राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

भारत का चीनी उद्योग 2026: चीनी उत्पादन, कीमतें, इथेनॉल और बाजार का हाल

27 अगस्त 2026, नई दिल्ली: भारत का चीनी उद्योग 2026: चीनी उत्पादन, कीमतें, इथेनॉल और बाजार का हाल – भारत का चीनी उद्योग देश की कृषि अर्थव्यवस्था, ग्रामीण रोजगार और जैव ईंधन क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह उद्योग लाखों गन्ना किसानों को चीनी मिलों, प्रसंस्करण, ऊर्जा उत्पादन तथा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय चीनी बाजारों से जोड़ता है।

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक देश है। गन्ना क्षेत्र लगभग 5 करोड़ किसानों तथा चीनी मिलों और इससे जुड़े उद्योगों में करीब 5 लाख श्रमिकों की आजीविका का आधार है।

एक नजर में भारत का चीनी क्षेत्र

पिछले एक दशक में भारत में गन्ने का उत्पादन उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी 2025-26 के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, देश में गन्ने का उत्पादन 500 मिलियन टन (MMT) तक पहुंचने का अनुमान है। 2015-16 में यह उत्पादन 348.44 MMT था। इस प्रकार पिछले 10 वर्षों में गन्ना उत्पादन में लगभग 43.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

गन्ने की खेती के क्षेत्रफल में भी वृद्धि हुई है। यह 2015-16 में 49.27 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2025-26 में 58.87 लाख हेक्टेयर हो गया है।

उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र भारत के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य बने हुए हैं।

भारत के चीनी निर्यात में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। 2025-26 में भारत ने 8 लाख टन चीनी का निर्यात किया, जबकि 2016-17 में यह मात्रा केवल 0.47 लाख टन थी। भारतीय चीनी के प्रमुख निर्यात बाजारों में श्रीलंका, पश्चिम एशिया और पूर्वी अफ्रीका शामिल हैं।

2026-27 के चीनी सीजन के लिए सरकार ने गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (Fair and Remunerative Price — FRP) ₹365 प्रति क्विंटल निर्धारित किया है। यह मूल्य 10.25 प्रतिशत की मूल चीनी रिकवरी दर से जुड़ा है। इसकी तुलना में 2016-17 के चीनी सीजन में FRP ₹230 प्रति क्विंटल था और मूल रिकवरी दर 9.5 प्रतिशत निर्धारित की गई थी।

सरकार के अनुसार, देश में चीनी का पर्याप्त बफर स्टॉक उपलब्ध है और घरेलू खपत की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनी हुई है।

चीनी और इथेनॉल: तेजी से विविधीकृत होती मूल्य श्रृंखला

भारत का चीनी उद्योग देश के इथेनॉल कार्यक्रम के साथ तेजी से एकीकृत हुआ है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना, ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और कृषि उत्पादों के लिए अतिरिक्त बाजार तैयार करना है।

इस बात को लेकर चिंता व्यक्त की जाती रही है कि इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के उपयोग से घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता कम हो सकती है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी का हिस्सा हाल के वर्षों में वास्तव में कम हुआ है।

चीनी को इथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट करने का हिस्सा 2022-23 में लगभग 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में करीब 9 प्रतिशत रह गया है।

इसके अलावा, भारत में उत्पादित इथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, विशेष रूप से मक्का, से आता है, न कि केवल गन्ना आधारित फीडस्टॉक से।

फिर भी, इथेनॉल कार्यक्रम ने चीनी उद्योग की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत में सामान्यतः हर वर्ष लगभग 300-340 लाख टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत करीब 280-290 लाख टन रहती है।

अधिक उत्पादन वाले वर्षों में अतिरिक्त चीनी का स्टॉक चीनी मिलों की कार्यशील पूंजी को रोक सकता है और गन्ना किसानों को भुगतान में देरी का कारण बन सकता है। अतिरिक्त चीनी को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने की क्षमता ने चीनी के लिए एक वैकल्पिक बाजार उपलब्ध कराया है। इससे मिलों की नकदी स्थिति और व्यापक वित्तीय स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद मिली है।

20 अगस्त 2026 तक, 2025-26 चीनी सीजन के गन्ना किसानों के करीब 97 प्रतिशत बकाये का भुगतान किया जा चुका था।

चीनी मिलों की बेहतर वित्तीय स्थिति ने सरकारी सहायता पर उनकी निर्भरता को भी कम किया है। वहीं, लंबी अवधि में उपभोक्ताओं के लिए खुदरा चीनी कीमतें भी व्यापक रूप से स्थिर रही हैं। अगस्त 2024 से जुलाई 2026 के बीच चीनी की खुदरा कीमतों में सालाना आधार पर लगभग 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

हाल में चीनी की कीमतें क्यों बढ़ी हैं?

