धान के बाद परती रहने वाली जमीन अब देगी सालभर आय, त्रिपुरा में मल्टी-टियर खेती का प्रयोग
15 सितंबर 2026, नई दिल्ली: धान के बाद परती रहने वाली जमीन अब देगी सालभर आय, त्रिपुरा में मल्टी-टियर खेती का प्रयोग – त्रिपुरा के ढलानदार और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जनजातीय किसान तेजी से रबर के बागान अपना रहे हैं, जबकि अन्य किसान बारिश के मौसम में धान की खेती करने के बाद बाकी समय जमीन को परती छोड़ देते हैं। इससे इन क्षेत्रों में जमीन का उपयोग सीमित रहने के साथ किसानों की उत्पादकता और आय के अवसर भी कम हो जाते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए भाकृअनुप–पूर्वी क्षेत्र के लिए अनुसंधान परिसर (ICAR-RCER), पटना की बहु-स्तरीय कृषि प्रणाली तकनीक का त्रिपुरा में प्रदर्शन किया जा रहा है।
यह तकनीक भाकृअनुप-आरलीईआर, एनईएच त्रिपुरा केन्द्र के सहयोग से उत्तर पूर्वी पर्वतीय (एनईएच) घटक के तहत प्रदर्शित की जा रही है। इसका उद्देश्य कम उपयोग में आने वाली धान-परती ऊंचाई वाली जमीन को सालभर उपयोग में लाकर उत्पादक और विविधीकृत खेतों में बदलना है।

सागौन, आम और बेर के साथ बहु-स्तरीय खेती
इस कृषि प्रणाली में ऊपरी स्तर पर सागौन, मध्य स्तर पर आम और अतिरिक्त फल घटक के रूप में बेर को उपयुक्त अंतरवर्तीय फसलों के साथ लगाया जाता है। इससे उपलब्ध जमीन, सूर्य के प्रकाश, मृदा नमी और अन्य कृषि संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। साथ ही अलग-अलग समय पर किसानों को आय के कई स्रोत मिल सकते हैं।
पश्चिम त्रिपुरा के हेजामारा ब्लॉक के बरकाठाल गांव की जनजातीय किसान श्रीमती स्वर्णा देबबर्मा भी इस तकनीक से लाभान्वित हो रही हैं। वह परंपरागत रूप से बारिश के मौसम में ऊंचाई वाली जमीन पर धान की खेती करती थीं और इसके बाद जमीन परती छोड़ देती थीं। इस हस्तक्षेप के जरिए उनकी जमीन को अब विविधीकृत बारहमासी आधारित उत्पादन प्रणाली में लाया जा रहा है, जिससे पूरे साल जमीन का बेहतर उपयोग हो सकेगा।
रबर और धान-परती प्रणाली का विकल्प
भाकृअनुप-आरलीईआर, पटना के निदेशक डॉ. अनूप दास ने कहा कि यह तकनीक त्रिपुरा में प्रमुख रबर-आधारित और धान-परती प्रणालियों के लिए एक व्यवहार्य विकल्प हो सकती है। इन प्रणालियों में कीमतों में उतार-चढ़ाव और भूमि की गुणवत्ता से जुड़ी चिंताएं जैसी चुनौतियां हैं। उन्होंने बताया कि इस प्रणाली से मध्यम अवधि में फलों से और लंबी अवधि में इमारती लकड़ी से आय मिलने की संभावना है। इसके साथ ही यह संसाधनों के बेहतर उपयोग और संरक्षण को भी बढ़ावा देती है।
किसानों और कर्मचारियों को दिया गया प्रशिक्षण
इस पहल के तहत सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के लिए सेवन सिस्टर्स (SeSTA) के अधिकारियों को भाकृअनुप-आरलीईआर की टीम ने प्रणाली की योजना, लेआउट तैयार करने और पौधरोपण तकनीकों का प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षित कर्मचारी अब जमीनी स्तर पर इसके क्रियान्वयन में सहयोग कर रहे हैं और किसानों को इस तकनीक को अपनाने में मदद कर रहे हैं। इस प्रणाली में शुरुआती और स्थापना चरण के दौरान अंतरवर्तीय फसलों से मौसमी आय मिल सकती है। आगे चलकर आम और बेर से फल आय तथा सागौन से दीर्घकालिक आय मिलने की उम्मीद है।
9 किसानों के साथ 3 हेक्टेयर में प्रदर्शन
वर्तमान में इस तकनीक का प्रदर्शन 9 किसानों के साथ करीब 3 हेक्टेयर क्षेत्र में किया जा रहा है। क्षेत्रीय प्रदर्शन के दौरान 20 किसानों ने भाग लिया। इससे टिकाऊ ऊंचाई वाली कृषि और त्रिपुरा में जनजातीय किसानों की आजीविका के लिए इस प्रणाली और इसके संभावित लाभों की जानकारी व्यापक स्तर पर पहुंची।
यह पहल वैज्ञानिक योजना, क्षमता निर्माण और स्थानीय विकास संगठनों के सहयोग के जरिए वर्षा आधारित ऊंचाई वाले क्षेत्रों की उत्पादकता और आर्थिक व्यवहार्यता बढ़ाने की दिशा में बहु-स्तरीय कृषि प्रणाली की क्षमता को दर्शाती है।
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