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राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

खाद सब्सिडी पर सरकार का खर्च कितना बढ़ेगा? ICRA रिपोर्ट में बड़ा अनुमान

01 जनवरी 2026, नई दिल्ली: खाद सब्सिडी पर सरकार का खर्च कितना बढ़ेगा? ICRA रिपोर्ट में बड़ा अनुमान – भारत में खेती आज भी बड़े पैमाने पर रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर है। किसानों को समय पर और उचित कीमत पर खाद उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार हर साल उर्वरक सब्सिडी पर भारी राशि खर्च करती है। आने वाले वर्षों में यह खर्च और बढ़ सकता है। रेटिंग एजेंसी ICRA की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 में सरकार का कुल उर्वरक सब्सिडी खर्च करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।

क्यों बढ़ रहा है खाद सब्सिडी का बोझ?

ICRA की रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक बाजार में कच्चे माल की ऊंची कीमतें, आयात पर निर्भरता और घरेलू मांग के कारण उर्वरक सब्सिडी पर सरकार का दबाव बना हुआ है। खासतौर पर फॉस्फेट और पोटाश आधारित उर्वरकों (P&K) की लागत अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ी होने के कारण लगातार महंगी बनी हुई है। ऐसे में किसानों पर बोझ न पड़े, इसके लिए सरकार को सब्सिडी का दायरा बढ़ाना पड़ रहा है।

आयात पर निर्भर कंपनियों की बढ़ी मुश्किल

रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा सब्सिडी ढांचे का सबसे ज्यादा फायदा घरेलू उर्वरक उत्पादकों को मिलने की संभावना है। वहीं, आयात पर निर्भर कंपनियों को अब भी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। डीएपी (DAP) जैसे उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी हुई हैं, जबकि घरेलू बाजार में बिक्री मूल्य सीमित है। इससे आयातकों की लागत और मुनाफे के बीच असंतुलन बना हुआ है।

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घरेलू खाद कंपनियों को मिलेगी राह

ICRA का कहना है कि रबी सीजन 2025-26 के लिए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) की दरों में बढ़ोतरी से घरेलू एनपीके (NPK) उर्वरक निर्माताओं को राहत मिलेगी। इससे गैर-यूरिया उर्वरकों की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिलेगी और किसानों को विकल्प मिलते रहेंगे। हालांकि, डीएपी आयात का समीकरण अभी भी कमजोर बना हुआ है।

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बजट से ज्यादा खर्च की आशंका

रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि वित्त वर्ष 2025-26 के लिए पी एंड के उर्वरकों के लिए बजट में किया गया प्रावधान मौजूदा परिस्थितियों में कम पड़ सकता है। यदि वैश्विक कीमतें ऊंची रहीं और मांग बढ़ी, तो सरकार को साल के बीच में अतिरिक्त या अनुपूरक सब्सिडी देनी पड़ सकती है, ताकि खाद की सप्लाई बाधित न हो।

यूरिया सेक्टर में भी हो सकते हैं बदलाव

ICRA के असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट और सेक्टर हेड वरुण गोगिया के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के अंत तक सरकार यूरिया इकाइयों के लिए ऊर्जा मानकों और रिटेंशन प्राइसिंग मैकेनिज्म के तहत मिलने वाली फिक्स्ड लागत में संशोधन कर सकती है। इससे यूरिया कंपनियों की लाभप्रदता और भविष्य के निवेश फैसलों पर असर पड़ सकता है।

कैसी रहेगी खाद की मांग?

ICRA का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में उर्वरक बिक्री में 1 से 3 प्रतिशत की सालाना वृद्धि हो सकती है। यह वृद्धि दीर्घकालिक औसत के अनुरूप मानी जा रही है, जिससे संकेत मिलता है कि कृषि क्षेत्र में उर्वरकों की मांग आने वाले समय में स्थिर बनी रहेगी।

किसानों पर क्या होगा असर?

सरकार की कोशिश यही रहेगी कि बढ़ती लागत का असर किसानों तक न पहुंचे। इसके लिए सब्सिडी व्यवस्था को मजबूत बनाए रखा जाएगा। हालांकि, इससे सरकारी खजाने पर दबाव और बढ़ सकता है।

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