हाल के सप्ताहों में भारत में चीनी की कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। चीनी की औसत कीमत 20 जुलाई 2026 को ₹48.18 प्रति किलोग्राम से बढ़कर 20 अगस्त 2026 को ₹55.70 प्रति किलोग्राम हो गई। यह केवल एक महीने में लगभग 15.6 प्रतिशत की वृद्धि है।

हालांकि, इस हालिया वृद्धि को लंबी अवधि के मूल्य रुझान से अलग करके देखना महत्वपूर्ण है। अगस्त 2024 से जुलाई 2026 के बीच चीनी की कीमतों में सालाना आधार पर केवल लगभग 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। इससे संकेत मिलता है कि मौजूदा तेजी मुख्य रूप से अल्पकालिक आपूर्ति, मांग और बाजार संबंधी कारकों से जुड़ी है, न कि चीनी कीमतों में किसी स्थायी संरचनात्मक बदलाव से।

हालिया मूल्य दबाव के पीछे कई कारक हैं:

  • घरेलू चीनी उत्पादन का अनुमान से कम रहना
  • त्योहारी सीजन से पहले मांग में वृद्धि
  • मौसम से संबंधित फसल क्षति
  • गन्ने की फसल में रोगों का प्रभाव
  • वैश्विक चीनी आपूर्ति का सख्त होना और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि
  • बाजार के कुछ हिस्सों में सट्टेबाजी और जमाखोरी

मौजूदा सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान अब लगभग 306 लाख टन (LMT) है, जबकि शुरुआती अनुमान करीब 343 LMT था।

उत्पादन में कमी के पीछे दो प्रमुख कारण बताए गए हैं — रेड रॉट और टॉप बोरर रोग, तथा अत्यधिक वर्षा के कारण उत्पन्न जलभराव

उत्पादन के शुरुआती अनुमान में कमी के बावजूद सरकार का कहना है कि देश में घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त चीनी स्टॉक उपलब्ध है। नया गन्ना पेराई सीजन अक्टूबर में शुरू होगा।

वैश्विक चीनी बाजार ने भी बढ़ाया मूल्य दबाव

भारत में चीनी की कीमतों में हालिया वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक चीनी बाजार में भी आपूर्ति की स्थिति कड़ी हो रही है।

2026-27 में वैश्विक चीनी बाजार में करीब 33 लाख टन का घाटा रहने का अनुमान है। इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमतों में भी तेज वृद्धि हुई है।

अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमत 30 जून 2026 को लगभग $474 प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त 2026 को $552 प्रति टन हो गई। यानी दो महीने से भी कम समय में कीमतों में 16 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई।

वैश्विक बाजार में आपूर्ति की यह स्थिति भारत के घरेलू बाजार पर भी प्रभाव डाल रही है और यह दर्शाती है कि भारत का चीनी बाजार वैश्विक आपूर्ति एवं मांग परिस्थितियों से लगातार अधिक जुड़ता जा रहा है।

तालिका 1: चीनी कीमतों में वृद्धि — मिथक बनाम तथ्य

मिथकतथ्य
इथेनॉल के लिए चीनी डायवर्ट किए जाने के कारण चीनी की कीमतें बढ़ी हैं।इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट की गई चीनी का हिस्सा 2022-23 में लगभग 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में करीब 9 प्रतिशत रह गया है।
इथेनॉल उत्पादन उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध चीनी को कम कर रहा है।भारत में उत्पादित इथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, विशेष रूप से मक्का, से आता है।
भारत में चीनी की कमी हो गई है।सरकार के अनुसार, नए पेराई सीजन के शुरू होने तक घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी स्टॉक उपलब्ध है।
वैश्विक चीनी कीमतें स्थिर बनी हुई हैं।अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमतें 30 जून से 20 अगस्त 2026 के बीच $474 से बढ़कर $552 प्रति टन हो गईं, यानी 16 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई।
भारत में चीनी उत्पादन में भारी गिरावट आई है।मौजूदा उत्पादन का अनुमान 306 LMT है, जो शुरुआती 343 LMT के अनुमान से कम है।
चीनी कीमतें लगातार और तेज गति से बढ़ रही हैं।अगस्त 2024 से जुलाई 2026 के बीच कीमतों में सालाना आधार पर केवल लगभग 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई। मौजूदा तेजी मुख्य रूप से अल्पकालिक बाजार कारकों से जुड़ी है।

