CAZRI जोधपुर की 4 किस्मों ने दिखाई गजब की सहनशीलता, 35 दिन के सूखे में भी लहलहाती रही मोठ की फसल
15 सितंबर 2026, नई दिल्ली: CAZRI जोधपुर की 4 किस्मों ने दिखाई गजब की सहनशीलता, 35 दिन के सूखे में भी लहलहाती रही मोठ की फसल – पश्चिमी राजस्थान के गर्म और शुष्क इलाकों में मोठ बीन की खेती करीब 10 लाख हेक्टेयर में होती है, लेकिन इसकी औसत पैदावार करीब 350 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ही है। 150 से 250 एमएम की अनिश्चित बारिश, 20 से 30 दिनों के लंबे सूखे और मिट्टी में नमी की कमी के कारण फसल की उत्पादकता प्रभावित होती है। ऐसे में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI), जोधपुर की विकसित मोठ की चार किस्मों ने 35 दिनों के लंबे सूखे में भी बेहतर सहनशीलता और बढ़वार दिखाकर अपनी क्षमता साबित की है।
काजरी ने विकसित कीं चार किस्में
CAZRI ने शुष्क क्षेत्रों की कठिन और अनिश्चित परिस्थितियों के अनुकूल मोठ की किस्में विकसित करने के लिए लंबे समय से ब्रीडिंग और आनुवंशिक सुधार कार्यक्रम चलाया है। इसी के तहत पिछले तीन वर्षों में काजरी मोठ-4, काजरी मोठ-5, काजरी मोठ-6 और काजरी मोठ-7 किस्में जारी की गई हैं। खरीफ 2026 में इन किस्मों ने करीब 35 दिनों के लंबे सूखे और नमी की भारी कमी के बावजूद खेत में अपनी मजबूती दिखाई। 3 अगस्त से 7 सितंबर के बीच 35 दिनों तक बारिश का लंबा सूखा दौर रहा। इस दौरान 180 एमएम वाष्पीकरण दर्ज किया गया।
ऊपरी मिट्टी की नमी 16 से घटकर 5-6 प्रतिशत हुई
2 अगस्त को हुई 86 एमएम की आखिरी अच्छी बारिश तक 0-10 सेंटीमीटर की ऊपरी मिट्टी में नमी 15-16 प्रतिशत थी। इसके बाद एक महीने से अधिक समय तक सूखा पड़ा और 2.5 एमएम से कम की तीन-चार मामूली बूंदाबांदी के कारण ऊपरी मिट्टी की नमी घटकर 5-6 प्रतिशत रह गई। वहीं 10-40 सेंटीमीटर की निचली परत में नमी 23 प्रतिशत से घटकर 16 प्रतिशत हुई। इससे फसल की पानी की जरूरत पूरी करने और लंबे सूखे का सामना करने में मदद मिली।
सही फसल प्रबंधन से मिली अतिरिक्त मदद
इन किस्मों के बेहतर प्रदर्शन में फसल प्रबंधन तकनीकों की भी अहम भूमिका रही। जुलाई में मानसून आते ही समय पर बुआई, 45×10 सेंटीमीटर की पौध दूरी, बुआई के 20 दिन बाद नमी संरक्षण के लिए यांत्रिक गुड़ाई और मशीन व हाथों से निराई-गुड़ाई कर खरपतवार नियंत्रण किया गया। उपलब्ध नमी का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए पत्तों के उचित फैलाव पर भी ध्यान दिया गया। प्रयोगात्मक खेतों की उर्वरता भी काफी कम थी। यहां जैविक कार्बन 0.13-0.18 प्रतिशत, मिट्टी का pH 7.9-8.1, उपलब्ध नाइट्रोजन 90-100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, फास्फोरस 10-15 किलोग्राम और पोटेशियम 250-260 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर था।
30 दिन में फलने-फूलने की क्षमता
इन किस्मों की खासियत उनकी डेवलपमेंटल प्लास्टिसिटी है। ये बुआई के करीब 30 दिनों के भीतर फलने-फूलने लगती हैं और मिट्टी में उपलब्ध नमी के अनुसार अपनी बढ़वार और पकने के समय को ढाल सकती हैं। यही क्षमता पश्चिमी राजस्थान जैसे इलाकों में महत्वपूर्ण है, जहां बारिश की मात्रा और समय में काफी उतार-चढ़ाव रहता है। लंबे सूखे के बावजूद बुआई के करीब 55 दिन बाद खेत में हरियाली, अच्छा फैलाव और फलियों से लदे पौधे दिखाई दिए। यह इन किस्मों की सूखा सहने और प्रतिकूल परिस्थितियों में बढ़वार बनाए रखने की क्षमता को दर्शाता है।
बीज उत्पादन बढ़ाने पर जोर
CAZRI की इन चारों किस्मों का बड़े स्तर पर बीज उत्पादन किया जा रहा है। वर्ष 2026 के लिए साथी पोर्टल के माध्यम से 23.32 क्विंटल बीज की मांग दर्ज हुई है। इसे पूरा करने के लिए CAZRI रिसर्च फार्म की सात हेक्टेयर जमीन पर बीज उत्पादन चल रहा है। वर्ष 2025 में इन चारों किस्मों के लिए साथी पोर्टल के जरिए कुल 63.2 क्विंटल बीज की मांग दर्ज हुई थी। वर्तमान में इनका बीज उत्पादन राजस्थान राज्य बीज निगम (RSSC), राष्ट्रीय बीज निगम (NSC) और कुछ चुनिंदा निजी कंपनियां कर रही हैं।
कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने कहा कि मोठ बीन थार मरुस्थल की एक अनूठी फसल है। उनके अनुसार, काजरी की जलवायु-अनुकूल मोठ की किस्में थार मरुस्थल को समृद्ध बनाने, किसानों के लिए आय के नए अवसर पैदा करने और दालों में आत्मनिर्भरता हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
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