य पूर्व में भी इसकी मांग बढ़ रही है।
बदलती उपभोक्ता पसंद ने मखाने के लिए मूल्यवर्धित उत्पादों का बाजार तैयार किया है। चीज़ी, पेरी-पेरी और अन्य फ्लेवर्ड मखाने के साथ मखाना पाउडर जैसे उत्पाद निर्यात और घरेलू बाजार दोनों में नई संभावनाएँ खोल रहे हैं।
सरकारी पहल से नई उम्मीद
मखाना क्षेत्र की संभावनाओं को देखते हुए सरकार ने इसके विकास के लिए अनुसंधान, गुणवत्तापूर्ण बीज, किसानों के कौशल विकास, आधुनिक प्रसंस्करण, भंडारण, मशीनरी, ब्रांडिंग और निर्यात पर जोर दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर मखाना बोर्ड के गठन की घोषणा इस क्षेत्र को संस्थागत मजबूती देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इन पहलों का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मखाने की पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना है, ताकि किसानों को बेहतर बाजार और अधिक मूल्य मिल सके तथा प्रसंस्करण और निर्यात के नए अवसर पैदा हों।
चुनौतियाँ भी कम नहीं
मखाना क्षेत्र की संभावनाओं के साथ कई चुनौतियाँ भी हैं। पारंपरिक तालाब आधारित खेती में अत्यधिक शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है। पानी के भीतर से बीज निकालना कठिन होने के कारण श्रमिकों की कमी बड़ी समस्या बन रही है। इसके अलावा पारंपरिक प्रसंस्करण, अपर्याप्त भंडारण और मूल्य श्रृंखला में बिचौलियों की भूमिका किसानों के लाभ को प्रभावित करती है।
इन समस्याओं के समाधान के लिए मखाने की वैज्ञानिक और खेत-आधारित खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। तालाबों के बजाय समतल खेतों में नियंत्रित मात्रा में पानी भरकर मखाने की खेती की तकनीक विकसित की गई है। इससे खेती को अधिक व्यवस्थित और यंत्रीकृत बनाने के साथ उत्पादकता बढ़ाने की संभावनाएँ हैं।
पारंपरिक विरासत से वैश्विक पहचान तक
मखाने की कहानी भारत की पारंपरिक कृषि, स्थानीय ज्ञान और आधुनिक बाजार के सफल मेल की कहानी है। तालाबों और खेतों से निकलकर दुनिया के सुपरमार्केट और डाइनिंग टेबल तक पहुँचा मखाना आज भारतीय कृषि की नई संभावनाओं का प्रतीक बन चुका है।
बढ़ती घरेलू और वैश्विक मांग, वैज्ञानिक खेती, आधुनिक प्रसंस्करण, बेहतर ब्रांडिंग और सरकारी सहयोग के साथ मखाना आने वाले वर्षों में किसानों की आय बढ़ाने, ग्रामीण रोजगार पैदा करने और कृषि निर्यात को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह पारंपरिक भारतीय उत्पाद अब केवल देश की खाद्य संस्कृति का हिस्सा नहीं, बल्कि वैश्विक सुपरफूड के रूप में भारत की नई कृषि पहचान बनता जा रहा है।
प्रेषक: डॉ दीपक कोहली , पर्यावरणविद ,वरिष्ठ विज्ञान लेखक, विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश सचिवालय 5/104, विपुल खंड, गोमती नगर, लखनऊ- 226010(मोबाइल- 6389005559)
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