सरकार ने यह भी कहा है कि कुछ चीनी मिलों और व्यापारियों द्वारा सट्टेबाजी और जमाखोरी ने हालिया कीमतों में वृद्धि में योगदान दिया है।

चीनी की जमाखोरी रोकने और आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकारी कदम

अल्पकालिक मूल्य दबाव को नियंत्रित करने, कृत्रिम कमी को रोकने और बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं:

1. चीनी व्यापारियों पर स्टॉक सीमा

1 अगस्त 2026 से 30 नवंबर 2026 तक देशभर में चीनी डीलरों पर 400 टन की स्टॉक सीमा लागू की गई है। इसका उद्देश्य बाजार में अनावश्यक स्टॉक रखने और संभावित जमाखोरी को रोकना है।

2. थोक उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक सीमा

1 सितंबर 2026 से थोक उपभोक्ताओं को 15 दिनों की खपत से अधिक चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी। इससे बाजार में जरूरत से अधिक चीनी रोककर रखने की संभावना को सीमित करने में मदद मिलेगी।

3. चीनी मिलों में भौतिक स्टॉक सत्यापन

केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारियों की संयुक्त टीमें चीनी मिलों में उपलब्ध स्टॉक का भौतिक सत्यापन कर रही हैं। इसका उद्देश्य जमाखोरी, कृत्रिम कमी और घोषित तथा वास्तविक स्टॉक के बीच संभावित अंतर की जांच करना है।

4. शुल्क-मुक्त कच्ची चीनी का आयात

घरेलू उपलब्धता को मजबूत करने के लिए सरकार ने एहतियाती कदम के रूप में 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है।

इस कदम का उद्देश्य घरेलू बाजार में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करना और अल्पकालिक मूल्य दबाव को कम करना है।

5. अक्टूबर में जल्द पेराई शुरू करने की तैयारी

राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर 2026 से गन्ने की पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है।

इससे अक्टूबर में चीनी उत्पादन सामान्य 3-4 लाख टन से बढ़कर 10 लाख टन से अधिक होने की उम्मीद है। त्योहारी सीजन के दौरान इससे घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

भारत के चीनी उद्योग की व्यापक तस्वीर

भारत का चीनी उद्योग अब केवल चीनी उत्पादन तक सीमित नहीं रह गया है। यह एक व्यापक कृषि-औद्योगिक मूल्य श्रृंखला के रूप में विकसित हो रहा है, जिसमें गन्ना उत्पादन, चीनी प्रसंस्करण, इथेनॉल, ऊर्जा उत्पादन, किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार शामिल हैं।

हालिया चीनी मूल्य वृद्धि कई कारकों का परिणाम है। इनमें घरेलू उत्पादन में कमी, त्योहारी मौसम से पहले मांग में वृद्धि, मौसम और गन्ने के रोगों से फसल पर प्रभाव, वैश्विक चीनी आपूर्ति में कमी तथा बाजार में कुछ स्तर पर जमाखोरी और सट्टेबाजी शामिल हैं।

हालांकि, इन अल्पकालिक दबावों को चीनी क्षेत्र के दीर्घकालिक प्रदर्शन के संदर्भ में देखना महत्वपूर्ण है। पिछले दशक में भारत के गन्ना उत्पादन और खेती के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। साथ ही, इथेनॉल कार्यक्रम ने चीनी उद्योग के लिए अतिरिक्त बाजार तैयार किया है और अधिशेष उत्पादन के वर्षों में मिलों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद की है।

नीतिगत स्तर पर सबसे बड़ी चुनौती उपभोक्ताओं के लिए चीनी की कीमतों को उचित स्तर पर बनाए रखने, गन्ना किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने, चीनी मिलों की वित्तीय स्थिरता बनाए रखने, घरेलू बाजार में पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करने और इथेनॉल मूल्य श्रृंखला के विकासके बीच संतुलन कायम करना है।

नई पेराई अवधि शुरू होने वाली है और घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा अतिरिक्त कदम उठाए जा रहे हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में बाजार में चीनी की उपलब्धता में सुधार की उम्मीद है।

कुल मिलाकर, मौजूदा मूल्य दबाव को भारत के चीनी क्षेत्र में किसी दीर्घकालिक संकट के बजाय घरेलू उत्पादन, मौसमी मांग, वैश्विक आपूर्ति और बाजार परिस्थितियों से उत्पन्न अल्पकालिक चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। आने वाले पेराई सीजन के साथ उत्पादन और बाजार आपूर्ति में सुधार इस स्थिति को स्थिर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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